गबन: अध्याय-1.1
जागेश्वरी--मरना-जीना
तो संसार की गति है, लेते हैं, वह भी मरते हैं,नहीं लेते, वह
भी मरते हैं। अगर तुम चाहो तो छः महीने में सब रूपये चुका सकते हो'
दयानाथ
ने त्योरी चढ़ाकर कहा--जो बात जिंदगी?भर नहीं की,
वह अब आखिरी वक्त नहीं कर सकता बहू से साफ-साफ कह दो, उससे पर्दा रखने की जरूरत ही क्या है, और पर्दा रह
ही कितने दिन सकता है। आज नहीं तो कल सारा हाल मालूम ही हो जाएगा। बस तीन-चार
चीजें लौटा दे, तो काम बन जाय। तुम उससे एक बार कहो तो।
जागेश्वरी
झुंझलाकर बोली--उससे तुम्हीं कहो, मुझसे तो न कहा जायगा।
सहसा
रमानाथ टेनिस-रैकेट लिये बाहर से आया। सफेद टेनिस शर्ट था, सफेद पतलून, कैनवस का जूता, गोरे
रंग और सुंदर मुखाकृति पर इस पहनावे ने रईसों की शान पैदा कर दी थी। रूमाल में
बेले के गजरे लिये हुए था। उससे सुगंध उड़ रही थी। माता-पिता की आंखें बचाकर वह
जीने पर जाना चाहता था, कि जागेश्वरी ने टोका--इन्हीं के तो
सब कांटे बोए हुए हैं, इनसे क्यों नहीं सलाह लेते?(रमा से) तुमने नाच-तमाशे में बारह-तेरह सौ रूपये उडा दिए, बतलाओ सर्राफ को क्या जवाब दिया जाय- बडी मुश्किलों से कुछ गहने लौटाने पर
राजी हुआ, मगर बहू से गहने मांगे कौन- यह सब तुम्हारी ही
करतूत है।
रमानाथ
ने इस आक्षेप को अपने ऊपर से हटाते हुए कहा--मैंने क्या खर्च किया- जो कुछ किया
बाबूजी ने किया। हां, जो कुछ मुझसे कहा गया,
वह मैंने किया।
रमानाथ
के कथन में बहुत कुछ सत्य था। यदि दयानाथ की इच्छा न होती तो रमा क्या कर सकता था?जो कुछ हुआ उन्हीं की अनुमति से हुआ। रमानाथ पर इल्जाम रखने से तो कोई
समस्या हल न हो सकती थी। बोले--मैं तुम्हें इल्जाम नहीं देता भाई। किया तो मैंने
ही, मगर यह बला तो किसी तरह सिर से टालनी चाहिए। सर्राफ का
तकाजा है। कल उसका आदमी आवेगा। उसे क्या जवाब दिया जाएगा? मेरी
समझ में तो यही एक उपाय है कि उतने रूपये के गहने उसे लौटा दिए जायं। गहने लौटा
देने में भी वह झंझट करेगा, लेकिन दस-बीस रूपये के लोभ में लौटाने
पर राजी हो जायगा। तुम्हारी क्या सलाह है?
रमानाथ
ने शरमाते हुए कहा--मैं इस विषय में क्या सलाह दे सकता हूं, मगर मैं इतना कह सकता हूं कि इस प्रस्ताव को वह खुशी से मंजूर न करेगी।
अम्मां तो जानती हैं कि चढ़ावे में चन्द्रहार न जाने से उसे कितना बुरा लगा था।
प्रण कर लिया है, जब तक चन्द्रहार न बन जाएगा, कोई गहना न पहनूंगी।
जागेश्वरी
ने अपने पक्ष का समर्थन होते देख, खुश होकर कहा--यही तो
मैं इनसे कह रही हूं।
रमानाथ--रोना-धोना
मच जायगा और इसके साथ घर का पर्दा भी खुल जायगा।
दयानाथ
ने माथा सिकोड़कर कहा--उससे पर्दा रखने की जरूरत ही क्या! अपनी यथार्थ स्थिति को
वह जितनी ही जल्दी समझ ले, उतना ही अच्छा।
रमानाथ
ने जवानों के स्वभाव के अनुसार जालपा से खूब जीभ उडाई थी। खूब बढ़-बढ़कर बातें की
थीं। जमींदारी है, उससे कई हजार का नफा है। बैंक
में रूपये हैं, उनका सूद आता है। जालपा से अब अगर गहने की
बात कही गई, तो रमानाथ को वह पूरा लबाडिया समझेगी।
बोला--पर्दा तो एक दिन खुल ही जायगा, पर इतनी जल्दी खोल देने
का नतीजा यही होगा कि वह हमें नीच समझने लगेगी। शायद अपने घरवालों को भी लिख भेजे।
चारों तरफ बदनामी होगी।
दयानाथ--हमने
तो दीनदयाल से यह कभी न कहा था कि हम लखपती हैं।
रमानाथ--तो
आपने यही कब कहा था कि हम उधार गहने लाए हैं और दो-चार दिन में लौटा देंगे! आखिर
यह सारा स्वांग अपनी धाक बैठाने के लिए ही किया था या कुछ और?
