गबन: अध्याय-4.3
'तो पंद्रह-बीस दिन में आएंगे, ख़ूब मालूम है?
जंगली-'हां, वही पहरे वाले कह रहे थे।'
'कुछ मालूम हुआ, कहां गए हैं?'
'वही मौका देखने गए हैं जहां वारदात हुई थी।'
देवीदीन
चिलम पीने लगा और जालपा सड़क पर आकर टहलने लगी। रमा की यह निंदा सुनकर उसका ह्रदय
टुकड़े-टुकड़े हुआ जाता था। उसे रमा पर क्रोध न आया, ग्लानि
न आई, उसे हाथों का सहारा देकर इस दलदल से निकालने के लिए
उसका मन विकल हो उठा। रमा चाहे उसे दुत्कार ही क्यों न दे, उसे
ठुकरा ही क्यों न दे, वह उसे अपयश के अंधेरे खडड में न फिरने
देगी।
जब दोनों यहां से चले तो जालपा ने पूछा, 'इस आदमी से
कह दिया न कि जब वह आ जायं तो हमें ख़बर दे दे?'
'हां, कह दिया।'
सैंतीस
एक
महीना गुज़र गया। गोपीनाथ पहले तो कई दिन कलकत्ता की सैर करता रहा, मगर चार-पांच दिन में ही यहां से उसका जी ऐसा उचाट हुआ कि घर की रट लगानी
शुरू की। आख़िर जालपा ने उसे लौटा देना ही अच्छा समझा, यहां
तो वह छिप-छिप कर रोया करता था।
जालपा
कई बार रमा के बंगले तक हो आई। वह जानती थी कि अभी रमा नहीं आए हैं। फिर भी वहां
का एक चक्कर लगा आने में उसको एक विचित्र संतोष होता था। जालपा कुछ पढ़ते-पढ़ते या
लेटे-लेटे थक जाती, तो एक क्षण के लिए खिड़की के
सामने आ खड़ी होती थी। एक दिन शाम को वह खिड़की के सामने आई, तो सड़क पर मोटरों की एक कतार नज़र आई। कौतूहल हुआ, इतनी
मोटरें कहां जा रही हैं! ग़ौर से देखने लगी। छः मोटरें थीं। उनमें पुलिस के अफसर
बैठे हुए थे। एक में सब सिपाही थे। आख़िरी मोटर पर जब उसकी निगाह पड़ी तो, मानो उसके सारे शरीर में बिजली की लहर दौड़ गई। वह ऐसी तन्मय हुई कि
खिड़की से जीने तक दौड़ी आई, मानो मोटर को रोक लेना चाहती हो,
पर इसी एक पल में उसे मालूम हो गया कि मेरे नीचे उतरते-उतरते मोटरें
निकल जाएंगी। वह फिर खिड़की के सामने आयी, रमा अब बिलकुल
सामने आ गया था। उसकी आंखें खिड़की की ओर लगी हुई थीं। जालपा ने इशारे से कुछ कहना
चाहा, पर संकोच ने रोक दिया। ऐसा मालूम हुआ कि रमा की मोटर
कुछ धीमी हो गई है। देवीदीन की आवाज़ भी सुनाई दी, मगर मोटर
रूकी नहीं। एक ही क्षण में वह आगे बढ़गई, पर रमा अब भी
रह-रहकर खिड़की की ओर ताकता जाता था।
जालपा
ने जीने पर आकर कहा, 'दादा!'
देवीदीन
ने सामने आकर कहा, 'भैया आ गए! वह क्या मोटर जा
रही है!'
यह
कहता हुआ वह ऊपर आ गया। जालपा ने उत्सुकता को संकोच से दबाते हुए कहा, 'तुमसे कुछ कहा?'
देवीदीन-'और क्या कहते, खाली राम-राम की। मैंने कुसल पूछी।
हाथ से दिलासा देते चले गए। तुमने देखा कि नहीं?'
जालपा
ने सिर झुकाकर कहा,देखा क्यों नहीं? खिड़की पर ज़रा खड़ी थी।ट
'उन्होंने भी तुम्हें देखा होगा?'
'खिड़की की ओर ताकते तो थे। '
'बहुत चकराए होंगे कि यह कौन है!'
'कुछ मालूम हुआ मुकदमा कब पेश होगा?'
'कल ही तो।'
'कल ही! इतनी जल्द, तब तो जो कुछ करना है आज ही करना
होगा। किसी तरह मेरा ख़त उन्हें मिल जाता, तो काम बन जाता।'
देवीदीन
ने इस तरह ताका मानो कह रहा है, तुम इस काम को जितना
आसान समझती हो उतना आसान नहीं है।
जालपा
ने उसके मन का भाव ताड़कर कहा, 'क्या तुम्हें संदेह है
कि वह अपना बयान बदलने पर राज़ी होंगे?'
देवीदीन
को अब इसे स्वीकार करने के सिवा और कोई उपाय न सूझा, बोला,हां, बहूजी, मुझे इसका बहुत
अंदेसा है। और सच पूछो तो है भी जोखिम,अगर वह बयान बदल भी
दें, तो पुलिस के पंजे से नहीं छूट सकते। वह कोई दूसरा
इलज़ाम लगा कर उन्हें पकड़ लेगी और फिर नया मुकदमा चलावेगी।'
जालपा
ने ऐसी नज़रों से देखा, मानो वह इस बात से ज़रा भी
नहीं डरती। फिर बोली, 'दादा, मैं
उन्हें पुलिस के पंजे से बचाने का ठेका नहीं लेती। मैं केवल यह चाहती हूं कि हो
सके तो अपयश से उन्हें बचा लूं। उनके हाथों इतने घरों की बरबादी होते नहीं देख
सकती। अगर वह सचमुच डकैतियों में शरीक होते, तब भी मैं यही
चाहती कि वह अंत तक अपने साथियों के साथ रहें और जो सिर पर पड़े उसे ख़ुशी से
झेलें। मैं यह कभी न पसंद करती कि वह दूसरों को दग़ा देकर मुख़बिर बन जायं,
लेकिन यह मामला तो बिलकुल झूठ है। मैं यह किसी तरह नहीं बरदाश्त कर
सकती कि वह अपने स्वार्थ के लिए झूठी गवाही दें। अगर उन्होंने ख़ुद अपना बयान न
बदला, तो मैं अदालत में जाकर सारा कच्चा चित्ता खोल दूंगी,
चाहे नतीजा कुछ भी हो वह हमेशा के लिए मुझे त्याग दें, मेरी सूरत न देखें, यह मंजूर है, पर यह नहीं हो सकता कि वह इतना बडा कलंक माथे पर लगावें। मैंने अपने पत्र
में सब लिख दिया है। देवीदीन ने उसे आदर की दृष्टि से देखकर कहा, 'तुम सब कर लोगी बहू, अब मुझे विश्वास हो गया। जब
तुमने कलेजा इतना मजबूत कर लिया है, तो तुम सब कुछ कर सकती
हो।'
'तो यहां से नौ बजे चलें?'
