गबन: अध्याय-5.1
प्रहार करती हुई बोली, 'अगर तुम सख्तियों और धमकियों से इतना दब सकते हो, तो तुम कायर हो तुम्हें अपने को मनुष्य कहने का कोई अधिकार नहीं। क्या सख्तियां की थीं? ज़रा सुनूं! लोगों ने तो हंसते-हंसते सिर कटा लिए हैं, अपने बेटों को मरते देखा है, कोल्हू में पेले जाना मंजूर किया है, पर सच्चाई से जौभर भी नहीं हटे, तुम भी तो आदमी हो, तुम क्यों धमकी में आ गए? क्यों नहीं छाती खोलकर खड़े हो गए कि इसे गोली का निशाना बना लो, पर मैं झूठ न बोलूंगा। क्यों नहीं सिर झुका दिया- देह के भीतर इसीलिए आत्मा रक्खी गई है कि देह उसकी रक्षा करे। इसलिए नहीं कि उसका सर्वनाश कर दे। इस पाप का क्या पुरस्कार मिला? ज़रा मालूम तो हो!
रमा
ने दबी हुई आवाज़ से कहा, 'अभी तो कुछ नहीं ।'
जालपा
ने सर्पिणी की भांति फुंकारकर कहा,यह सुनकर
मुझे बडी ख़ुशी हुई! ईश्वर करे, तुम्हें मुंह में कालिख
लगाकर भी कुछ न मिले! मेरी यह सच्चे दिल से प्रार्थना है, लेकिन
नहीं, तुम जैसे मोम के पुतलों को पुलिस वाले कभी नाराज़ न
करेंगे। तुम्हें कोई जगह मिलेगी और शायद अच्छी जगह मिले, मगर
जिस जाल में तुम फंसे हो, उसमें से निकल नहीं सकते। झूठी
गवाही, झूठे मुकदमे बनाना और पाप का व्यापार करना ही
तुम्हारे भाग्य में लिख गया। जाओ शौक
से
जिंदगी के सुख लूटो। मैंने तुमसे पहले ही कह दिया था और आज फिर कहती हूं कि मेरा
तुमसे कोई नाता नहीं है। मैंने समझ लिया कि तुम मर गए। तुम भी समझ लो कि मैं मर
गई। बस,
जाओ। मैं औरत हूं। अगर कोई धमकाकर मुझसे पाप कराना चाहे, तो चाहे उसे न मार सयं,अपनी गर्दन पर छुरी चला
दूंगी। क्या तुममें औरतों के बराबर भी हिम्मत नहीं है?
रमा
ने भिक्षुकों की भांति गिड़गिडाकर कहा, 'तुम मेरा
कोई उज्र न सुनोगी?'
जालपा
ने अभिमान से कहा,'नहीं!'
'तो मैं मुंह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाऊं?''
'तुम्हारी ख़ुशी!'
'तुम मुझे क्षमा न करोगी?'
'कभी नहीं, किसी तरह नहीं!'
रमा
एक क्षण सिर झुकाए खडा रहा, तब धीरे-धीरे बरामदे के नीचे
जाकर जग्गो से बोला, '
दादी, दादा आएं तो कह देना, मुझसे ज़रा देर मिल लें। जहां
कहें, आ जाऊं?'
जग्गो
ने कुछ पिघलकर कहा, 'कल यहीं चले आना।'
रमा
ने मोटर पर बैठते हुए कहा, 'यहां अब न आऊंगा, दादी!'
मोटर
चली गई तो जालपा ने कुत्सित भाव से कहा, 'मोटर
दिखाने आए थे, जैसे
ख़रीद
ही तो लाए हों!'
जग्गो
ने भर्त्सना की, 'तुम्हें इतना बेलगाम न होना चाहिए था,
बहू! दिल पर चोट लगती है, तो आदमी को कुछ नहीं
सूझता।'
जालपा
ने निष्ठुरता से कहा, 'ऐसे हयादार नहीं हैं,
दादी! इसी सुख के लिए तो आत्मा बेचीब उनसे यह सुख भला क्या छोडा
जायगा। पूछा नहीं, दादा से मिलकर क्या करोगे? वह होते तो ऐसी फटकार सुनाते कि छठी का दूध याद आ जाता।'
जग्गो
ने तिरस्कार के भाव से कहा, 'तुम्हारी जगह मैं होती तो
मेरे मुंह से ऐसी बातें न निकलतीं। तुम्हारा हिया बडा कठोर है। दूसरा मर्द होता तो
इस तरह चुपका-चुपका सुनता- मैं तो थर-थर कांप रही थी कि कहीं तुम्हारे ऊपर हाथ न
चला दे, मगर है बडा गमखोर।'
जालपा
ने उसी निष्ठुरता से कहा, 'इसे गमखोरी नहीं कहते दादी,
यह बेहयाई है।'
देवीदीन
ने आकर कहा, 'क्या यहां भैया आए थे? मुझे मोटर पर रास्ते में दिखाई दिए थे।'
जग्गो
ने कहा,
'हां, आए थे। कह गए हैं, दादा मुझसे ज़रा मिल लें।'
देवीदीन
ने उदासीन होकर कहा, 'मिल लूंगा। यहां कोई बातचीत
हुई?'