दयानाथ--तो
फिर किसी दूसरे बहाने से मांगना पड़ेगा। बिना मांगे काम नहीं चल सकता कल या तो
रूपये देने पड़ेंगे, या गहने लौटाने पड़ेंगे। और
कोई राह नहीं।
रमानाथ
ने कोई जवाब न दिया। जागेश्वरी बोली--और कौन-सा बहाना किया जायगा- अगर कहा जाय, किसी को मंगनी देना है, तो शायद वह देगी नहीं। देगी
भी तो दो-चार दिन में लौटाएंगे कैसे ?
दयानाथ
को एक उपाय सूझा।बोले--अगर उन गहनों के बदले मुलम्मे के गहने दे दिए जाएं? मगर तुरंत ही उन्हें ज्ञात हो गया कि यह लचर बात है, खुद ही उसका विरोध करते हुए कहा--हां, बाद मुलम्मा
उड़ जायगा तो फिर लज्जित होना पड़ेगा। अक्ल कुछ काम नहीं करती। मुझे तो यही सूझता
है, यह सारी स्थिति उसे समझा दी जाय। ज़रा देर के लिए उसे
दुख तो जरूर होगा,लेकिन आगे के वास्ते रास्ता साफ हो जाएगा।
संभव
था,
जैसा दयानाथ का विचार था, कि जालपा रो-धोकर
शांत हो जायगी, पर रमा की इसमें किरकिरी होती थी। फिर वह
मुंह न दिखा सकेगा। जब वह उससे कहेगी, तुम्हारी जमींदारी
क्या हुई- बैंक के रूपये क्या हुए, तो उसे क्या जवाब देगा-
विरक्त भाव से बोला--इसमें बेइज्जती के सिवा और कुछ न होगा। आप क्या सर्राफ को
दो-चार-छः महीने नहीं टाल सकते?आप देना चाहें, तो इतने दिनों में हजार-बारह सौ रूपये बडी आसानी से दे सकते हैं।
दयानाथ
ने पूछा--कैसे ?
रमानाथ--उसी
तरह जैसे आपके और भाई करते हैं!
दयानाथ--वह
मुझसे नहीं हो सकता।
तीनों
कुछ देर तक मौन बैठे रहे। दयानाथ ने अपना फैसला सुना दिया। जागेश्वरी और रमा को यह
फैसला मंजूर न था। इसलिए अब इस गुत्थी के सुलझाने का भार उन्हीं दोनों पर था।
जागेश्वरी ने भी एक तरह से निश्चय कर लिया था। दयानाथ को झख मारकर अपना नियम
तोड़ना पड़ेगा। यह कहां की नीति है कि हमारे ऊपर संकट पडा हुआ हो और हम अपने
नियमों का राग अलापे जायं। रमानाथ बुरी तरह फंसा था। वह खूब जानता था कि पिताजी ने
जो काम कभी नहीं किया, वह आज न करेंगे। उन्हें जालपा
से गहने मांगने में कोई संकोच न होगा और यही वह न चाहता था। वह पछता रहा था कि
मैंने क्यों जालपा से डींगें मारीं। अब अपने मुंह की लाली रखने का सारा भार उसी पर
था। जालपा की अनुपम छवि ने पहले ही दिन उस पर मोहिनी डाल दी थी। वह अपने सौभाग्य
पर फूला न समाता था। क्या यह घर ऐसी अनन्य सुंदरी के योग्य था? जालपा के पिता पांच रूपये के नौकर थे, पर जालपा ने
कभी अपने घर में झाड़ू न लगाई थी। कभी अपनी धोती न छांटी थी। अपना बिछावन न बिछाया
था। यहां तक कि अपनी के धोती की खींच तक न सी थी। दयानाथ पचास रूपये पाते थे,
पर यहां केवल चौका-बासन करने के लिए महरी थी। बाकी सारा काम अपने ही
हाथों करना पड़ता था। जालपा शहर और देहात का फर्क क्या जाने! शहर में रहने का उसे
कभी अवसर ही न पडाथा। वह कई बार पति और सास से साश्चर्य पूछ चुकी थी, क्या यहां कोई नौकर नहीं है? जालपा के घर दूध-दही-घी
की कमी नहीं थी। यहां बच्चों को भी दूध मयस्सर न था। इन सारे अभावों की पूर्ति के
लिए रमानाथ के पास मीठी-मीठी बडी- बडी बातों के सिवा और क्या था। घर का किराया
पांच रूपया था, रमानाथ ने पंद्रह बतलाए थे। लड़कों की शिक्षा
का खर्च मुश्किल से दस रूपये था, रमानाथ ने चालीस बतलाए थे।
उस समय उसे इसकी ज़रा भी शंका न थी, कि एक दिन सारा भंडा फट
जायगा। मिथ्या दूरदर्शी नहीं होता, लेकिन वह दिन इतनी जल्दी
आयगा, यह कौन जानता था। अगर उसने ये डींगें न मारी होतीं,
तो जागेश्वरी की तरह वह भी सारा भार दयानाथ पर छोड़कर निश्चिन्त हो
जाता, लेकिन इस वक्त वह अपने ही बनाए हुए जाल में फंस गया था।
कैसे निकले! उसने कितने ही उपाय सोचे, लेकिन कोई ऐसा न था,
जो आगे चलकर उसे उलझनों में न डाल देता, दलदल
में न फंसा देता। एकाएक उसे एक चाल सूझी। उसका दिल उछल पडा, पर
इस बात को वह मुंह तक न ला सका, ओह!