'हां, मैं तैयार हूं।'
अड़तीस
वह
रमानाथ-,जो पुलिस के भय से बाहर न निकलता था, जो देवीदीन के
घर में चोरों की तरह पडा जिंदगी के दिन पूरे कर रहा था, आज
दो महीनों से राजसी भोग-विलास में डूबा हुआ है। रहने को सुंदर सजा हुआ बंगला है,
सेवा-टहल के लिए चौकीदारों का एक दल, सवारी के
लिए मोटरब भोजन पकाने के लिए एक काश्मीरी बावरची है। बड़े-बडे अफसर उसका मुंह ताकष
करते हैं। उसके मुंह से बात निकली नहीं कि पूरी हुई! इतने ही दिनों में उसके
मिज़ाज में इतनी नफासत आ गई है, मानो वह ख़ानदानी रईस हो
विलास ने उसकी विवेक- बुद्धिको सम्मोहित-सा कर दिया है। उसे कभी इसका ख़याल भी
नहीं आता कि मैं क्या कर रहा हूं और मेरे हाथों कितने बेगुनाहों का ख़ून हो रहा
है। उसे एकांत-विचार का अवसर ही नहीं दिया जाता। रात को वह अधिकारियों के साथ
सिनेमा या थिएटर देखने जाता है, शाम को मोटरों की सैर होती
है। मनोरंजन के नित्य नए सामान होते रहते हैं। जिस दिन अभियुक्तों को मैजिस्ट्रेट
ने सेशन सुपुर्द किया, सबसे ज्यादा ख़ुशी उसी को हुई। उसे
अपना सौभाग्य-सूर्य उदय होता हुआ मालूम होता था।
पुलिस
को मालूम था कि सेशन जज के इजलास में यह बहार न होगी। संयोग से जज हिन्दुस्तानी थे
और निष्पक्षता के लिए बदनाम, पुलिस हो या चोर,
उनकी निगाह में बराबर था। वह किसी के साथ रिआयत न करते थे। इसलिए
पुलिस ने रमा को एक बार उन स्थानों की सैर कराना ज़रूरी समझा, जहां वारदातें हुई थीं। एक ज़मींदार की सजी-सजाई कोठी में डेरा पड़ा। दिन?भर लोग शिकार खेलते, रात को ग्रामोफोन सुनते,
ताश खेलते और बज़रों पर नदियों की सैर करते। ऐसा जान पड़ता था कि
कोई राजकुमार शिकार खेलने निकला है। इस भोग-विलास में रमा को अगर कोई अभिलाषा थी,
तो यह कि जालपा भी यहां होती। जब तक वह पराश्रित था, दरिद्र था, उसकी विलासेंद्रियां मानो मूच्र्छित हो
रही थीं। इन शीतल झोंकों ने उन्हें फिर सचेत कर दिया। वह इस कल्पना में मग्न था कि
यह मुकदमा ख़त्म होते ही उसे अच्छी जगह मिल जायगी। तब वह जाकर जालपा को मना लावेगा
और आनंद से जीवनसुख भोगेगा।
हां, वह नए प्रकार का जीवन होगा, उसकी मर्यादा कुछ और
होगी, सिद्धान्त कुछ और होंगे। उसमें कठोर संयम होगा और
पक्का नियांण! अब उसके जीवन का कुछ उद्देश्य होगा, कुछ आदर्श
होगा। केवल खाना, सोना और रूपये के लिए हाय-हाय करना ही जीवन
का व्यापार न होगा। इसी मुकदमे के साथ इस मार्गहीन जीवन का अंत हो जायगा। दुर्बल
इच्छा ने उसे यह दिन दिखाया था और अब एक नए और संस्कृत जीवन का स्वप्न दिखा रही
थी। शराबियों की तरह ऐसे मनुष्य रोज़ ही संकल्प करते हैं, लेकिन
उन संकल्पों का अंत क्या होता है? नए-नए प्रलोभन सामने आते
रहते हैं और संकल्प की अवधि भी बढ़ती चली जाती है। नए प्रभात का उदय कभी नहीं
होता।
एक
महीना देहात की सैर के बाद रमा पुलिस के सहयोगियों के साथ अपने बंगले पर जा रहा
था। रास्ता देवीदीन के घर के सामने से था, कुछ दूर ही
से उसे अपना कमरा दिखाई दिया। अनायास ही उसकी निगाह ऊपर उठ गई। खिड़की के सामने
कोई खडाथा। इस वक्त देवीदीन वहां क्या कर रहा है? उसने ज़रा
ध्यान से देखा। यह तो कोई औरत है! मगर औरत कहां से आई- क्या देवीदीन ने वह कमरा
किराए पर तो नहीं उठा दिया, ऐसा तो उसने कभी नहीं किया।
मोटर
ज़रा और समीप आई तो उस औरत का चेहरा साफ नज़र आने लगा। रमा चौंक पड़ा। यह तो जालपा
है! बेशक जालपा है! मगर नहीं, जालपा यहां कैसे आयगी?
मेरा पता-ठिकाना उसे कहां मालूम! कहीं बुडढे ने उसे ख़त तो नहीं लिख
दिया? जालपा ही है। नायब दारोग़ा मोटर चला रहा था। रमा ने
बडी मित्रता के साथ कहा,सरदार साहब, एक
मिनट के लिए रूक जाइए। मैं ज़रा देवीदीन से एक बात कर लूं। नायब ने मोटर ज़रा धीमी
कर दी, लेकिन फिर कुछ सोचकर उसे आगे बढ़ा दिया।
रमा
ने तेज़ होकर कहा, 'आप तो मुझे कैदी बनाए हुए
हैं।'
नायब
ने खिसियाकर कहा, 'आप तो जानते हैं, डिप्टी साहब कितनी जल्द जामे से बाहर हो जाते हैं।'
बंगले
पर पहुंचकर रमा सोचने लगा, जालपा से कैसे मिलूं। वहां
जालपा ही थी, इसमें अब उसे कोई शुबहा न था। आंखों को कैसे
धोखा देता। ह्रदय में एक ज्वाला-सी उठी हुई थी, क्या करूं?