जग्गो
ने पछताते हुए कहा, 'बातचीत क्या हुई, पहले मैंने पूजा की, मैं चुप हुई तो बहू ने अच्छी
तरह फल-माला चढ़ाई।'
जालपा
ने सिर नीचा करके कहा, 'आदमी जैसा करेगा, वैसा भोगेगा।'
जग्गो-'अपना ही समझकर तो मिलने आए थे।'
जालपा-'कोई बुलाने तो न गया था। कुछ दिनेश का पता चला, दादा!'
देवीदीन-'हां, सब पूछ आया। हाबडे में घर है। पता-ठिकाना सब
मालूम हो गया।'
जालपा
ने डरते-डरते कहा, 'इस वक्त चलोगे या कल किसी
वक्त?'
देवीदीन-'तुम्हारी जैसी मरजीब जी जाहे इसी बखत चलो, मैं तैयार
हूं।
जालपा-'थक गए होगे?'
देवीदीन-'इन कामों में थकान नहीं होती बेटी।'
आठ
बज गए थे। सड़क पर मोटरों का तांता बंध हुआ था। सड़क की दोनों पटरियों पर हज़ारों
स्त्री-पुरूष बने-ठने, हंसते-बोलते चले जाते थे।
जालपा ने सोचा, दुनिया कैसी अपने राग-रंग में मस्त है। जिसे
उसके लिए मरना हो मरे, वह अपनी टेव न छोड़ेगी। हर एक अपना
छोटा-सा मिट्टी का घरौंदा बनाए बैठा है। देश बह जाए, उसे
परवा नहीं। उसका घरौंदा बच रहे! उसके स्वार्थ में बाधा न पड़े। उसका भोला-भाला
ह्रदय बाज़ार को बंद देखकर ख़ुश होता। सभी आदमी शोक से सिर झुकाए, त्योरियां बदले उन्मभा-से नज़र आते। सभी के चेहरे भीतर की जलन से लाल
होते। वह न जानती थी कि इस जन-सागर में ऐसी छोटी-छोटी कंकडियों के गिरने से एक
हल्कोरा भी नहीं उठता, आवाज तक नहीं आती।
चवालीस
रमा
मोटर पर चला, तो उसे कुछ सूझता न था, कुछ समझ में न आता था, कहां जा रहा है। जाने हुए
रास्ते उसके लिए अनजाने हो गए थे। उसे जालपा पर क्रोध न था, ज़रा
भी नहीं। जग्गो पर भी उसे क्रोध न था। क्रोध था अपनी दुर्बलता पर, अपनी स्वार्थलोलुपता पर, अपनी कायरता पर। पुलिस के
वातावरण में उसका औचित्य-ज्ञान भ्रष्ट हो गया था। वह कितना बडा अन्याय करने जा रहा
है, उसका उसे केवल उस दिन ख़याल आया था, जब जालपा ने समझाया था। फिर यह शंका मन में उठी ही नहीं। अफसरों ने
बडी-बडी आशाएं बंधकर उसे बहला रक्खा। वह कहते, अजी बीबी की
कुछ फिक्र न करो। जिस वक्त तुम एक जडाऊ हार लेकर पहुंचोगे और रूपयों की थैली नज़र
कर दोगे, बेगम साहब का सारा गुस्सा भाग जायगा। अपने सूबे में
किसी अच्छी-सी जगह पर पहुंच जाओगे, आराम से जिंदगी कटेगी।
कैसा गुस्सा! इसकी कितनी ही आंखों देखी मिसालें दी गई। रमा चक्कर में फंस गया। फिर
उसे जालपा से मिलने का अवसर ही न मिला। पुलिस का रंग जमता गया। आज वह जडाऊ हार जेब
में रखे जालपा को अपनी विजय की ख़ुशख़बरी देने गया था। वह जानता था जालपा पहले कुछ
नाक-भौं सिकोड़ेगी पर यह भी जानता था कि यह हार देखकर वह जरूर ख़ुश हो जायगी। कल
ही संयुक्त प्रांत के होम सेद्रेटरी के नाम कमिश्नर पुलिस का पत्र उसे मिल जाएगा।
दो-चार दिन यहां ख़ूब सैर करके घर की राह लेगा। देवीदीन और जग्गो को भी वह अपने
साथ ले जाना चाहता था। उनका एहसान वह कैसे भूल सकता था। यही मनसूबे मन में बांधकर
वह जालपा के पास गया था, जैसे कोई भक्त फल और नैवेद्य लेकर
देवता की उपासना करने जाय, पर देवता ने वरदान देने के बदले
उसके थाल को ठुकरा दिया, उसके नैवेद्य उसकी ओर ताकने का साहस
न कर सकता था। उसने सोचा, इसी वक्त ज़ज के पास चलूं और सारी
कथा कह सुनाऊं। पुलिस मेरी दुश्मन हो जाय, मुझे जेल में सडा
डाले, कोई परवा नहीं। सारी कलई खोल दूंगा। क्या जज अपना
फैसला नहीं बदल सकता- अभी तो सभी मुज़िलम हवालात में हैं। पुलिस वाले खूब दांत
पीसेंगे, खूब नाचे-यदेंगे, शायद मुझे
कच्चा ही खा जायं। खा जायं! इसी दुर्बलता ने तो मेरे मुंह में कालिख लगा दी।
जालपा
की वह क्रोधोन्मभा मूर्ति उसकी आंखों के सामने फिर गई। ओह, कितने गुस्से में थी! मैं जानता कि वह इतना बिगड़ेगी, तो चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाती, अपना बयान बदल
देता। बडा चकमा दिया इन पुलिस वालों ने, अगर कहीं जज ने कुछ
नहीं सुना और मुलिज़मों को बरी न किया, तो जालपा मेरा मुंह न
देखेगी। मैं उसके पास कौन मुंह लेकर जाऊंगा। फिर जिंदा रहकर ही क्या करूंगा। किसके
लिए?
