गबन
अध्याय 1
बरसात
के दिन हैं, सावन का महीना । आकाश में सुनहरी घटाएँ
छाई हुई हैं । रह - रहकर रिमझिम वर्षा होने लगती है । अभी तीसरा पहर है ; पर ऐसा मालूम हों रहा है, शाम हो गयी । आमों के बाग़
में झूला पड़ा हुआ है । लड़कियाँ भी झूल रहीं हैं और उनकी माताएँ भी । दो-चार झूल
रहीं हैं, दो चार झुला रही हैं । कोई कजली गाने लगती है,
कोई बारहमासा । इस ऋतु में महिलाओं की बाल-स्मृतियाँ भी जाग उठती
हैं । ये फुहारें मानो चिंताओं को ह्रदय से धो डालती हैं । मानो मुरझाए हुए मन को
भी हरा कर देती हैं । सबके दिल उमंगों से भरे हुए हैं । घानी साडियों ने प्रकृति
की हरियाली से नाता जोड़ा है ।
इसी
समय एक बिसाती आकर झूले के पास खडा हो गया। उसे देखते ही झूला बंद हो गया। छोटी
-बडी सबों ने आकर उसे घेर लिया। बिसाती ने अपना संदूक खोला और चमकती -दमकती चीजें
निकालकर दिखाने लगा। कच्चे मोतियों के गहने थे, कच्चे लैस
और गोटे, रंगीन मोजे, खूबसूरत गुडियां
और गुडियों के गहने, बच्चों के लट्टू और झुनझुने। किसी ने
कोई चीज ली, किसी ने कोई चीज। एक बडी-बडी आंखों वाली बालिका
ने वह चीज पसंद की, जो उन चमकती हुई चीजों में सबसे सुंदर
थी। वह गिरोजी रंग का एक चन्द्रहार था। मां से बोली--अम्मां, मैं यह हार लूंगी।
मां
ने बिसाती से पूछा--बाबा, यह हार कितने का है - बिसाती
ने हार को रूमाल से पोंछते हुए कहा- खरीद तो बीस आने की है, मालकिन
जो चाहें दे दें।
माता
ने कहा-यह तो बडा महंगा है। चार दिन में इसकी चमक-दमक जाती रहेगी।
बिसाती
ने मार्मिक भाव से सिर हिलाकर कहा--बहूजी, चार दिन में
तो बिटिया को असली चन्द्रहार मिल जाएगा!
माता
के ह्रदय पर इन सह्रदयता से भरे हुए शब्दों ने चोट की। हार ले लिया गया।
बालिका
के आनंद की सीमा न थी। शायद हीरों के हार से भी उसे इतना आनंद न होता। उसे पहनकर
वह सारे गांव में नाचती गिरी। उसके पास जो बाल-संपत्ति थी, उसमें सबसे मूल्यवान, सबसे प्रिय यही बिल्लौर का हार
था। लडकी का नाम जालपा था, माता का मानकी।
महाशय
दीनदयाल प्रयाग के छोटे - से गांव में रहते थे। वह किसान न थे पर खेती करते थे। वह
जमींदार न थे पर जमींदारी करते थे। थानेदार न थे पर थानेदारी करते थे। वह थे
जमींदार के मुख्तार। गांव पर उन्हीं की धाक थी। उनके पास चार चपरासी थे, एक घोडा, कई गाएं- - भैंसें। वेतन कुल पांच रूपये
पाते थे, जो उनके तंबाकू के खर्च को भी काफी न होता था। उनकी
आय के और कौन से मार्ग थे, यह कौन जानता है। जालपा उन्हीं की
लडकी थी। पहले उसके तीन भाई और थे, पर इस समय वह अकेली थी।
उससे कोई पूछता--तेरे भाई क्या हुए, तो वह बडी सरलता से
कहती--बडी दूर खेलने गए हैं। कहते हैं, मुख्तार साहब ने एक
गरीब आदमी को इतना पिटवाया था कि वह मर गया था। उसके तीन वर्ष के अंदर तीनों लङके
जाते रहे। तब से बेचारे बहुत संभलकर चलते थे। फूंक - फूंककर पांव रखते, दूध के जले थे, छाछ भी फूंक - फूंककर पीते थे। माता
और पिता के जीवन में और क्या अवलंब? दीनदयाल जब कभी प्रयाग
जाते, तो जालपा के लिए कोई न कोई आभूषण जरूर लाते। उनकी
व्यावहारिक बुद्धि में यह विचार ही न आता था कि जालपा किसी और चीज से अधिक प्रसन्न
हो सकती है। गुडियां और खिलौने वह व्यर्थ समझते थे, इसलिए
जालपा आभूषणों से ही खेलती थी। यही उसके खिलौने थे। वह बिल्लौर का हार, जो उसने बिसाती से लिया था, अब उसका सबसे प्यारा
खिलौना था। असली हार की अभिलाषा अभी उसके मन में उदय ही नहीं हुई थी। गांव में कोई
उत्सव होता, या कोई त्योहार पडता, तो
वह उसी हार को पहनती। कोई दूसरा गहना उसकी आंखों में जंचता ही न था। एक दिन
दीनदयाल लौटे, तो मानकी के लिए एक चन्द्रहार लाए। मानकी को
यह साके बहुत दिनों से थी। यह हार पाकर वह मुग्ध हो गई। जालपा को अब अपना हार
अच्छा न लगता, पिता से बोली--बाबूजी, मुझे
भी ऐसा ही हार ला दीजिए।
दीनदयाल
ने मुस्कराकर कहा-ला दूंगा, बेटी!