कैसे जाऊं?' उसे कपड़े उतारने की सुधि भी न
रही। पंद्रह मिनट तक वह कमरे के द्वार पर खडारहा। कोई हिकमत न सूझी। लाचार पलंग पर
लेटा रहा। ज़रा ही देर में वह फिर उठा और सामने सहन में निकल आया। सडक पर उसी वक्त
बिजली रोशन हो गई। फाटक पर चौकीदार खडा था। रमा को उस पर इस समय इतना क्रोध आया,
कि गोली मार दे। अगर मुझे कोई अच्छी जगह मिल गई, तो एक-एक से समझूंगा। तुम्हें तो डिसमिस कराके छोड़ूंगा। कैसा शैतान की
तरह सिर पर सवार है। मुंह तो देखो ज़राब मालूम होता है ।करी की दुम है। वाह रे
आपकी पगड़ी, कोई टोकरी ढोने वाला कुली है। अभी कुत्ता भूंक
पड़े, तो आप दुम दबाकर भागेंगे, मगर
यहां ऐसे डटे खड़े हैं मानो किसी किले के द्वार की रक्षा कर रहे हैं।
एक
चौकीदार ने आकर कहा, 'इसपिक्टर साहब ने बुलाया है।
कुछ नए तवे मंगवाए हैं।
रमा
ने झल्लाकर कहा, 'मुझे इस वक्त फुरसत नहीं है।'
फिर
सोचने लगा। जालपा यहां कैसे आई, अकेले ही आई है या और
कोई साथ है? जालिम ने बुडढे से एक मिनट भी बात नहीं करने
दिया। जालपा पूछेगी तो जरूर, कि क्यों भागे थे। साफ-साफ कह
दूंगा, उस समय और कर ही क्या सकता था। पर इन थोड़े दिनों के
कष्ट ने जीवन का प्रश्न तो हल कर दिया। अब आनंद से जिंदगी कटेगी। कोशिश करके उसी
तरफ अपना तबादला करवा लूंगा। यह सोचते-सोचते रमा को ख़याल आया कि जालपा भी यहां
मेरे साथ रहे, तो क्या हरज है। बाहर वालों से मिलने की
रोक-टोक है। जालपा के लिए क्या रूकावट हो सकती है। लेकिन इस वक्त इस प्रश्न को
छेड़ना उचित नहीं। कल इसे तय करूंगा। देवीदीन भी विचित्र जीव है। पहले तो कई बार
आया, पर आज उसने भी सन्नाटा खींच लिया। कम-से-कम इतना तो हो
सकता था कि आकर पहरे वाले कांस्टेबल से जालपा के आने की ख़बर मुझे देता। फिर मैं
देखता कि कौन जालपा को नहीं आने देता। पहले इस तरह की कैद ज़रूरी थी, पर अब तो मेरी परीक्षा पूरी हो चुकी। शायद सब लोग ख़ुशी से राजी हो जाएंगे।
रसोइया
थाली लाया। मांस एक ही तरह का था। रमा थाली देखते ही झल्ला गया। इन दिनों रूचिकर
भोजन देखकर ही उसे भूख लगती थी। जब तक चार-पांच प्रकार का मांस न हो, चटनी-अचार न हो, उसकी तृप्ति न होती थी। बिगड़कर
बोला, 'क्या खाऊं तुम्हारा सिर- थाली उठा ले जाओ।'
रसोइए
ने डरते-डरते कहा,'हुजूर, इतनी
जल्द और चीजें कैसे बनाता! अभी कुल दो घंटे तो आए हुए हैं।'
'दो घंटे तुम्हारे लिए थोड़े होते हैं!'
'अब हुजूर से क्या कहूं!'
'मत बको।'
'हुजूर'
'मत बको - डैम!'
रसोइए
ने फिर कुछ न कहा। बोतल लाया, बर्फ तोड़कर ग्लास में
डाली और पीछे हटकर खडाहो गया। रमा को इतना क्रोध आ रहा था कि रसोइए को नोच खाए।
उसका मिज़ाज इन दिनों बहुत तेज़ हो गया था। शराब का दौर शुरू हुआ, तो रमा का गुस्सा और भी तेज़ हो गया। लाल - लाल आंखों से देखकर बोला,
'चाहूं तो अभी तुम्हारा कान पकड़कर निकाल दूं। अभी, इसी दम! तुमने समझा क्या है!'
उसका
क्रोध बढ़ता देखकर रसोइया चुपके-से सरक गया। रमा ने ग्लास लिया और दो-चार लुकमे
खाकर बाहर सहन में टहलने लगा। यही धुन सवार थी, कैसे यहां
से निकल जाऊं। एकाएक उसे ऐसा जान पडाकि तार के बाहर वृक्षों की आड़ में कोई है।
हां, कोई खडा उसकी तरफ ताक रहा है। शायद इशारे से अपनी तरफ
बुला रहा है। रमानाथ का दिल धड़कने लगा। कहीं षडयंत्रकारियों ने उसके प्राण लेने
की तो नहीं ठानी है! यह शंका उसे सदैव बनी रहती थी। इसी ख़याल से वह रात को बंगले
के बाहर बहुत कम निकलता था। आत्म-रक्षा के भाव ने उसे अंदर चले जाने की प्रेरणा
की। उसी वक्त एक मोटर सड़क पर निकली। उसके प्रकाश में रमा ने देखा, वह अंधेरी छाया स्त्री है। उसकी साड़ी साफ नज़र आ रही है। फिर उसे ऐसा
मालूम हुआ कि वह स्त्री उसकी ओर आ रही है। उसे फिर शंका हुई, कोई मर्द यह वेश बदलकर मेरे साथ छल तो नहीं कर रहा है। वह ज्यों-ज्यों
पीछे हटता गया, वह छाया उसकी ओर बढ़ती गई, यहां तक कि तार के पास आकर उसने कोई चीज़ रमा की तरफ गेंकी। रमा चीख मारकर
पीछे हट गया, मगर वह केवल एक लिफाफा था। उसे कुछ तस्कीन हुई।
उसने फिर जो सामने देखा, तो वह छाया अंधकारमें विलीन हो गई
थी। रमा ने लपककर वह लिफाफा उठा लिया। भय भी था और कौतूहल भी। भय कम था, कौतूहल अधिक। लिफाफे को हाथ में लेकर देखने लगा। सिरनामा देखते ही उसके
ह्रदय में फुरहरियां-सी उड़ने लगीं। लिखावट जालपा की थी। उसने फौरन लिफाफा खोला।
जालपा ही की लिखावट थी। उसने एक ही सांस में पत्र पढ़ डाला और तब एक लंबी सांस ली।
उसी सांस के साथ चिंता का वह भीषण भार जिसने आज छः महीने से उसकी आत्मा को दबाकर
रक्खा था, वह सारी मनोव्यथा जो उसका जीवनरक्त चूस रही थी,
वह सारी दुर्बलता, लज्जा, ग्लानि मानो उड़ गई, छू मंतर हो गई। इतनी स्फूर्ति,
इतना गर्व, इतना आत्म-विश्वास उसे कभी न हुआ
था। पहली सनक यह सवार हुई, अभी चलकर दारोग़ा से कह दूं,