उसने
मोटर रोकी और इधर-उधर देखने लगा। कुछ समझ में न आया, कहां
आ गया। सहसा एक चौकीदार नज़र आया। उसने उससे जज साहब के बंगले का पता पूछाब
चौकीदार हंसकर बोला, 'हुजूर तो बहुत दूर निकल आए। यहां से तो
छः-सात मील से कम न होगा, वह उधर चौरंगी की ओर रहते हैं।'
रमा
चौरंगी का रास्ता पूछकर फिर चला। नौ बज गए थे। उसने सोचा,जज साहब से मुलाकात न हुई, तो सारा खेल बिगड़ जाएगा।
बिना मिले हटूंगा ही नहीं। अगर उन्होंने सुन लिया तो ठीक ही है, नहीं कल हाईकोर्ट के जजों से कहूंगा। कोई तो सुनेगा। सारा वृत्तांत
समाचार-पत्रों में छपवा दूंगा, तब तो सबकी आंखें खुलेंगी।
मोटर
तीस मील की चाल से चल रही थी। दस मिनट ही में चौरंगी आ पहुंची। यहां अभी तक वही
चहल-पहल थी,, मगर रमा उसी ज़न्नाटे से मोटर लिये जाता
था। सहसा एक पुलिसमैन ने लाल बत्ती दिखाई। वह रूक गया और बाहर सिर निकालकर देखा,
तो वही दारोग़ाजी!
दारोग़ा
ने पूछा,
'क्या अभी तक बंगले पर नहीं गए? इतनी तेज़
मोटर न चलाया कीजिए। कोई वारदात हो जायगी। कहिए, बेगम साहब
से मुलाकात हुई? मैंने तो समझा था, वह
भी आपके साथ होंगी। ख़ुश तो ख़ूब हुई होंगी!'
रमा
को ऐसा क्रोध आया कि मूंछें उखाड़ लूं, पर बात
बनाकर बोला, 'जी हां, बहुत ख़ुश हुई।'
'मैंने कहा था न, औरतों की नाराज़ी की वही दवा है। आप
कांपे जाते थे। '
'मेरी हिमाकत थी।'
'चलिए, मैं भी आपके साथ चलता हूं। एक बाज़ी ताश उड़े
और ज़रा सरूर जमेब डिप्टी साहब और इंस्पेक्टर साहब आएंगे। ज़ोहरा को बुलवा लेंगे।
दो घड़ी की बहार रहेगी। अब आप मिसेज़ रमानाथ को बंगले ही पर क्यों नहीं बुला लेते।
वहां उस खटिक के घर पड़ी हुई हैं।'
रमा
ने कहा,
'अभी तो मुझे एक जरूरत से दूसरी तरफ जाना है। आप मोटर ले जाएं ।मैं
पांव-पांव चला आऊंगा।'
दारोग़ा
ने मोटर के अंदर जाकर कहा, 'नहीं साहब, मुझे कोई जल्दी नहीं है। आप जहां चलना चाहें, चलिए।
मैं ज़रा भी मुख़िल न हूंगा। रमा ने कुछ चिढ़कर कहा,लेकिन
मैं अभी बंगले पर नहीं जा रहा हूं।'
दारोग़ा
ने मुस्कराकर कहा, 'मैं समझ रहा हूं, लेकिन मैं ज़रा भी मुख़िल न हूंगा। वही बेगम साहब---'
रमा
ने बात काटकर कहा, 'जी नहीं, वहां मुझे नहीं जाना है।'
दारोग़ा
-'तो क्या कोई दूसरा शिकार है? बंगले पर भी आज कुछ कम
बहार न रहेगी। वहीं आपके दिल-बहलाव का कुछ सामान हाज़िर हो जायगा।'
रमा
ने एकबारगी आंखें लाल करके कहा, 'क्या आप मुझे शोहदा समझते
हैं?मैं इतना जलील नहीं हूं।'
दारोग़ा
ने कुछ लज्जित होकर कहा, 'अच्छा साहब, गुनाह हुआ, माफ कीजिए। अब कभी ऐसी गुस्ताखी न होगी
लेकिन अभी आप अपने को खतरे से बाहर न समझेंब मैं आपको किसी ऐसी जगह न जाने दूंगा,
जहां मुझे पूरा इत्मीनान न होगा। आपको ख़बर नहीं, आपके कितने दुश्मन हैं। मैं आप ही के फायदे के ख़याल से कह रहा हूं।'
रमा
ने होंठ चबाकर कहा, 'बेहतर हो कि आप मेरे फायदे
का इतना ख़याल न करें। आप लोगों ने मुझे मलियामेट कर दिया और अब भी मेरा गला नहीं
छोड़ते। मुझे अब अपने हाल पर मरने दीजिए।मैं इस गुलामी से तंग आ गया हूं। मैं मां
के पीछे-पीछे चलने वाला बच्चा नहीं बनना चाहता। आप अपनी मोटर चाहते हैं, शौक से ले जाइए। मोटर की सवारी और बंगले में रहने के लिए पंद्रह आदमियों