कब
ला दीजिएगा
बहुत
जल्दी ।
बाप
के शब्दों से जालपा का मन न भरा।
उसने
माता से जाकर कहा-अम्मांजी, मुझे भी अपना सा हार बनवा दो।
मां-वह
तो बहुत रूपयों में बनेगा, बेटी!
जालपा-तुमने
अपने लिए बनवाया है, मेरे लिए क्यों नहीं बनवातीं?
मां
ने मुस्कराकर कहा-तेरे लिए तेरी ससुराल से आएगा।
यह
हार छ सौ में बना था। इतने रूपये जमा कर लेना, दीनदयाल के
लिए आसान न था। ऐसे कौन बडे ओहदेदार थे। बरसों में कहीं यह हार बनने की नौबत आई
जीवन में फिर कभी इतने रूपये आयेंगे, इसमें उन्हें संदेह था।
जालपा लजाकर भाग गई, पर यह शब्द उसके ह्रदय में अंकित हो गए।
ससुराल उसके लिए अब उतनी भंयकर न थी। ससुराल से चन्द्रहार आएगा, वहां के लोग उसे माता-पिता से अधिक प्यार करेंगे, तभी
तो जो चीज ये लोग नहीं बनवा सकते, वह वहां से आएगी।
लेकिन
ससुराल से न आए तो उसके सामने तीन लड़कियों के विवाह चुके थे, किसी की ससुराल से चन्द्रहार न आया था। कहीं उसकी ससुराल
से
भी न आया तो- उसने सोचा--तो क्या माताजी अपना हार मुझे दे देंगी? अवश्य दे देंगी।
इस
तरह हंसते-खेलते सात वर्ष कट गए। और वह दिन भी आ गया, जब उसकी चिरसंचित अभिलाषा पूरी होगी।
2
मुंशी
दीनदयाल की जान - पहचान के आदमियों में एक महाशय दयानाथ थे, बडे ही सज्जन और सह्रदय कचहरी में नौकर थे और पचास रूपये वेतन पाते थे।
दीनदयाल अदालत के कीड़े थे। दयानाथ को उनसे सैकड़ों ही बार काम पड़ चुका था। चाहते,
तो हजारों वसूल करते, पर कभी एक पैसे के भी
रवादार नहीं हुए थे। दीनदयाल के साथ ही उनका यह सलूक न था?-यह
उनका स्वभाव था। यह बात भी न थी कि वह बहुत ऊँचे आदर्श के आदमी हों, पर रिश्वत को हराम समझते थे। शायद इसलिए कि वह अपनी आंखों से इस तरह के
दृश्य देख चुके थे। किसी को जेल जाते देखा था, किसी को संतान
से हाथ धोते, किसी को दुर्व्यसनों के पंजे में फंसते। ऐसी
उन्हें कोई मिसाल न मिलती थी, जिसने रिश्वत लेकर चैन किया हो
उनकी यह दृढ़ धारणा हो गई थी कि हराम की कमाई हराम ही में जाती है। यह बात वह कभी
न भूलते इस जमाने में पचास रुपए की भुगुत ही क्या पांच आदमियों का पालन बडी
मुश्किल से होता था। लङके अच्छे कपड़ों को तरसते, स्त्री
गहनों को तरसती, पर दयानाथ विचलित न होते थे। बडा लड़का दो
ही महीने तक कालेज में रहने के बाद पढ़ना छोड़ बैठा। पिता ने साफ कह दिया--मैं