मुझे इस मुकदमे से कोई सरोकार नहीं है, लेकिन
फिर ख़याल आया, बयान तो अब हो ही चुका, जितना अपयश मिलना था, मिल ही चुका,अब उसके फल से क्यों हाथ धोऊं। मगर इन सबों ने मुझे कैसा चकमा दिया है! और
अभी तक मुगालते में डाले हुए हैं। सब-के-सब मेरी दोस्ती का दम भरते हैं, मगर अभी तक असली बात मुझसे छिपाए हुए हैं। अब भी इन्हें मुझ पर विश्वास
नहीं। अभी इसी बात पर अपना बयान बदल दूं, तो आटे-दाल का भाव
मालूम हो यही न होगा, मुझे कोई जगह न मिलेगी। बला से,
इन लोगों के मनसूबे तो ख़ाक में मिल जाएंगे। इस दग़ाबाज़ी की सज़ा
तो मिल जायगी। और, यह कुछ न सही, इतनी
बडी बदनामी से तो बच जाऊंगा। यह सब शरारत जरूर करेंगे, लेकिन
झूठा इलज़ाम लगाने के सिवा और कर ही क्या सकते हैं। जब मेरा यहां रहना साबित ही
नहीं तो मुझ पर दोष ही क्या लग सकता है। सबों के मुंह में कालिख लग जायगी। मुंह तो
दिखाया न जाएगा, मुकदमा क्या चलाएंगे।
मगर
नहीं,
इन्होंने मुझसे चाल चली है, तो मैं भी इनसे
वही चाल चलूंगा। कह दूंगा, अगर मुझे आज कोई अच्छी जगह मिल
जाएगी, तो मैं शहादत दूंगा, वरना साफ
कह दूंगा, इस मामले से मेरा कोई संबंध नहीं। नहीं तो पीछे से
किसी छोटे-मोटे थाने में नायब दारोग़ा बनाकर भेज दें और वहां सडा करूं। लूंगा
इंस्पेक्टरी और कल दस बजे मेरे पास नियुक्ति का परवाना आ जाना चाहिए।
वह
चला कि इसी वक्त दारोग़ा से कह दूं, लेकिन फिर
रूक गया। एक बार जालपा से मिलने के लिए उसके प्राण तड़प रहे थे। उसके प्रति इतना
अनुराग, इतनी श्रद्धा उसे कभी न हुई थी, मानो वह कोई दैवी-शक्ति हो जिसे देवताओं ने उसकी रक्षा के लिए भेजा हो दस
बज गए थे। रमानाथ ने बिजली गुल कर दी और बरामदे में आकर ज़ोर से किवाड़ बंद कर दिए,
जिसमें पहरे वाले सिपाही को मालूम हो, अंदर से
किवाड़ बंद करके सो रहे हैं। वह अंधेरे बरामदे में एक मिनट खडा रहा। तब आहिस्ता से
उतरा और कांटेदार गेंसिंग के पास आकर सोचने लगा, उस पार कैसे
जाऊं?' शायद अभी जालपा बग़ीचे में हो देवीदीन जरूर उसके साथ
होगा। केवल यही तार उसकी राह रोके हुए था। उसे गांद जाना असंभव था। उसने तारों के
बीच से होकर निकल जाने का निश्चय किया। अपने सब कपड़े समेट लिए और कांटों को बचाता
हुआ सिर और कंधो को तार के बीच में डाला, पर न जाने कैसे
कपड़े फंस गए। उसने हाथ से कपड़ों को छुडाना चाहा, तो आस्तीन
कांटों में फंस गई। धोती भी उलझी हुई थी। बेचारा बडे संकट में पड़ा। न इस पार जा
सकता था, न उस पारब ज़रा भी असावधानी हुई और कांटे उसकी देह
में चुभ जाएंगे।
मगर
इस वक्त उसे कपड़ों की परवा न थी। उसने गर्दन और आगे बढ़ाई और कपड़ों में लंबा
चीरा लगाता उस पार निकल गया। सारे कपड़े तार-तार हो गए। पीठ में भी कुछ खरोंचे
लगेऋ पर इस समय कोई बंदूक का निशाना बांधकर भी उसके सामने खडा हो जाता, तो भी वह पीछे न हटता। फटे हुए कुरते को उसने वहीं फेंक दिया, गले की चादर फट जाने पर भी काम दे सकती थी, उसे उसने
ओढ़लिया, धोती समेट ली और बग़ीचे में घूमने लगा। सन्नाटा था।
शायद रखवाला खटिक खाना खाने गया हुआ था। उसने दो-तीन बार धीरेधीरे जालपा का नाम
लेकर पुकारा भी। किसी की आहट न मिली, पर निराशा होने पर भी
मोह ने उसका गला न छोडा। उसने एक पेड़ के नीचे जाकर देखा। समझ गया, जालपा चली गई। वह उन्हीं पैरों देवीदीन के घर की ओर चला।
उसे
ज़रा भी शोक न था। बला से किसी को मालूम हो जाय कि मैं बंगले से निकल आया हूं, पुलिस मेरा कर ही क्या सकती है। मैं कैदी नहीं हूं,गुलामी
नहीं लिखाई है।
आधी
रात हो गई थी। देवीदीन भी आधा घंटा पहले लौटा था और खाना खाने जा रहा था कि एक
नंगे-धड़ंगे आदमी को देखकर चौंक पड़ा। रमा ने चादर सिर पर बांधा ली थी और देवीदीन
को डराना चाहता था। देवीदीन ने सशंक होकर कहा, 'कौन है?
'
सहसा
पहचान गया और झपटकर उसका हाथ पकड़ता हुआ बोला, 'तुमने तो
भैया खूब भेस बनाया है? कपड़े क्या हुए? '
रमानाथ-'तार से निकल रहा था। सब उसके कांटों में उलझकर फट गए।'
देवीदीन-'राम राम! देह में तो कांटे नहीं चुभे? '
रमानाथ-'कुछ नहीं, दो-एक खरोंचे लग गए। मैं बहुत बचाकर
निकला।'
देवीदीन-'बहू की चिट्ठी मिल गई न? '
रमानाथ-'हां, उसी वक्त मिल गई थी। क्या वह भी तुम्हारे साथ
थी? '
देवीदीन-'वह मेरे साथ नहीं थीं, मैं उनके साथ था। जब से
तुम्हें मोटर पर आते देखा, तभी से जाने-जाने लगाए हुए थीं।'
रमानाथ-'तुमने कोई ख़त लिखा था? '
देवीदीन-'मैंने कोई ख़त-पत्तर नहीं लिखा भैया। जब वह आई तो मुझे आप ही अचंभा हुआ कि
बिना जाने-बूझे कैसे आ गई। पीछे से उन्होंने बताया। वह सतरंज वाला नकसा उन्हीं ने
पराग से भेजा था और इनाम भी वहीं से आया था।'
रमा
की आंखें फैल गई। जालपा की चतुराई ने उसे विस्मय में डाल दिया। इसके साथ ही पराजय
के भाव ने उसे कुछ खिकै कर दिया। यहां भी उसकी हार हुई! इस बुरी तरह!