को कुर्बान करना पडाहै। कोई जगह पा जाऊं, तो शायद पंद्रह सौ
आदमियों को कुर्बान करना पड़े। मेरी छाती इतनी मजबूत नहीं है। आप अपनी मोटर ले
जाइए।'
यह
कहता हुआ वह मोटर से उतर पडाऔर जल्दी से आगे बढ़गया।
दारोग़ा
ने कई बार पुकारा, 'ज़रा सुनिए, बात तो सुनिए, ' लेकिन उसने पीछे फिरकर देखा तक
नहीं। ज़रा और आगे चलकर वह एक मोड़ से घूम गया। इसी सडक। पर जज का बंगला था। सड़क
पर कोई आदमी न मिला। रमा कभी इस पटरी पर और कभी उस पटरी पर जा-जाकर बंगलों के नंबर
पढ़ता चला जाता था। सहसा एक नंबर देखकर वह रूक गया। एक मिनट तक खडा देखता रहा कि
कोई निकले तो उससे पूछूं साहब हैं या नहीं। अंदर जाने की उसकी हिम्मत
न
पड़ती थी। ख़याल आया, जज ने पूछा, तुमने क्यों झूठी गवाही दी, तो क्या जवाब दूंगा। यह
कहना कि पुलिस ने मुझसे जबरदस्ती गवाही दिलवाई, प्रलोभन दिया,
मारने की धमकी दी, लज्जास्पद बात है। अगर वह
पूछे कि तुमने केवल दो-तीन साल की सज़ा से बचने के लिए इतना बडा कलंक सिर पर ले
लिया, इतने आदमियों की जान लेने पर उतारू हो गए, उस वक्त तुम्हारी बुद्धि कहां गई थी, तो उसका मेरे
पास क्या जवाब है?ख्वामख्वाह लज्जित होना पड़ेगा।
बेवकूफ
बनाया जाऊंगा। वह लौट पड़ा। इस लज्जा का सामना करने की उसमें सामर्थ्य न थी। लज्जा
ने सदैव वीरों को परास्त किया है। जो काल से भी नहीं डरते, वे भी लज्जा के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं करते। आग में झुंक जाना,
तलवार के सामने खड़े हो जाना, इसकी अपेक्षा
कहीं सहज है। लाज की रक्षा ही के लिए बड़े-बडे राज्य मिट गए हैं, रक्त की नदियां बह गई हैं, प्राणों की होली खेल डाली
गई है। उसी लाज ने आज रमा के पग भी पीछे हटा दिए।
शायद
जेल की सज़ा से वह इतना भयभीत न होता।
पैंतालीस
रमा
आधी रात गए सोया, तो नौ बजे दिन तक नींद न खुली
ब वह स्वप्न देख रहा था,दिनेश को फांसी हो रही है। सहसा एक
स्त्री तलवार लिये हुए फांसी की ओर दौड़ी और फांसी की रस्सी काट दी ब चारों ओर
हलचल मच गई। वह औरत जालपा थी । जालपा को लोग घेरकर पकड़ना चाहते थे,पर वह पकड़ में न आती थी। कोई उसके सामने जाने का साहस न कर सकता था । तब
उसने एक छलांग मारकर रमा के ऊपर तलवार चलाई। रमा घबडाकर उठ बैठा देखा तो दारोग़ा
और इंस्पेक्टर कमरे में खड़े हैं, और डिप्टी साहब आरामकुर्सी
पर लेटे हुए सिगार पी रहे हैं ।
दारोग़ा
ने कहा,
'आज तो आप ख़ूब सोए बाबू साहब! कल कब लौटे थे ?'
रमा
ने एक कुर्सी पर बैठकर कहा, 'ज़रा देर बाद लौट आया था। इस
मुकदमे की अपील तो हाईकोर्ट में होगी न?'
इंस्पेक्टर, 'अपील क्या होगी, ज़ाब्ते की पाबंदी होगी। आपने
मुकदमे को इतना मज़बूत कर दिया है कि वह अब किसी के हिलाए हिल नहीं सकता हलफ से
कहता हूं, आपने कमाल कर दिया। अब आप उधर से बेफिक्र हो जाइए।
हां, अभी जब तक फैसला न हो जाय, यह
मुनासिब होगा कि आपकी हिफाजत का ख़याल रक्खा जाय। इसलिए फिर पहरे का इंतज़ाम कर
दिया गया है। इधर हाईकोर्ट से फैसला हुआ, उधार आपको जगह
मिली।'
डिप्टी
साहब ने सिगार का धुआं फेंक कर कहा,यह डी. ओ.