तुम्हारी डिग्री के लिए सबको भूखा और नंगा नहीं रख सकता। पढ़ना चाहते हो, तो अपने पुरूषार्थ से पढ़ो। बहुतों ने किया है, तुम
भी कर सकते हो । लेकिन रमानाथ में इतनी लगन न थी। इधर दो साल से वह बिलकुल बेकार
था। शतरंज खेलता, सैर - सपाटे करता और मां और छोटे भाइयों पर
रोब जमाता। दोस्तों की बदौलत शौक पूरा होता रहता था। किसी का चेस्टर मांग लिया और
शाम को हवा खाने निकल गए। किसी का पंपःशू पहन लिया, किसी की
घड़ी कलाई पर बांधा ली। कभी बनारसी फैशन में निकले, कभी
लखनवी फैशन मेंब दस मित्रों ने एक-एक कपडा बनवा लिया, तो दस
सूट बदलने का उपाय हो गया। सहकारिता का यह बिलकुल नया उपयोग था। इसी युवक को
दीनदयाल ने जालपा के लिए पसंद किया। दयानाथ शादी नहीं करना चाहते थे। उनके पास न रूपये
थे और न एक नए परिवार का भार उठाने की हिम्मत, पर जागेश्वरी
ने त्रिया-हठ से काम लिया और इस शक्ति के सामने पुरूष को झुकना पड़ा। जागेश्वरी
बरसों से पुत्रवधू के लिए तड़प रही थी। जो उसके सामने बहुएं बनकर आइ, वे आज पोते खिला रही हैं, फिर उस दुखिया को कैसे धैर्य
होता। वह कुछ-कुछ निराश हो चली थी। ईश्वर से मनाती थी कि कहीं से बात आए। दीनदयाल
ने संदेश भेजा, तो उसको आंखें-सी मिल गई। अगर कहीं यह शिकार
हाथ से निकल गया, तो फिर न जाने कितने दिनों और राह देखनी
पड़े। कोई यहां क्यों आने लगा। न धन ही है, न जायदाद। लङके
पर कौन रीझता है। लोग तो धन देखते हैं, इसलिए उसने इस अवसर
पर सारी शक्ति लगा दी और उसकी विजय हुई।
दयानाथ
ने कहा,
भाई, तुम जानो तुम्हारा काम जाने। मुझमें समाई
नहीं है। जो आदमी अपने पेट की फिक्र नहीं कर सकता, उसका
विवाह करना मुझे तो अधर्म-सा मालूम होता है। फिर रूपये की भी तो फिक्र है। एक हजार
तो टीमटाम के लिए चाहिए, जोड़े और गहनों के लिए अलग। (कानों
पर हाथ रखकर) ना बाबा! यह बोझ मेरे मान का नहीं।
जागेश्वरी
पर इन दलीलों का कोई असर न हुआ, बोली-वह भी तो कुछ देगा-
मैं
उससे मांगने तो जाऊंगा नहीं।
तुम्हारे
मांगने की जरूरत ही न पड़ेगी। वह खुद ही देंगे। लडकी के ब्याह में पैसे का मुंह
कोई नहीं देखता। हां, मकदूर चाहिए, सो दीनदयाल पोढ़े आदमी हैं। और फिर यही एक संतान है; बचाकर रखेंगे, तो किसके लिए? दयानाथ
को अब कोई बात न सूझी, केवल यही कहा--वह चाहे लाख दे दें,
चाहे एक न दें, मैं न कहूंगा कि दो, न कहूंगा कि मत दो। कर्ज मैं लेना नहीं चाहता, और
लूं, तो दूंगा किसके घर से?