बुढिया
ऊपर गई हुई थी। देवीदीन ने जीने के पास जाकर कहा, 'अरे
क्या करती है? बहू से कह दे। एक आदमी उनसे मिलने आया है।'
यह
कहकर देवीदीन ने फिर रमा का हाथ पकड़ लिया और बोला, 'चलो,अब सरकार में तुम्हारी पेसी होगी। बहुत भागे थे। बिना वारंट के पकड़े गए।
इतनी आसानी से पुलिस भी न पकड़ सकती! '
रमा
का मनोल्लास क्रवित हो गया था। लज्जा से गडा जाता था। जालपा के प्रश्नों का उसके
पास क्या जवाब था। जिस भय से वह भागा था, उसने अंत
में उसका पीछा करके उसे परास्त ही कर दिया। वह जालपा के सामने सीधी आंखें भी तो न
कर सकता था। उसने हाथ छुडा लिया और जीने के पास ठिठक गया। देवीदीन ने पूछा,
'क्यों रूक गए? '
रमा
ने सिर खुजलाते हुए कहा, 'चलो, मैं
आता हूं।'
बुढिया
ने ऊपर ही से कहा, 'पूछो, कौन
आदमी है, कहां से आया है? '
देवीदीन
ने विनोद किया, 'कहता है, मैं जो
कुछ कहूंगा, बहू से ही कहूंगा।'
'कोई चिट्ठी लाया है?'
'नहीं!''
सन्नाटा
हो गया। देवीदीन ने एक क्षण के बाद पूछा, 'कह दूं,
लौट जाय? '
जालपा
जीने पर आकर बोली, 'कौन आदमी है, पूछती तो हूं!'
'कहता है, बडी दूर से आया हूं!'
'है कहां?'
'यह क्या खडाहै!'
'अच्छा, बुला लो!'
रमा
चादर ओढ़े, कुछ झिझकता, कुछ
झेंपता, कुछ डरता, जीने पर चढ़ा। जालपा
ने उसे देखते ही पहचान लिया। तुरंत दो कदम पीछे हट गई। देवीदीन वहां न होता तो वह
दो कदम और आगे बढ़ी होती। उसकी आंखों में कभी इतना नशा न था, अंगों में कभी इतनी चपलता
न
थी,
कपोल कभी इतने न दमके थे, ह्रदय में कभी इतना
मृदु कंपन न हुआ था। आज उसकी तपस्या सफल हुई!
उनतालीस
वियोगियों
के मिलन की रात बटोहियों के पडाव की रात है, जो बातों
में कट जाती है। रमा और जालपा,दोनों ही को अपनी छः महीने की
कथा कहनी थी। रमा ने अपना गौरव बढ़ाने के लिए अपने कष्टों को ख़ूब बढ़ा-चढ़ाकर
बयान किया। जालपा ने अपनी कथा में कष्टों की चर्चा तक न आने दी। वह डरती थी इन्हें
दुःख होगा, लेकिन रमा को उसे रूलाने में विशेष आनंद आ रहा
था। वह क्यों भागा, किसलिए भागा, कैसे
भागा, यह सारी गाथा उसने करूण शब्दों में कही और जालपा ने
सिसक-सिसककर सुनीब वह अपनी बातों से उसे प्रभावित करना चाहता था। अब तक सभी बातों
में उसे परास्त होना पडाथा। जो बात उसे असूझ मालूम हुई, उसे
जालपा ने चुटकियों में पूरा कर दिखाया। शतरंज वाली बात को वह ख़ूब नमक-मिर्च लगाकर
बयान कर सकता था, लेकिन वहां भी जालपा ही ने नीचा दिखाया।
फिर उसकी कीर्ति-लालसा को इसके सिवा और क्या उपाय था कि अपने कष्टों की राई को
पर्वत बनाकर दिखाए।
जालपा
ने सिसककर कहा, 'तुमने यह सारी आफतें झेंली, पर हमें एक पत्र तक न लिखा। क्यों लिखते, हमसे नाता
ही क्या था! मुंह देखे की प्रीति थी! आंख ओट पहाड़ ओट।'
रमा
ने हसरत से कहा, 'यह बात नहीं थी जालपा, दिल पर जो कुछ गुज़रती थी दिल ही जानता है, लेकिन
लिखने का मुंह भी तो हो जब मुंह छिपाकर घर से भागा, तो अपनी
विपत्ति-कथा क्या लिखने बैठता! मैंने तो सोच लिया था, जब तक
ख़ूब रूपये न कमा लूंगा, एक शब्द भी न लिखूंगा। '
जालपा
ने आंसू-भरी आंखों में व्यंग्य भरकर कहा, 'ठीक ही था,
रूपये आदमी से ज्यादा प्यारे होते ही हैं! हम तो रूपये के यार हैं,
तुम चाहे चोरी करो, डाका मारो, जाली नोट बनाओ, झूठी गवाही दो या भीख मांगो, किसी उपाय से रूपये लाओ। तुमने हमारे स्वभाव को कितना ठीक समझा है,
कि वाह! गोसाई जी भी तो कह गए हैं,स्वारथ लाइ
करहिं सब प्रीति।'
रमा
ने झेंपते हुए कहा, 'नहीं-नहीं प्रिये, यह बात न थी। मैं यही सोचता था कि इन फटे-हालों जाऊंगा कैसे। सच कहता हूं,
मुझे सबसे ज्यादा डर तुम्हीं से लगता था। सोचता था, तुम मुझे कितना कपटी, झूठा, कायर
समझ रही होगी। शायद मेरे मन में यह भाव था कि रूपये की थैली देखकर तुम्हारा ह्रदय
कुछ तो नर्म होगा।'
जालपा
ने व्यथित कंठ से कहा, 'मैं शायद उस थैली को हाथ से
छूती भी नहीं। आज मालूम हो गया, तुम मुझे कितनी नीच, कितनी स्वार्थिनी,कितनी लोभिन समझते हो! इसमें
तुम्हारा कोई दोष नहीं, सरासर मेरा दोष है। अगर मैं भली होती,
तो आज यह दिन ही क्यों आता। जो पुरूष तीस-चालीस रूपये का नौकर हो,
उसकी स्त्री अगर दो-चार रूपये रोज़ ख़र्च करे, हज़ार-दो हज़ार के गहने पहनने की नीयत रक्खे, तो वह
अपनी और उसकी तबाही का सामान कर रही है। अगर तुमने मुझे इतना धनलोलुप समझा,
तो कोई अन्याय नहीं किया। मगर एक बार जिस आग में जल चुकी, उसमें फिर न यदूंगी। इन महीनों में मैंने उन पापों का कुछ प्रायश्चित्त
किया है और शेष जीवन के अंत समय तक करूंगी। यह मैं नहीं कहती कि भोग-विलास से मेरा
जी भर गया, या गहने-कपड़े से मैं ऊब गई, या सैर-तमाशे से मुझे घृणा हो गई। यह सब अभिलाषाएं ज्यों की त्यों हैं।
अगर तुम अपने पुरूषार्थ से, अपने परिश्रम से, अपने सदुद्योग से उन्हें पूरा कर सको तो क्या कहनाऋ लेकिन नीयत खोटी करके,
आत्मा को कलुषित करके एक लाख भी लाओ, तो मैं
उसे ठुकरा दूंगी। जिस वक्त मुझे मालूम हुआ कि तुम पुलिस के गवाह बन गए हो, मुझे इतना दुःख हुआ कि मैं उसी वक्त दादा को साथ लेकर तुम्हारे बंगले तक
गई, मगर उसी दिन तुम बाहर चले गए थे और आज लौटे हो मैं इतने
आदमियों का ख़ून अपनी गर्दन पर नहीं लेना चाहती। तुम अदालत में साफ-साफ कह दो कि
मैंने पुलिस के चकमे में आकर गवाही दी थी, मेरा इस मुआमले से
कोई संबंध नहीं है। रमा ने चिंतित होकर कहा, 'जब से तुम्हारा
ख़त मिला, तभी से मैं इस प्रश्न पर विचार कर रहा हूं,
लेकिन समझ में नहीं आता क्या करूं। एक बात कहकर मुकर जाने का साहस
मुझमें नहीं है।'
'बयान तो बदलना ही पड़ेगा।'
'आख़िर कैसे ?'