कमिश्नर साहब ने आपको दिया है, जिसमें आपको कोई तरह की शक न
हो । देखिए,यू. पी. के होम सेद्रेटरी के नाम है । आप वहां यह
डी. ओ. दिखाएंगे, वह आपको कोई बहुत अच्छी जगह दे देगा ।
इंस्पेक्टर,कमिश्नर साहब आपसे बहुत ख़ुश हैं, हलफ से कहता हूं । डिप्टी-बहुत ख़ुश हैं। वह यू. पी. को अलग डायरेक्ट भी
चिटठी लिखेगा। तुम्हारा भाग्य खुल गया।'
यह
कहते हुए उसने डी. ओ. रमा की तरफ बढ़ा दिया। रमा ने लिफाफा खोलकर देखा और एकाएक
उसको फाड़कर पुर्जे-पुर्जे कर डाला ब तीनों आदमी विस्मय से उसका मुंह ताकने लगे ।
दारोग़ा
ने कहा,
'रात बहुत पी गए थे क्या? आपके हक में अच्छा न
होगा!'
इंस्पेक्टर, 'हलफ से कहता हूं, कमिश्नर साहब को मालूम हो जायगा,
तो बहुत नाराज होंगे।'
डिप्टी, 'इसका कुछ मतलब हमारे समझ में नहीं आया ।इसका क्या मतलब है?'
रमानाथ-'इसका यह मतलब है कि मुझे इस डी. ओ. की जरूरत नहीं है और न मैं नौकरी चाहता
हूं। मैं आज ही यहां से चला जाऊंगा।'
डिप्टी-'जब तक हाईकोर्ट का फैसला न हो जाय, तब तक आप कहीं
नहीं जा सकता।'
रमानाथ-'क्यों?'
डिप्टी-'कमिश्नर साहब का यह हुक्म है।'
रमानाथ-'मैं किसी का गुश्लाम नहीं हूं।
इंस्पेक्टर-'बाबू रमानाथ, आप क्यों बना-बनाया खेल बिगाड़ रहे हैं?जो कुछ होना था, वह हो गया। दस-पांच दिन में
हाईकोर्ट से फैसले की तसदीक हो जायगी आपकी बेहतरी इसी में है कि जो सिला मिल रहा
है, उसे ख़ुशी से लीजिए और आराम से जिंदगी के दिन बसर कीजिए।
ख़ुदा ने चाहा, तो एक दिन आप भी किसी ऊंचे ओहदे पर पहुंच
जाएंगे। इससे क्या फायदा कि अफसरों को नाराज़ कीजिए और कैद की मुसीबतें झेलिए। हलफ
से कहता हूं, अफसरों की ज़रा-सी निगाह बदल जाय, तो आपका कहीं पता न लगे। हलफ से कहता हूं, एक इशारे
में आपको दस साल की सज़ा हो जाय। आप हैं किस ख़याल में? हम
आपके साथ शरारत नहीं करना चाहते। हां, अगर आप हमें सख्ती
करने पर मजबूर करेंगे, तो हमें सख्ती करनी पड़ेगी। जेल को
आसान न समझिएगा। ख़ुदा दोज़ख में ले जाए, पर जेल की सज़ा न
दे। मार-धाड़, गाली-गुतरि वह तो वहां की मामूली सज़ा है।
चक्की में जोत दिया तो मौत ही आ गई। हलफ से कहता हूं, दोज़ख
से बदतर है जेल! '
दारोग़ा
-'यह बेचारे अपनी बेगम साहब से माज़ूर हैं ब वह शायद इनके जान की गाहक हो
रही हैं। उनसे इनकी कोर दबती है ।'
इंस्पेक्टर, 'क्या हुआ, कल तो वह हार दिया था न? फिर भी राज़ी नहीं हुई ?'
रमा
ने कोट की जेब से हार निकालकर मेज़ पर रख दिया और बोला,वह हार यह रक्खा हुआ है।
इंस्पेक्टर--
'अच्छा, इसे उन्होंने नहीं कबूल किया।'
डिप्टी-'कोई प्राउड लेडी है ।'
इंस्पेक्टर-'कुछ उनकी भी मिज़ाज़-पुरसी करने की जरूरत होगी ।'
दारोग़ा
-'यह तो बाबू साहब के रंग-ढंग और सलीके पर मुनहसर है। अगर आप ख्वामख्वाह
हमें मज़बूर न करेंगे, तो हम आपके पीछे न पडेंगे ।'
डिप्टी-'उस खटिक से भी मुचलका ले लेना चाहिए ।'
रमानाथ
के सामने एक नई समस्या आ खड़ी हुई, पहली से
कहीं जटिल, कहीं भीषण। संभव था, वह
अपने को कर्तव्य की वेदी पर बलिदान कर देता, दो-चार साल की
सज़ा के लिए अपने को तैयार कर लेता। शायद इस समय उसने अपने आत्म-समर्पण का निश्चय
कर लिया था, पर अपने साथ जालपा को भी संकट में डालने का साहस
वह किसी तरह न कर सकता था। वह पुलिस के शिकंजे में कुछ इस तरह दब गया था कि अब उसे
बेदाग निकल जाने का कोई मार्ग दिखाई न देता था ।उसने देखा कि इस लडाई में मैं पेश
नहीं पा सकता पुलिस सर्वशक्तिमान है, वह मुझे जिस तरह चाहे
दबा सकती है । उसके मिज़ाज़ की तेज़ी
गायब हो गई। विवश होकर बोला, 'आख़िर आप लोग मुझसे क्या चाहते
हैं? '
इंस्पेक्टर
ने दारोग़ा की ओर देखकर आंखें मारीं, मानो कह रहे
हों, 'आ गया पंजे में', और बोले,
'बस इतना ही कि आप हमारे मेहमान बने रहें, और
मुकदमे के हाईकोर्ट में तय हो जाने के बाद यहां से रूख़सत हो जाएं । क्योंकि उसके
बाद हम आपकी हिफाज़त के ज़िम्मेदार न होंगे। अगर आप कोई सर्टिफिकेट लेना चाहेंगे,
तो वह दे दी जाएगी, लेकिन उसे लेने या न लेने
का आपको पूरा अख्तियार है। अगर आप होशियार हैं, तो उसे लेकर
फायदा उठाएंगे, नहीं इधरउधर के धक्के खाएंगे। आपके ऊपर गुनाह
बेलज्ज़त की मसल सादिक आयगी। इसके सिवा हम आपसे और कुछ नहीं चाहते ब हलफ से कहता
हूं, हर एक चीज़ जिसकी आपको ख्वाहिश हो, यहां हाज़िर कर दी जाएगी, लेकिन जब तक मुकदमा खत्म
हो जाए, आप आज़ाद नहीं हो सकते ।
रमानाथ
ने दीनता के साथ पूछा, 'सैर करने तो जा सकूंगा,
या वह भी नहीं?'