कितनी
नीचता है! कितना कपट! कितनी निर्दयता! अपनी प्रेयसी के साथ ऐसी धूर्तता! उसके मन
ने उसे धिक्काराब अगर इस वक्त उसे कोई एक हजार रूपया दे देता, तो वह उसका उम्रभर के लिए गुलाम हो जाता।
दयानाथ
ने पूछा--कोई बात सूझी?मुझे तो कुछ नहीं सूझता।
कोई
उपाय सोचना ही पड़ेगा।आप ही सोचिए, मुझे तो कुछ
नहीं सूझता।
क्यों
नहीं उससे दो-तीन गहने मांग लेते?तुम चाहो तो ले सकते हो,
हमारे
लिए मुश्किल है।
मुझे
शर्म आती है।
तुम
विचित्र आदमी हो, न खुद मांगोगे न मुझे मांगने
दोगे, तो आखिर यह नाव कैसे चलेगी? मैं
एक बार नहीं, हजार बार कह चुका कि मुझसे कोई आशा मत रक्खो।
मैं अपने आखिरी दिन जेल में नहीं काट सकता इसमें शर्म की क्या बात है, मेरी समझ में नहीं आता। किसके जीवन में ऐसे कुअवसर नहीं आते?तुम्हीं अपनी मां से पूछो।
जागेश्वरी
ने अनुमोदन किया--मुझसे तो नहीं देखा जाता था कि अपना आदमी चिंता में पडा रहे, मैं गहने पहने बैठी रहूं। नहीं तो आज मेरे पास भी गहने न होते?एक-एक करके सब निकल गए। विवाह में पांच हजार से कम का चढ़ावा नहीं गया था,
मगर पांच ही साल में सब स्वाहा हो गया। तब से एक छल्ला बनवाना भी
नसीब न हुआ।
दयानाथ
ज़ोर देकर बोले--शर्म करने का यह अवसर नहीं है। इन्हें मांगना पड़ेगा!
रमानाथ
ने झेंपते हुए कहा--मैं मांग तो नहीं सकता, कहिए उठा
लाऊं।
यह
कहते-कहते लज्जा, क्षोभ और अपनी नीचता के ज्ञान
से उसकी आंखें सजल हो गई।
दयानाथ
ने भौंचक्ध होकर कहा--उठा लाओगे, उससे छिपाकर?
रमानाथ
ने तीव्र कंठ से कहा--और आप क्या समझ रहे हैं?
दयानाथ
ने माथे पर हाथ रख लिया, और एक क्षण के बाद आहत कंठ से
बोले--नहीं, मैं ऐसा न करने दूंगा। मैंने छल कभी नहीं किया,
और न कभी करूंगा। वह भी अपनी बहू के साथ! छिः-छिः, जो काम सीधे से चल सकता है, उसके लिए यह फरेब- कहीं
उसकी निगाह पड़ गई, तो समझते हो, वह
तुम्हें दिल में क्या समझेगी? मांग लेना इससे कहीं अच्छा है।
रमानाथ--आपको
इससे क्या मतलब। मुझसे चीज़ें ले लीजिएगा, मगर जब आप
जानते थे, यह नौबत आएगी, तो इतने जेवर
ले जाने की जरूरत ही क्या थी ? व्यर्थ की विपत्ति मोल ली।
इससे कई लाख गुना अच्छा था कि आसानी से जितना ले जा सकते, उतना
ही ले जाते। उस भोजन से क्या लाभ कि पेट में पीडा होने लगे?मैं
तो समझ रहा था कि आपने कोई मार्ग निकाल लिया होगा। मुझे क्या मालूम था कि आप मेरे
सिर यह मुसीबतों की टोकरी पटक देंगे। वरना मैं उन चीज़ों को कभी न ले जाने देता।
दयानाथ
कुछ लज्जित होकर बोले--इतने पर भी चन्द्रहार न होने से वहां हाय-तोबा मच गई।
रमानाथ--उस
हाय-तोबा से हमारी क्या हानि हो सकती थी। जब इतना करने पर भी हाय-तोबा मच गई, तो मतलब भी तो न पूरा हुआ। उधर बदनामी हुई, इधर यह
आफत सिर पर आई। मैं यह नहीं दिखाना चाहता कि हम इतने फटेहाल हैं। चोरी हो जाने पर
तो सब्र करना ही पड़ेगा।
दयानाथ
चुप हो गए। उस आवेश में रमा ने उन्हें खूब खरी-खरी सुनाई और वह चुपचाप सुनते रहे।