'मुश्किल क्या है। जब तुम्हें मालूम हो गया कि म्युनिसिपैलिटी तुम्हारे ऊपर
कोई मुकदमा नहीं चला सकती, तो फिर किस बात का डर?'
'डर न हो, झेंप भी तो कोई चीज़ है। जिस मुंह से एक
बात कही, उसी मुंह से मुकर जाऊं, यह तो
मुझसे न होगा। फिर मुझे कोई अच्छी जगह मिल जाएगी। आराम से जिंदगी बसर होगी। मुझमें
गली-गली ठोकर खाने का बूता नहीं है।'
जालपा
ने कोई जवाब न दिया। वह सोच रही थी, आदमी में
स्वार्थ की मात्रा कितनी अधिक होती है। रमा ने फिर धृष्टता से कहा, ' और कुछ मेरी ही गवाही पर तो सारा फैसला नहीं हुआ जाता। मैं बदल भी जाऊं,
तो पुलिस कोई दूसरा आदमी खडाकर देगी। अपराधियों की जान तो किसी तरह
नहीं बच सकती। हां, मैं मुफ्त में मारा जाऊंगा।'
जालपा
ने त्योरी चढ़ाकर कहा, ' कैसी बेशर्मी की बातें करते
हो जी! क्या तुम इतने गए-बीते हो कि अपनी रोटियों के लिए दूसरों का गला काटो। मैं
इसे नहीं सह सकती। मुझे मजदूरी करना, भूखों मर जाना मंजूर है,
बडी-से-बडी विपत्ति जो संसार में है, वह सिर
पर ले सकती हूं, लेकिन किसी का बुरा करके स्वर्ग का राज भी
नहीं ले सकती।'
रमा
इस आदर्शवाद से चिढ़कर बोला, ' तो क्या तुम चाहती कि
मैं यहां कुलीगीरी करूं? '
जालपा-'नहीं, मैं यह नहीं चाहतीऋ लेकिन अगर कुलीगीरी भी
करनी पड़े तो वह ख़ून से तर रोटियां खाने से कहीं बढ़कर है।'
रमा
ने शांत भाव से कहा, ' जालपा, तुम मुझे जितना नीच समझ रही हो, मैं उतना नीच नहीं
हूं। बुरी बात सभी को बुरी लगती है। इसका दुःख मुझे भी है कि मेरे हाथों इतने
आदमियों का ख़ून हो रहा है, लेकिन परिस्थिति ने मुझे लाचार
कर दिया है। मुझमें अब ठोकरें खाने की शक्ति नहीं है। न मैं पुलिस से रार मोल ले
सकता हूं। दुनिया में सभी थोड़े ही आदर्श पर चलते हैं। मुझे क्यों उस ऊंचाई पर
चढ़ाना चाहती हो, जहां पहुंचने की शक्ति मुझमें नहीं है।'
जालपा
ने तीक्ष्ण स्वर में कहा, ' जिस आदमी में हत्या करने की
शक्ति हो, उसमें हत्या न करने की शक्ति का न होना अचंभे की
बात है। जिसमें दौड़ने की शक्ति हो, उसमें खड़े रहने की
शक्ति न हो इसे कौन मानेगा। जब हम कोई काम करने की इच्छा करते हैं, तो शक्ति आप ही आप आ जाती है। तुम यह निश्चय कर लो कि तुम्हें बयान बदलना
है, बस और बातें आप आ जायंगी।'
रमा
सिर झुकाए हुए सुनता रहा।
जालपा
ने और आवेश में आकर कहा, ' अगर तुम्हें यह पाप की खेती
करनी है, तो मुझे आज ही यहां से विदा कर दो। मैं मुंह में
कालिख लगाकर यहां से चली जाऊंगी और फिर तुम्हें दिक करने न आऊंगी। तुम आनंद से
रहना। मैं अपना पेट मेहनत-मजूरी करके भर लूंगी। अभी प्रायश्चित्त पूरा नहीं हुआ है,
इसीलिए यह दुर्बलता हमारे पीछे पड़ी हुई है। मैं देख रही हूं,
यह हमारा सर्वनाश करके छोड़ेगी।'
रमा
के दिल पर कुछ चोट लगी। सिर खुजलाकर बोला, ' चाहता तो
मैं भी हूं कि किसी तरह इस मुसीबत से जान बचे।'
'तो बचाते क्यों नहीं। अगर तुम्हें कहते शर्म आती हो, तो मैं चलूं। यही अच्छा होगा। मैं भी चली चलूंगी और तुम्हारे सुपरंडंट
साहब से सारा वृत्तांत साफ- साफ कह दूंगी।'
रमा
का सारा पसोपेश गायब हो गया। अपनी इतनी दुर्गति वह न कराना चाहता था कि उसकी
स्त्री जाकर उसकी वकालत करे। बोला, ' तुम्हारे
चलने की जरूरत नहीं है जालपा, मैं उन लोगों को समझा दूंगा। '
जालपा
ने ज़ोर देकर कहा, ' साफ बताओ, अपना बयान बदलोगे या नहीं? '
रमा
ने मानो कोने में दबकर कहा,कहता तो हूं, बदल दूंगा। '
'मेरे कहने से या अपने दिल से?'