इंस्पेक्टर
ने सूत्र रूप से कहा, 'जी नहीं! '
दारोग़ा
ने उस सूत्र की व्याख्या की, 'आपको वह आज़ादी दी गई
थी, पर आपने उसका बेजा इस्तेमाल किया ब जब तक इसका इत्मीनान
न हो जाय कि आप उसका जायज इस्तेमाल कर सकते हैं या नहीं, आप
उस हक से महरूम रहेंगे।'
दारोग़ा
ने इंस्पेक्टर की तरफ देखकर मानो इस व्याख्या की दाद देनी चाही,जो उन्हें सहर्ष मिल गई। तीनों अफसर रूख़सत हो गए और रमा एक सिगार जलाकर
इस विकट परिस्थिति पर विचार करने लगा ।
छियालीस
एक
महीना और निकल गया। मुकदमे के हाईकोर्ट में पेश होने की तिथि नियत हो गई है। रमा
के स्वभाव में फिर वही पहले की-सी भीरूता और ख़ुशामद आ गई है। अफसरों के इशारे पर
नाचता है। शराब की मात्रा पहले से बढ़ गई है, विलासिता ने
मानो पंजे में दबा लिया है। कभी-कभी उसके कमरे में एक वेश्या ज़ोहरा भी आ जाती है,
जिसका गाना वह बडे शौक से सुनता है ।
एक
दिन उसने बडी हसरत के साथ ज़ोहरा से कहा, 'मैं डरता
हूं, कहीं तुमसे प्रेम न बढ़जाय। उसका नतीजा इसके सिवा और
क्या होगा कि रो-रोकर ज़िंदगी काटूं, तुमसे वफा की उम्मीद और
क्या हो सकती है!'
ज़ोहरा
दिल में ख़ुश होकर अपनी बडी-बडी रतनारी आंखों से उसकी ओर ताकती हुई बोली,हां साहब, हम वफा क्या जानें, आख़िर
वेश्या ही तो ठहरीं! बेवफा वेश्या भी कहीं वफादार हो सकती है? '
रमा
ने आपत्ति करके पूछा, 'क्या इसमें कोई शक है?
'
ज़ोहरा
-'
'नहीं, ज़रा भी नहीं ब आप लोग हमारे पास
मुहब्बत से लबालब भरे दिल लेकर आते हैं, पर हम उसकी ज़रा भी
कद्र नहीं करतीं ब यही बात है न? '
रमानाथ-'बेशक।'
ज़ोहरा--'मुआफ कीजिएगा, आप मरदों की तरफदारी कर रहे हैं। हक
यह है कि वहां आप लोग दिल-बहलाव के लिए जाते हैं, महज़ ग़म
ग़लत करने के लिए, महज़ आनंद उठाने के लिए। जब आपको वफा की
तलाश ही नहीं होती, तो वह मिले क्यों कर- लेकिन इतना मैं
जानती हूं कि हममें जितनी बेचारियां मरदों की बेवफाई से निराश होकर अपना आराम-चैन
खो बैठती हैं, उनका पता अगर दुनिया को चले, तो आंखें खुल जायं। यह हमारी भूल है कि तमाशबीनों से वफा चाहते हैं,
चील के घोंसले में मांस ढूंढ़ते हैं, पर
प्यासा आदमी अंधे कुएं की तरफ दौडे।, तो मेरे ख़याल में उसका
कोई कसूर नहीं।'
उस
दिन रात को चलते वक्त ज़ोहरा ने दारोग़ा को ख़ुशख़बरी दी, 'आज तो हज़रत ख़ूब मजे में आए ब ख़ुदा ने चाहा, तो
दो-चार दिन के बाद बीवी का नाम भी न लें।'
दारोग़ा
ने ख़ुश होकर कहा, 'इसीलिए तो तुम्हें बुलाया
था। मज़ा तो जब है कि बीवी यहां से चली जाए। फिर हमें कोई ग़म न रहेगा। मालूम होता
है स्वराज्यवालों ने उस औरत को मिला लिया है। यह सब एक ही शैतान हैं।'
ज़ोहरा
की आमोदरफ्त बढ़ने लगी, यहां तक कि रमा ख़ुद अपने
चकमे में आ गया। उसने ज़ोहरा से प्रेम जताकर अफसरों की नजर में अपनी साख जमानी
चाही थी, पर जैसे बच्चे खेल में रो पड़ते हैं, वैसे ही उसका प्रेमाभिनय भी प्रेमोन्माद बन बैठा ज़ोहरा उसे अब वफा और
मुहब्बत की देवी मालूम होती थी। वह जालपा की-सी सुंदरी न सही, बातों में उससे कहीं चतुर, हाव-भाव में कहीं कुशल,
सम्मोहन-कला में कहीं पटु थी। रमा के ह्रदय में नए-नए मनसूबे पैदा
होने लगे। एक दिन उसने ज़ोहरा से कहा, 'ज़ोहरा -' जुदाई का समय आ रहा है । दो-चार दिन में मुझे यहां से चला जाना पडेगा ।
फिर तुम्हें क्यों मेरी याद आने लगी?'