आखिर जब न सुना गया, तो उठकर पुस्तकालय चले गए। यह
उनका नित्य का नियम था। जब तक दो-चार पत्र-पत्रिकाएं न पढ़लें, उन्हें खाना न हजम होता था। उसी सुरक्षित गढ़ी में पहुंचकर घर की चिंताओं
और बाधाओं से उनकी जान बचती थी। रमा भी वहां से उठा, पर
जालपा के पास न जाकर अपने कमरे में गया। उसका कोई कमरा अलग तो था नहीं, एक ही मर्दाना कमरा था, इसी में दयानाथ अपने दोस्तों
से गप-शप करते, दोनों लङके पढ़ते और रमा मित्रों के साथ
शतरंज खेलता। रमा कमरे में पहुंचा, तो दोनों लङके ताश खेल
रहे थे। गोपी का तेरहवां साल था, विश्वम्भर का नवां। दोनों
रमा से थरथर कांपते थे। रमा खुद खूब ताश और शतरंज खेलता, पर
भाइयों को खेलते देखकर हाथ में खुजली होने लगती थी। खुद चाहे दिनभर सैर - सपाटे
किया करे, मगर क्या मजाल कि भाई कहीं घूमने निकल जायं।
दयानाथ खुद लड़कों को कभी न मारते थे। अवसर मिलता, तो उनके
साथ खेलते थे। उन्हें कनकौवे उडाते देखकर उनकी बाल-प्रकृति सजग हो जाती थी। दो-चार
पेंच लडादेते। बच्चों के साथ कभी-कभी गुल्ली-डंडा भी खेलते थे। इसलिए लङके जितना
रमा से डरते, उतना ही पिता से प्रेम करते थे।
रमा
को देखते ही लड़कों ने ताश को टाट के नीचे छिपा दिया और पढ़ने लगे। सिर झुकाए चपत
की प्रतीक्षा कर रहे थे, पर रमानाथ ने चपत नहीं लगाई,
मोढ़े पर बैठकर गोपीनाथ से बोला--तुमने भंग की दुकान देखी है न,
नुक्कड़ पर?
गोपीनाथ
प्रसन्न होकर बोला--हां, देखी क्यों नहीं। जाकर चार
पैसे का माजून ले लो, दौड़े हुए आना। हां, हलवाई की दुकान से आधा सेर मिठाई भी लेते आना। यह रूपया लो।
कोई
पंद्रह मिनट में रमा ये दोनों चीज़ें ले, जालपा के
कमरे की ओर चला। रात के दस बज गए थे। जालपा खुली हुई छत पर लेटी हुई थी। जेठ की
सुनहरी चांदनी में सामने फैले हुए नगर के कलश, गुंबद और
वृक्ष स्वप्न-चित्रों से लगते थे। जालपा की आंखें चंद्रमा की ओर लगी हुई थीं। उसे
ऐसा मालूम हो रहा था, मैं चंद्रमा की ओर उड़ी जा रही हूं।
उसे अपनी नाक में खुश्की, आंखों में जलन और सिर में चक्कर
मालूम हो रहा था। कोई बात ध्यान में आते ही भूल जाती, और
बहुत याद करने पर भी याद न आती थी। एक बार घर की याद आ गई, रोने
लगी। एक ही क्षण में सहेलियों की याद आ गई, हंसने लगी। सहसा
रमानाथ हाथ में एक पोटली लिये, मुस्कराता हुआ आया और चारपाई
पर बैठ गया।
जालपा
ने उठकर पूछा--पोटली में क्या है?
रमानाथ--बूझ
जाओ तो जानूं ।
जालपा--हंसी
का गोलगप्पा है! (यह कहकर हंसने लगी।)
रमानाथ-मलतब?
जालपा--नींद
की गठरी होगी!
रमानाथ--मलतब?
जालपा--तो
प्रेम की पिटारी होगी!
रमानाथ-
ठीक,
आज मैं तुम्हें फूलों की देवी बनाऊंगा।
जालपा
खिल उठी। रमा ने बडे अनुराग से उसे फूलों के गहने पहनाने शुरू किए, फूलों के शीतल कोमल स्पर्श से जालपा के कोमल शरीर में गुदगुदी-सी होने लगी।
उन्हीं फूलों की भांति उसका एक-एक रोम प्रफुल्लित हो गया।
रमा
ने मुस्कराकर कहा--कुछ उपहार?