'तुम्हारे कहने से नहीं, अपने दिल सेब मुझे ख़ुद ही
ऐसी बातों से घृणा है। सिर्फ ज़रा हिचक थी, वह तुमने निकाल
दी।'
फिर
और बातें होने लगीं। कैसे पता चला कि रमा ने रूपये उडा दिए हैं? रूपये अदा कैसे हो गए? और लोगों को ग़बन की ख़बर हुई
या घर ही में दबकर रह गई?रतन पर क्या गुज़री- गोपी क्यों
इतनी जल्द चला गया? दोनों कुछ पढ़ रहे हैं या उसी तरह आवारा
फिरा करते हैं?आख़िर में अम्मां और दादा का ज़िक्र आया। फिर
जीवन के मनसूबे बांधो जाने लगे। जालपा ने कहा, 'घर चलकर रतन
से थोड़ी-सी ज़मीन ले लें और आनंद से खेती-बारी करें।'
रमा
ने कहा,
'कहीं उससे अच्छा है कि यहां चाय की दुकान खोलें।' इस पर दोनों में मुबाहसा हुआ। आख़िर रमा को हार माननी पड़ी। यहां रहकर वह
घर की देखभाल न कर सकता था, भाइयों को शिक्षा न दे सकता था
और न मातापिता की सेवा-सत्कार कर सकता था। आख़िर घरवालों के प्रति भी तो उसका कुछ
कर्तव्य है। रमा निरूत्तर हो गया।
चालीस
रमा
मुंह-अंधेरे अपने बंगले जा पहुंचा। किसी को कानों-कान ख़बर न हुई। नाश्ता करके रमा
ने ख़त साफ किया, कपड़े पहने और दारोग़ा के पास
जा पहुंचा। त्योरियां चढ़ी हुई थीं। दारोग़ा ने पूछा, 'ख़ैरियत
तो है, नौकरों ने कोई शरारत तो नहीं की।'
रमा
ने खड़े-खड़े कहा, 'नौकरों ने नहीं, आपने शरारत की है, आपके मातहतों, अफसरों और सब ने मिलकर मुझे उल्लू बनाया है।'
दारोग़ा
ने कुछ घबडाकर पूछा, आख़िर बात क्या है, कहिए तो? '
रमानाथ-'बात यही है कि इस मुआमले में अब कोई शहादत न दूंगा। उससे मेरा ताल्लुक
नहीं। आप ने मेरे साथ चाल चली और वारंट की धमकी देकर मुझे शहादत देने पर मजबूर
किया। अब मुझे मालूम हो गया कि मेरे ऊपर कोई इलज़ाम नहीं। आप लोगों का चकमा था।
पुलिस की तरफ से शहादत नहीं देना चाहता, मैं आज जज साहब से
साफ कह दूंगा। बेगुनाहों का ख़ून अपनी गर्दन पर न लूंगा। '
दारोग़ा
ने तेज़ होकर कहा, 'आपने खुद गबन तस्लीम किया
था।'
रमानाथ-'मीजान की ग़लती थी। ग़बन न था। म्युनिसिपैलिटी ने मुझ पर कोई मुकदमा नहीं
चलाया।'
'यह आपको मालूम कैसे हुआ? '
'इससे आपको कोई बहस नहीं। मै ं शहादत न दूंगा। साफ-साफ कह दूंगा, पुलिस ने मुझे धोखा देकर शहादत दिलवाई है। जिन तारीख़ों का वह वाकया है,
उन तारीख़ों में मैं इलाहाबाद में था। म्युनिसिपल आफिस में मेरी
हाजिरी मौजूद है।'
दारोग़ा
ने इस आपत्ति को हंसी में उडाने की चेष्टा करके कहा, 'अच्छा
साहब, पुलिस ने धोखा ही दिया, लेकिन
उसका ख़ातिरख्वाह इनाम देने को भी तो हाज़िर है। कोई अच्छी जगह मिल जाएगी, मोटर पर बैठे हुए सैर करोगे। खुगिया पुलिस में कोई जगह मिल गई, तो चैन ही चैन है। सरकार की नज़रों में इज्जत और रूसूख कितना बढ़गया,
यों मारे-मारे फिरते। शायद किसी दफ्तर में क्लर्की मिल जाती,
वह भी बडी मुश्किल सेब यहां तो बैठे-बिठाए तरक्की का दरवाज़ा खुल
गया। अच्छी तरह कारगुज़ारी होगी, तो एक दिन रायबहादुर मुंशी
रमानाथ डिप्टी सुपरिंटेंडेंट हो जाओगे। तुम्हें हमारा एहसान मानना चाहिए और आप
उल्टे ख़फा होते हैं। '
रमा
पर इस प्रलोभन का कुछ असर न हुआ। बोला, 'मुझे
क्लर्क बनना मंजूर है, इस तरह की तरक्की नहीं चाहता। यह आप
ही को मुबारक रहे। इतने में डिप्टी साहब और इंस्पेक्टर भी आ पहुंचे। रमा को देखकर
इंस्पेक्टर साहब ने गरमाया, 'हमारे बाबू साहब तो पहले ही से
तैयार बैठे हैं। बस इसी की कारगुज़ारी पर वारा-न्यारा है। '
रमा
ने इस भाव से कहा, 'मानो मैं भी अपना नफा-नुकसान
समझता हूं,जी। हां, आज वारा-न्यारा कर
दूंगा। इतने दिनों तक आप लोगों के इशारे पर चला, अब अपनी
आंखों से देखकर चलूंगा। '
इंस्पेक्टर
ने दारोग़ा का मुंह देखा, दारोग़ा ने डिप्टी का मुंह
देखा, डिप्टी ने इंस्पेक्टर का मुंह देखा। यह कहता क्या है?
इंस्पेक्टर साहब विस्मित होकर बोले, 'क्या बात
है? हलफ से कहता हूं, आप कुछ नाराज
मालूम होते हैं! '
रमानाथ-'मैंने फैसला किया है कि आज अपना बयान बदल दूंगा। बेगुनाहों का ख़ून नहीं
कर सकता ।'
इंस्पेक्टर
ने दया-भाव से उसकी तरफ देखकर कहा, 'आप
बेगुनाहों का ख़ून नहीं कर रहे हैं, अपनी तकष्दीर की इमारत
खड़ी कर रहे हैं। हलफ से कहता हूं, ऐसे मौके बहुत कम आदमियों
को मिलते हैं। आज क्या बात हुई कि आप इतने खफा हो गए? आपको
कुछ मालूम है, दारोग़ा साहब, आदमियों
ने तो कोई शोखी नहीं की- अगर किसी ने आपके मिज़ाज़ के ख़िलाफ कोई काम किया हो,
तो उसे गोली मार दीजिए, हलफ से कहता हूं!