ज़ोहरा
ने कहा,
'मैं तुम्हें न जाने दूंगी। यहीं कोई अच्छी-सी नौकरी कर लेना। फिर
हम-तुम आराम से रहेंगे ।'
रमा
ने अनुरक्त होकर कहा, 'दिल से कहती हो ज़ोहरा?
देखो, तुम्हें मेरे सिर की कसम, दग़ा मत देना।'
ज़ोहरा-'अगर यह ख़ौफ हो तो निकाह पढ़ा लो। निकाह के नाम से चिढ़ हो, तो ब्याह कर लो। पंडितों को बुलाओ। अब इसके सिवा मैं अपनी मुहब्बत का और
क्या सबूत दूं।'
रमा
निष्कपट प्रेम का यह परिचय पाकर विह्नल हो उठा। ज़ोहरा के मुंह से निकलकर इन
शब्दों की सम्मोहक-शक्ति कितनी बढ़गई थी। यह कामिनी,जिस
पर बडे-बडे रईस फिदा हैं, मेरे लिए इतना बडा त्याग करने को
तैयार है! जिस खान में औरों को बालू ही मिलता है, उसमें जिसे
सोने के डले मिल जायं, क्या वह परम भाग्यशाली नहीं है?
रमा के मन में कई दिनों तक संग्राम होता रहा। जालपा के साथ उसका
जीवन कितना नीरस, कितना कठिन हो जायगा। वह पग-पग पर अपना
धर्म और सत्य लेकर खड़ी हो जाएगी और उसका जीवन एक दीर्घ तपस्या, एक स्थायी साधना बनकर रह जाएगा। सात्विक जीवन कभी उसका आदर्श नहीं रहा।
साधारण मनुष्यों की भांति वह भी भोग-विलास करना चाहता था। जालपा की ओर से हटकर
उसका विलासासक्त मन प्रबल वेग से ज़ोहरा की ओर खिंचा। उसको व्रत-धारिणी वेश्याओं
के उदाहरण याद आने लगे। उसके साथ ही चंचल वृत्ति की गृहिणियों की मिसालें भी आ
पहुचीं। उसने निश्चय किया, यह सब ढकोसला है। न कोई जन्म से
निर्दोष है, न कोई दोषी। यह सब परिस्थिति पर निर्भर है।
ज़ोहरा
रोज आती और बंधन में एक गांठ और देकर जाती । ऐसी स्थिति में संयमी युवक का आसन भी
डोल जाता। रमा तो विलासी था। अब तक वह केवल इसलिए इधर-उधर न भटक सका था कि ज्योंही, उसके पंख निकले, जालिये ने उसे अपने पिंजरे में बंद
कर दिया। कुछ दिन पिंजरे से बाहर रहकर भी उसे उड़ने का साहस न हुआ। अब उसके सामने
एक नवीन दृश्य था, वह छोटा-सा कुल्हियों वाला पिंज़रा नहीं,
बल्कि एक गुलाबों से लहराता हुआ बाग़, जहां की
कैद में स्वाधीनता का आनंद था। वह इस बाग़ में क्यों न क्रीडा का आनंद उठाए!