जालपा
ने कुछ उत्तर न दिया। इस वेश में पति की ओर ताकते हुए भी उसे संकोच हुआ। उसकी बडी
इच्छा हुई कि ज़रा आईने में अपनी छवि देखे। सामने कमरे में लैंप जल रहा था, वह उठकर कमरे में गई और आईने के सामने खड़ी हो गई। नशे की तरंग में उसे
ऐसा मालूम हुआ कि मैं सचमुच फूलों की देवी हूं। उसने पानदान उठा लिया और बाहर आकर
पान बनाने लगी। रमा को इस समय अपने कपट-व्यवहार पर बडी ग्लानि हो रही थी। जालपा ने
कमरे से लौटकर प्रेमोल्लसित नजरों से उसकी ओर देखा, तो उसने
मुंह उधर लिया। उस सरल विश्वास से भरी हुई आंखों के सामने वह ताक न सका। उसने
सोचा--मैं कितना बडा कायर हूं। क्या मैं बाबूजी को साफ-साफ जवाब न दे सकता था?मैंने हामी ही क्यों भरी- क्या जालपा से घर की दशा साफ-साफ कह देना मेरा
कर्तव्य न था - उसकी आंखें भर आई। जाकर मुंडेर के पास खडा हो गया। प्रणय के उस
निर्मल प्रकाश में उसका मनोविकार किसी भंयकर जंतु की भांति घूरता हुआ जान पड़ता
था। उसे अपने ऊपर इतनी घृणा हुई कि एक बार जी में आया, सारा
कपट-व्यवहार खोल दूं, लेकिन संभल गया। कितना भयंकर परिणाम
होगा। जालपा की नज़रों से फिर जाने की कल्पना ही उसके लिए असह्य थी।
जालपा
ने प्रेम-सरस नजरों से देखकर कहा - मेरे दादाजी तुम्हें देखकर गए और अम्मांजी से
तुम्हारा बखान करने लगे, तो मैं सोचती थी कि तुम कैसे
होगे। मेरे मन में तरह-तरह के चित्र आते थे। '
रमानाथ
ने एक लंबी सांस खींची। कुछ जवाब न दिया।
जालपा
ने फिर कहा - मेरी सखियां तुम्हें देखकर मुग्ध हो गई। शहजादी तो खिड़की के सामने
से हटती ही न थी। तुमसे बातें करने की उसकी बडी इच्छा थी। जब तुम अंदर गए थे तो
उसी ने तुम्हें पान के बीड़े दिए थे, याद है?'
रमा
ने कोई जवाब न दिया ।
जालपा--अजी, वही जो रंग-रूप में सबसे अच्छी थी, जिसके गाल पर एक
तिल था, तुमने उसकी ओर बडे प्रेम से देखा था, बेचारी लाज के मारे गड़ गई थी। मुझसे कहने लगी, जीजा
तो बडे रसिक जान पड़ते हैं। सखियों ने उसे खूब चिढ़ाया, बेचारी
रूआंसी हो गई। याद है? '
रमा
ने मानो नदी में डूबते हुए कहा--मुझे तो याद नहीं आता।'
जालपा--अच्छा, अबकी चलोगे तो दिखा दूंगी। आज तुम बाज़ार की तरफ गए थे कि नहीं?'
रमा
ने सिर झुकाकर कहा--आज तो फुरसत नहीं मिली।'
जालपा--जाओ, मैं तुमसे न बोलूंगी! रोज हीले-हवाले करते हो अच्छा, कल ला दोगे न?'
रमानाथ
का कलेजा मसोस उठा। यह चन्द्रहार के लिए इतनी विकल हो रही है। इसे क्या मालूम कि
दुर्भाग्य इसका सर्वस्व लूटने का सामान कर रहाहै। जिस सरल बालिका पर उसे अपने
प्राणों को न्योछावर करना चाहिए था, उसी का
सर्वस्व अपहरण करने पर वह तुला हुआ है! वह इतना व्यग्र हुआ,कि
जी में आया, कोठे से कूदकर प्राणों का अंत कर दे।
आधी
रात बीत चुकी थी। चन्द्रमा चोर की भांति एक वृक्ष की आड़ से झांक रहा था। जालपा
पति के गले में हाथ डाले हुए निद्रा में मग्न थी। रमा मन में विकट संकल्प करके
धीरे से उठा, पर निद्रा की गोद में सोए हुए पुष्प
प्रदीप ने उसे अस्थिर कर दिया। वह एक क्षण खडा मुग्ध नजरों से जालपा के
निद्रा-विहसित मुख की ओर देखता रहा। कमरे में जाने का साहस न हुआ। फिर लेट गया।
जालपा
ने चौंककर पूछा--कहां जाते हो, क्या सवेरा हो गया?
रमानाथ--अभी
तो बडी रात है।
जालपा--तो
तुम बैठे क्यों हो?