दारोग़ा
-'मैं अभी जाकर पता लगाता हूं। '
रमानाथ-'आप तकलीफ न करें। मुझे किसी से शिकायत नहीं है। मैं थोड़े से फायदे के लिए
अपने ईमान का ख़ून नहीं कर सकता। '
एक
मिनट सन्नाटा रहा। किसी को कोई बात न सूझी। दारोग़ा कोई दूसरा चकमा सोच रहे थे, इंस्पेक्टर कोई दूसरा प्रलोभन। डिप्टी एक दूसरी ही फिक्र में था। रूखेपन
से बोला, 'रमा बाबू, यह अच्छा बात न होगा।
'
रमा
ने भी गर्म होकर कहा, 'आपके लिए न होगी। मेरे लिए
तो सबसे अच्छी यही बात है। '
डिप्टी, 'नहीं, आपका वास्ते इससे बुरा दोसरा बात नहीं है। हम
तुमको छोड़ेगा नहीं, हमारा मुकदमा चाहे बिगड़ जाय, लेकिन हम तुमको ऐसा लेसन दे देगा कि तुम उमिर भर न भूलेगा। आपको वही गवाही
देना होगा जो आप दिया। अगर तुम कुछ गड़बड़ करेगा, कुछ भी
गोलमाल किया तो हम तोमारे साथ दोसरा बर्ताव करेगा। एक रिपोर्ट में तुम यों
(कलाइयों को ऊपर-नीचे रखकर) चला जायगा। '
यह
कहते हुए उसने आंखें निकालकर रमा को देखा, मानो कच्चा
ही खा जाएगा। रमा सहम उठा। इन आतंक से भरे शब्दों ने उसे विचलित कर दिया। यह सब
कोई झूठा मुकदमा चलाकर उसे फंसा दें, तो उसकी कौन रक्षा
करेगा। उसे यह आशा न थी कि डिप्टी साहब जो शील और विनय के पुतले बने हुए थे,
एकबारगी यह रूद्र रूप धारणा कर लेंगे, मगर वह
इतनी आसानी से दबने वाला न था। तेज़ होकर बोला, 'आप मुझसे
ज़बरदस्ती शहादत दिलाएंगे ?'
डिप्टी
ने पैर पटकते हुए कहा, 'हां, ज़बरदस्ती
दिलाएगा!'
रमानाथ-'यह अच्छी दिल्लगी है!'
डिप्टी-'तोम पुलिस को धोखा देना दिल्लगी समझता है। अभी दो गवाह देकर साबित कर सकता
है कि तुम राजक्रोह की बात कर रहा था। बस चला जायगा सात साल के लिए। चक्की
पीसते-पीसते हाथ में घड्डा पड़ जायगा। यह चिकना-चिकना गाल नहीं रहेगा। '
रमा
जेल से डरता था। जेल-जीवन की कल्पना ही से उसके रोएं खड़े होते थे। जेल ही के भय
से उसने यह गवाही देनी स्वीकार की थी। वही भय इस वक्त भी उसे कातर करने लगा।
डिप्टी भाव-विज्ञान का ज्ञाता था। आसन का पता पा गया। बोला, 'वहां हलवा पूरी नहीं पायगा। धूल मिला हुआ आटा का रोटी, गोभी के सड़े हुए पत्तों का रसा, और अरहर के दाल का
पानी खाने को पावेगा। काल-कोठरी का चार महीना भी हो गया, तो
तुम बच नहीं सकता वहीं मर जायगा। बात-बात पर वार्डर गाली देगा, जूतों से पीटेगा,तुम समझता क्या है! '
रमा
का चेहरा फीका पड़ने लगा। मालूम होता था, प्रतिक्षण
उसका ख़ून सूखता चला जाता है। अपनी दुर्बलता पर उसे इतनी ग्लानि हुई कि वह रो
पड़ा। कांपती हुई आवाज़ से बोला, 'आप लोगों की यह इच्छा है,
तो यही सही! भेज दीजिए जेल। मर ही जाऊंगा न, फिर
तो आप लोगों से मेरा गला छूट जायगा। जब आप यहां तक मुझे तबाह करने पर आमादा हैं,
तो मैं भी मरने को तैयार हूं। जो कुछ होना होगा, होगा। '
उसका
मन दुर्बलता की उस दशा को पहुंच गया था, जब ज़रा-सी
सहानुभूति, ज़रा-सी सह्रदयता सैकड़ों धामकियों से कहीं कारगर
हो जाती है। इंस्पेक्टर साहब ने मौका ताड़ लिया। उसका पक्ष लेकर डिप्टी से बोले,हलफ से कहता हूं, 'आप लोग आदमी को पहचानते तो हैं
नहीं, लगते हैं रोब जमाने। इस तरह गवाही देना हर एक समझदार
आदमी को बुरा मालूम होगा। यह द्ददरती बात है। जिसे ज़रा भी इज्जत का खयाल है,
वह पुलिस के हाथों की कठपुतली बनना पसंद न करेगा। बाबू साहब की जगह
मैं होता तो मैं भी ऐसा ही करता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है
कि यह हमारे खिलाफ शहादत देंगे। आप लोग अपना काम कीजिए, बाबू
साहब की तरफ से बेफिक्र रहिए, हलफ से कहता हूं। '
उसने
रमा का हाथ पकड़ लिया और बोला, 'आप मेरे साथ चलिए,
बाबूजी! आपको अच्छे-अच्छे रिकार्ड सुनाऊं। '
रमा
ने रूठे हुए बालक की तरह हाथ छुडाकर कहा, 'मुझे दिक न
कीजिए। इंस्पेक्टर साहबब अब तो मुझे जेलखाने में मरना है। '
इंस्पेक्टर
ने उसके कंधो पर हाथ रखकर कहा, 'आप क्यों ऐसी बातें
मुंह से निकालते हैं साहबब जेलखाने में मरें आपके दुश्मन। '
डिप्टी
ने तसमा भी बाकी न छोड़ना चाहाब बडे कठोर स्वर में बोला, मानो रमा से कभी का परिचय नहीं है, 'साहब, यों हम बाबू साहब के साथ सब तरह का सलूक करने को तैयार हैं, लेकिन जब वह हमारा ख़िलाफ गवाही देगा, हमारा जड़
खोदेगा, तो हम भी कार्रवाई करेगा। जरूर से करेगा। कभी छोड़
नहीं सकता। '
इसी
वक्त सरकारी एडवोकेट और बैरिस्टर मोटर से उतरे।
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