सैंतालीस
रमा
ज्यों-ज्यों ज़ोहरा के प्रेम-पाश में फंसता जाता था, पुलिस
के अधिकारी वर्ग उसकी ओर से निश्शंक होते जाते थे। उसके ऊपर जो कैद लगाई गई थी,
धीरे-धीरे ढीली होने लगी। यहां तक कि एक दिन डिप्टी साहब शाम को सैर
करने चले तो रमा को भी मोटर पर बिठा लिया। जब मोटर देवीदीन की दूकान के सामने से
होकर निकली, तो रमा ने अपना सिर इस तरह भीतर खींच लिया कि
किसी की नज़र न पड़ जाय। उसके मन में बडी उत्सुकता हुई कि जालपा है या चली गई,
लेकिन वह अपना सिर बाहर न निकाल सका। मन में वह अब भी यही समझता था
कि मैंने जो रास्ता पकडाहै, वह कोई बहुत अच्छा रास्ता नहीं
है, लेकिन यह जानते हुए भी वह उसे छोड़ना न चाहता था।
देवीदीन को देखकर उसका मस्तक आप-ही-आप लज्जा से झुक जाता,वह
किसी दलील से अपना पक्ष सिद्ध न कर सकता उसने सोचा, मेरे लिए
सबसे उत्तम मार्ग यही है कि इनसे मिलना-जुलना छोड़ दूं। उस शहर में तीन प्राणियों
को छोड़कर किसी चौथे आदमी से उसका परिचय न था, जिसकी आलोचना
या तिरस्कार का उसे भय होता। मोटर इधर-उधर घूमती हुई हाबडा-ब्रिज की तरफ चली जा
रही थी, कि सहसा रमा ने एक स्त्री को सिर पर गंगा-जल का कलसा
रक्खे घाटों के ऊपर आते देखा। उसके कपड़े बहुत मैले हो रहे थे और कृशांगी ऐसी थी
कि कलसे के बोझ से उसकी गरदन दबी जाती थी। उसकी चाल कुछ-कुछ जालपा से मिलती हुई
जान पड़ी। सोचा, जालपा यहां क्या करने आवेगी, मगर एक ही पल में कार और आगे बढ़गई और रमा को उस स्त्री का मुंह दिखाई
दिया। उसकी छाती धक-से हो गई। यह जालपा ही थी। उसने खिड़की के बगल में सिर छिपाकर
गौर से देखा। बेशक जालपा थी, पर कितनी दुर्बल! मानो कोई
वृद्धा, अनाथ हो न वह कांति थी, न वह
लावण्य, न वह चंचलता, न वह गर्व,
रमा ह्रदयहीन न था। उसकी आंखें सजल हो गई। जालपा इस दशा में और मेरे
जीते जी! अवश्य देवीदीन ने उसे निकाल दिया होगा और वह टहलनी बनकर अपना निर्वाह कर
रही होगी। नहीं,देवीदीन इतना बेमुरौवत नहीं है। जालपा ने
ख़ुद उसके आश्रय में रहना स्वीकार न किया होगा। मानिनी तो है ही। कैसे मालूम हो,
क्या बात है?मोटर दूर निकल आई थी। रमा की सारी
चंचलता, सारी भोगलिप्सा गायब हो गई थी। मलिन वसना, दुखिनी जालपा की वह मूर्ति आंखों के सामने खड़ी थी।किससे कहे? क्या कहे?यहां कौन अपना है? जालपा
का नाम ज़बान पर आ जाय, तो सब-के-सब चौंक पड़ें और फिर घर से
निकलना बंद कर दें। ओह! जालपा के मुख पर शोक की कितनी गहरी छाया थी, आंखों में कितनी निराशा! आह, उन सिमटी हुई आंखों में
जले हुए ह्रदय से निकलने वाली कितनी आहें सिर पीटती हुई मालूम होती थीं, मानो उन पर हंसी कभी आई ही नहीं, मानो वह कली बिना
खिले ही मुरझा गई। कुछ देर के बाद ज़ोहरा आई, इठलाती,
मुस्कराती, लचकती, पर
रमा आज उससे भी कटा-कटा रहा।
ज़ोहरा
ने पूछा,
'आज किसी की याद आ रही है क्या?'यह कहते हुए
उसने अपनी गोल नर्म मक्खन-सी बांह उसकी गरदन में डालकर उसे अपनी ओर खींचा। रमा ने
अपनी तरफ ज़रा भी ज़ोर न किया। उसके ह्रदय पर अपना मस्तक रख दिया, मानो अब यही उसका आश्रय है। ज़ोहरा ने कोमलता में डूबे हुए स्वर में पूछा,
'सच बताओ, आज इतने उदास क्यों हो? क्या मुझसे किसी बात पर नाराज़ हो?'
रमा
ने आवेश से कांपते हुए स्वर में कहा, 'नहीं
ज़ोहरा -' तुमने मुझ अभागे पर जितनी दया की है, उसके लिए मैं हमेशा तुम्हारा एहसानमंद रहूंगा। तुमने उस वक्त मुझे संभाला,
जब मेरे जीवन की टूटी हुई किश्ती गोते खा रही थी, वे दिन मेरी जिंदगी के सबसे मुबारक दिन हैं और उनकी स्मृति को मैं अपने दिल
में बराबर पूजता रहूंगा। मगर अभागों को मुसीबत बार-बार अपनी तरफ खींचती है! प्रेम
का बंधन भी उन्हें उस तरफ खिंच जाने से नहीं रोक सकता | मैंने
जालपा को जिस सूरत में देखा है, वह मेरे दिल को भालों की तरह
छेद रहा है। वह आज फटे-मैले कपड़े पहने, सिर पर गंगा-जल का
कलसा लिये जा रही थी। उसे इस हालत में देखकर मेरा दिल टुकडे।-टुकडे। हो गया। मुझे
अपनी जिंदगी में कभी इतना रंज न हुआ था। ज़ोहरा -' कुछ नहीं
कह सकता, उस पर क्या बीत रही है।'
ज़ोहरा
ने पूछा,
'वह तो उस बुडढे मालदार खटिक के घर पर थी?'
टिप्पणियाँ