रमानाथ--कुछ
नहीं,
ज़रा पानी पीने उठा था।
जालपा
ने प्रेमातुर होकर रमा के गले में बांहें डाल दीं और उसे सुलाकर कहा--तुम इस तरह
मुझ पर टोना करोगे, तो मैं भाग जाऊंगी। न जाने
किस तरहताकते हो, क्या करते हो, क्या
मंत्र पढ़ते हो कि मेरा मन चंचल हो जाता है। बासन्ती सच कहती थी, पुरूषों की आंख में टोना होता है।
रमा
ने फटे हुए स्वर में कहा--टोना नहीं कर रहा हूं, आंखों
की प्यास बुझा रहा हूं।
दोनों
फिर सोए,
एक उल्लास में डूबी हुई, दूसरा चिंता में
मग्न।
तीन
घंटे और गुजर गए। द्वादशी के चांद ने अपना विश्व-दीपक बुझा दिया। प्रभात की
शीतल-समीर प्रकृति को मद के प्याले पिलाती फिरती थी। आधी रात तक जागने वाला बाज़ार
भी सो गया। केवल रमा अभी तक जाग रहा था। मन में भांति-भांति के तर्क-वितर्क उठने
के कारण वह बार-बार उठता था और फिर लेट जाता था। आखिर जब चार बजने की आवाज़ कान
में आई,
तो घबराकर उठ बैठा और कमरे में जा पहुंचा। गहनों का संदूकचा आलमारी
में रक्खा हुआ था, रमा ने उसे उठा लिया, और थरथर कांपता हुआ नीचे उतर गया। इस घबराहट में उसे इतना अवकाश न मिला कि
वह कुछ गहने छांटकर निकाल लेता। दयानाथ नीचे बरामदे में सो रहे थे। रमा ने उन्हें
धीरे-से जगाया, उन्होंने हकबकाकर पूछा -कौन
रमा
ने होंठ पर उंगली रखकर कहा--मैं हूं। यह संदूकची लाया हूं। रख लीजिए।
दयानाथ
सावधन होकर बैठ गए। अभी तक केवल उनकी आंखें जागी थीं, अब चेतना भी जाग्रत हो गई। रमा ने जिस वक्त उनसे गहने उठा लाने की बात कही
थी, उन्होंने समझा था कि यह आवेश में ऐसा कह रहा है। उन्हें
इसका विश्वास न आया था कि रमा जो कुछ कह रहा है, उसे भी पूरा
कर दिखाएगा। इन कमीनी चालों से वह अलग ही रहना चाहते थे। ऐसे कुत्सित कार्य में
पुत्र से साठ-गांठ करना उनकी अंतरात्मा को किसी तरह स्वीकार न था।
पूछा--इसे
क्यों उठा लाए?
रमा
ने धृष्टता से कहा--आप ही का तो हुक्म था।
दयानाथ--झूठ
कहते हो!
रमानाथ--तो
क्या फिर रख आऊं?
रमा
के इस प्रश्न ने दयानाथ को घोर संकट में डाल दिया। झेंपते हुए बोले--अब क्या रख
आओगे,
कहीं देख ले, तो गजब ही हो जाए। वही काम करोगे,
जिसमें जग-हंसाई हो खड़े क्या हो, संदूकची
मेरे बडे संदूक में रख आओ और जाकर लेट रहो कहीं जाग पड़े तो बस! बरामदे के पीछे
दयानाथ का कमरा था। उसमें एक देवदार का पुराना संदूक रखा था। रमा ने संदूकची उसके
अंदर रख दी और बडी फुर्ती से ऊपर चला गया। छत पर पहुंचकर उसने आहट ली, जालपा पिछले पहर की सुखद निद्रा में मग्न थी।
रमा
ज्योंही चारपाई पर बैठा, जालपा चौंक पड़ी और उससे चिमट
गई।
रमा
ने पूछा--क्या है, तुम चौंक क्यों पड़ीं?
जालपा
ने इधर-उधर प्रसन्न नजरों से ताककर कहा--कुछ नहीं, एक
स्वप्न देख रही थी। तुम बैठे क्यों हो, कितनी रात है अभी?
रमा
ने लेटते हुए कहा--सवेरा हो रहा है, क्या स्वप्न
देखती थीं?
जालपा--जैसे
कोई चोर मेरे गहनों की संदूकची उठाए लिये जाता हो।
रमा
का ह्रदय इतने जोर से धक-धक करने लगा, मानो उस पर
हथौड़े पड़ रहे हैं। खून सर्द हो गया। परंतु संदेह हुआ, कहीं
इसने मुझे देख तो नहीं लिया। वह ज़ोर से चिल्ला पडा--चोर! चोर! नीचे बरामदे में
दयानाथ भी चिल्ला उठे--चोर! चोर! जालपा घबडाकर उठी। दौड़ी हुई कमरे में गई,
झटके से आलमारी खोली। संदूकची वहां न थी? मूर्छित
होकर फिर पड़ी।
सवेरा
होते ही दयानाथ गहने लेकर सर्राफ के पास पहुंचे और हिसाब होने लगा। सर्राफ के
पंद्रह सौ रू. आते थे, मगर वह केवल पंद्रह सौ रू. के
गहने लेकरसंतुष्ट न हुआ। बिके हुए गहनों को वह बक्रे पर ही ले सकता था। बिकी हुई
चीज़ कौन वापस लेता है। रोकड़ पर दिए होते, तो दूसरी बात थी।
इन चीज़ों कातो सौदा हो चुका था। उसने कुछ ऐसी व्यापारिक सिद्धान्त की बातें कीं,दयानाथ को कुछ ऐसा शिकंजे में कसा कि बेचारे को हां-हां करने के सिवा और
कुछ न सूझा। दफ्तर का बाबू चतुर दुकानदार से क्या पेश पाता - पंद्रह सौ रू. में
पच्चीस सौ रू. के गहने भी चले गए, ऊपर से पचास रू. और बाकी
रह गए। इस बात पर पिता-पुत्र में कई दिन खूब वाद-विवाद हुआ। दोनों एकदूसरे को दोषी
ठहराते रहे। कई दिन आपस में बोलचाल बंद रही, मगर इस चोरी का
हाल गुप्त रखा गया। पुलिस को खबर हो जाती, तो भंडा फट जाने
का भय था। जालपा से यही कहा गया कि माल तो मिलेगा नहीं, व्यर्थ
का झंझट भले ही होगा। जालपा ने भी सोचा, जब माल ही न मिलेगा,
तो रपट व्यर्थ क्यों की जाय।
जालपा
को गहनों से जितना प्रेम था, उतना कदाचित संसार की और
किसी वस्तु से न था, और उसमें आश्चर्य की कौन-सी बात थी। जब
वह तीन वर्ष की अबोध बालिका थी, उस वक्त उसके लिए सोने के
चूड़े बनवाए गए थे। दादी जब उसे गोद में खिलाने लगती, तो
गहनों की ही चर्चा करती--तेरा दूल्हा तेरे लिए बडे सुंदर गहने लाएगा। ठुमक-ठुमककर
चलेगी। जालपा पूछती--चांदी के होंगे कि सोने के, दादीजी?
दादी
कहती--सोने के होंगे बेटी, चांदी के क्यों लाएगा- चांदी
के लाए तो तुम उठाकर उसके मुंह पर पटक देना।
मानकी
छेड़कर कहती--चांदी के तो लाएगा ही। सोने के उसे कहां मिले जाते हैं!
जालपा
रोने लगती, इस बूढ़ी दादी, मानकी,
घर की महरियां, पड़ोसिनें और दीनदयाल--सब
हंसते। उन लोगों के लिए यह विनोद का अशेष भंडार था।बालिका जब ज़रा और बडी हुई,
तो गुडियों के ब्याह करने लगी। लडके की ओर से चढ़ावे जाते, दुलहिन को गहने पहनाती, डोली में बैठाकर विदा करती,कभी-कभी दुलहिन गुडिया अपने गुये दूल्हे से गहनों के लिए मान करती,
गुड्डा बेचारा कहीं-न-कहीं से गहने लाकर स्त्री को प्रसन्न करता था।
उन्हीं दिनोंबिसाती ने उसे वह चन्द्रहार दिया, जो अब तक उसके
पास सुरक्षित था। ज़रा और बडी हुई तो बडी-बूढि.यों में बैठकर गहनों की बातें सुनने
लगी। महिलाओं के उस छोटे-से संसार में इसके सिवा और कोई चर्चा ही न थी। किसने
कौन-कौन गहने बनवाए, कितने दाम लगे, ठोस
हैं या पोले, जडाऊ हैं या सादे, किस
लडकी के विवाह में कितने गहने आए? इन्हीं महत्वपूर्ण विषयों
पर नित्य आलोचना-प्रत्यालोचना, टीका-टिप्पणी होती रहती थी।
कोई दूसरा विषय इतनारोचक, इतना ग्राह्य हो ही नहीं सकता था।
इस आभूषण-मंडित संसार में पली हुई जालपा का यह आभूषण-प्रेम स्वाभाविक ही था।
महीने-भर
से ऊपर हो गया। उसकी दशा ज्यों-की-त्यों है। न कुछ खाती-पीती है, न किसी से हंसती-बोलती है। खाट पर पड़ी हुई शून्य नजरों से शून्याकाश की
ओर ताकती रहती है। सारा घर समझाकर हार गया, पड़ोसिनें समझाकर
हार गई, दीनदयाल आकर समझा गए, पर जालपा
ने रोग- शय्या न छोड़ी। उसे अब घर में किसी पर विश्वास नहीं है, यहां तक कि रमा से भी उदासीन रहती है। वह समझती है, सारा
घर मेरी उपेक्षा कर रहा है। सबके- सब मेरे प्राण के ग्राहक हो रहे हैं। जब इनके
पास इतना धन है, तो फिर मेरे गहने क्यों नहीं बनवाते?जिससे हम सबसे अधिक स्नेह रखते हैं, उसी पर सबसे
अधिक रोष भी करते हैं। जालपा को सबसे अधिक क्रोध रमानाथ पर था। अगर यह अपने
माता-पिता से जोर देकर कहते, तो कोई इनकी बात न टाल सकता,
पर यह कुछ कहें भी- इनके मुंह में तो दही जमा हुआ है। मुझसे प्रेम
होता, तो यों निश्चिंत न बैठे रहते। जब तक सारी चीज़ें न
बनवा लेते, रात को नींद न आती। मुंह देखे की मुहब्बत है,
मां-बाप से कैसे कहें, जाएंगे तोअपनी ही ओर,
मैं कौन हूं! वह रमा से केवल खिंची ही न रहती थी, वह कभी कुछ पूछता तो दोचार जली-कटी सुना देती। बेचारा अपना-सा मुंह लेकर
रह जाता! गरीब अपनी ही लगाई हुई आग में जला जाता था। अगर वह जानता कि उन डींगों का
यह फल होगा, तो वह जबान पर मुहर लगा लेता। चिंता और ग्लानि
उसके ह्रदय को कुचले डालती थी। कहां सुबह से शाम तक हंसी-कहकहे, सैर - सपाटे में कटते थे, कहां अब नौकरी की तलाश में
ठोकरें खाता फिरता था। सारी मस्ती गायब हो गई। बार-बार अपने पिता पर क्रोध आता,
यह चाहते तो दो-चार महीने में सब रूपये अदा हो जाते, मगर इन्हें क्या फिक्र! मैं चाहे मर जाऊं पर यह अपनी टेक न छोड़ेंगे। उसके
प्रेम से भरे हुए, निष्कपट ह्रदय में आग-सी सुलगती रहती थी।
जालपा का मुरझाया हुआ मुख देखकर उसके मुंह से ठंडी सांस निकल जाती थी। वह सुखद
प्रेम-स्वप्न इतनी जल्द भंग हो गया, क्या वे दिन फिर कभी
आएंगे- तीन हज़ार के गहने कैसे बनेंगे- अगर नौकर भी हुआ, तो
ऐसा कौन-सा बडा ओहदा मिल जाएगा- तीन हज़ार तो शायद तीन जन्म में भी न जमा हों। वह
कोई ऐसा उपाय सोच निकालना चाहता था, जिसमें वह जल्द-से- जल्द
अतुल संपत्ति का स्वामी हो जाय। कहीं उसके नाम कोई लाटरी निकल आती! फिर तो वह
जालपा को आभूषणों से मढ़ देता। सबसे पहले चन्द्रहार बनवाता। उसमें हीरे जड़े होते।
अगर इस वक्त उसे जाली नोट बनाना आ जाता तो अवश्य बनाकर चला देता।एक दिन वह शाम तक
नौकरी की तलाश में मारा-मारा फिरता रहा।
शतरंज
की बदौलत उसका कितने ही अच्छे-अच्छे आदमियों से परिचय था, लेकिन वह संकोच और डर के कारण किसी से अपनी स्थिति प्रकट न कर सकता था। यह
भी जानता था कि यह मान-सम्मान उसी वक्त तक है, जब तक किसी के
समाने मदद के लिए हाथ नहीं फैलाता। यह आन टूटी, फिर कोईबात
भी न पूछेगा। कोई ऐसा भलामानुस न दीखता था, जो कुछ बिना कहे
ही जान जाए, और उसे कोई अच्छी-सी जगह दिला दे। आज उसका चित्त
बहुत खिकै था। मित्रों पर ऐसा क्रोध आ रहा था कि एक-एक को फटकारे और आएं तो द्वार
से दुत्कार दे। अब किसी ने शतरंज खेलने को बुलाया, तो ऐसी
फटकार सुनाऊंगा कि बचा याद करें, मगर वह ज़रा ग़ौर करता तो
उसे मालूम हो जाता कि इस विषय में मित्रों का उतना दोष न था, जितना खुद उसका। कोई ऐसा मित्र न था, जिससे उसने
बढ़-बढ़कर बातें न की हों। यह उसकी आदत थी। घर की असली दशा को वह सदैव बदनामी की
तरह छिपाता रहा। और यह उसी का फल था कि इतने मित्रों के होते हुए भी वह बेकार था।
वह किसी से अपनी मनोव्यथा न कह सकता था और मनोव्यथा सांस की भांति अंदर घुटकर
असह्य हो जाती है। घर में आकर मुंह लटकाए हुए बैठ गया।
जागेश्वरी
ने पानी लाकर रख दिया और पूछा--आज तुम दिनभर कहां रहे?लो हाथ- मुंह धो डालो। रमा ने लोटा उठाया ही था कि जालपा ने आकर उग्र भाव
से कहा--मुझे मेरे घर पहुंचा दो, इसी वक्त!
रमा
ने लोटा रख दिया और उसकी ओर इस तरह ताकने लगा, मानो उसकी
बात समझ में न आई हो।
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