जागेश्वरी
ने इस बाधा को मानो हवा में उडाकर कहा--मुझे तो विश्वास है कि वह टीके में एक हजार
से कम न देंगे। तुम्हारे टीमटाम के लिए इतना बहुत है। गहनों का प्रबंध किसी सर्राफ
से कर लेना। टीके में एक हजार देंगे, तो क्या
द्वार पर एक हजार भी न देंगे- वही रूपये सर्राफ को दे देना। दो-चार सौ बाकी रहे,
वह धीरे-धीरे चुक जाएंगे। बच्चा के लिए कोई न कोई द्वार खुलेगा ही।
दयानाथ
ने उपेक्षा-भाव से कहा--'खुल चुका, जिसे शतरंज और सैर-सपाटे से फुरसत न मिले, उसे सभी
द्वार बंद मिलेंगे।
जागेश्वरी
को अपने विवाह की बात याद आई। दयानाथ भी तो गुलछर्रे उडाते थे लेकिन उसके आते ही
उन्हें चार पैसे कमाने की फिक्र कैसी सिर पर
सवार
हो गई थी। साल-भर भी न बीतने पाया था कि नौकर हो गए। बोली--बहू आ जाएगी, तो उसकी आंखें भी खुलेंगी, देख लेना। अपनी बात याद
करो। जब तक गले में जुआ नहीं पडा है, तभी तक यह कुलेलें हैं।
जुआ पडा और सारा नशा हिरन हुआ। निकम्मों को राह पर लाने का इससे बढ़कर और कोई उपाय
ही नहीं।
जब
दयानाथ परास्त हो जाते थे, तो अख़बार पढ़ने लगते थे।
अपनी हार को छिपाने का उनके पास यही संकेत था।
3
मुंशी
दीनदयाल उन आदमियों में से थे, जो सीधों के साथ सीधे
होते हैं, पर टेढ़ों के साथ टेढ़े ही नहीं, शैतान हो जाते हैं। दयानाथ बडा-सा मुंह खोलते, हजारों
की बातचीत करते, तो दीनदयाल उन्हें ऐसा चकमा देते कि वह
उम्र- भर याद करते। दयानाथ की सज्जनता ने उन्हें वशीभूत कर लिया। उनका विचारएक
हजार देने का था, पर एक हजार टीके ही में दे आए। मानकी ने
कहा--जब टीके में एक हजार दिया, तो इतना ही घर पर भी देना
पड़ेगा। आएगा कहां से- दीनदयाल चिढ़कर बोले--भगवान मालिक है। जब उन लोगों ने
उदारता दिखाई और लड़का मुझे सौंप दिया, तो मैं भी दिखा देना
चाहता हूं कि हम भीशरीफ हैं और शील का मूल्य पहचानते हैं। अगर उन्होंने हेकड़ी
जताई होती, तो अभी उनकी खबर लेता।
दीनदयाल
एक हजार तो दे आए, पर दयानाथ का बोझ हल्का करने
के बदले और भारी कर दिया। वह कर्ज से कोसों भागते थे। इस शादी में उन्होंने मियां
की जूती मियां की चांद वाली नीति निभाने की ठानी थी पर दीनदयाल की सह्रदयता ने
उनका संयम तोड़ दिया। वे सारे टीमटाम, नाच-तमाशे, जिनकीकल्पना का उन्होंने गला घोंट दिया था, वही रूप
धारण करके उनके सामने आ गए। बंधा हुआ घोडाथान से खुल गया, उसे
कौन रोक सकता है। धूमधाम से विवाह करने की ठन गई। पहले जोडे--गहने को उन्होंने गौण
समझ रखा था, अब वही सबसे मुख्य हो गया। ऐसा चढ़ावा हो कि
मड़वे वाले देखकर भङक उठें। सबकी आंखें खुल जाएं । कोई तीन हजार का सामान बनवा
डाला। सर्राफ को एक हजार नगद मिल गए, एक हजार के लिए एक
सप्ताह का वादा हुआ, तो उसने कोई आपत्ति न की। सोचा--दो हजार
सीधे हुए जाते हैं, पांच-सात सौ रूपये रह जाएंगे, वह कहां जाते हैं। व्यापारी की लागत निकल आती है, तो
नगद को तत्काल पाने के लिए आग्रह नहीं करता। फिर भी चन्द्रहार की कसर रह गई। जडाऊ
चन्द्रहार एक हजार से नीचे अच्छा नहीं मिल सकता था। दयानाथका जी तो लहराया कि लगे
हाथ उसे भी ले लो, किसी को नाक सिकोड़ने की जगह तो न रहेगी,
पर जागेश्वरी इस पर राजी न हुई। बाजी पलट चुकी थी।दयानाथ ने गर्म
होकर कहा--तुम्हें क्या, तुम तो घर में बैठी रहोगी। मौत तो
मेरी होगी, जब उधार के लोग नाकभौं सिकोड़ने लगेंगे।
जागेश्वरी--दोगे
कहां से,
कुछ सोचा है?
दयानाथ--कम-से-कम
एक हजार तो वहां मिल ही जाएंगे।
जागेश्वरी--खून
मुंह लग गया क्या?
दयानाथ
ने शरमाकर कहा--नहीं-नहीं, मगर आखिर वहां भी तो कुछ
मिलेगा?
जागेश्वरी--वहां
मिलेगा,
तो वहां खर्च भी होगा। नाम जोड़े गहने से नहीं होता, दान-दक्षिणा से होता है। इस तरह चन्द्रहार का प्रस्ताव रद्द हो गया।
मगर
दयानाथ दिखावे और नुमाइश को चाहे अनावश्यक समझें, रमानाथ
उसे परमावश्यक समझता था। बरात ऐसे धूम से जानी चाहिए कि गांव-भर में शोर मच जाय।
पहले दूल्हे के लिए पालकी का विचार था। रमानाथ ने मोटर पर जोर दिया। उसके मित्रों
ने इसका अनुमोदन किया, प्रस्ताव स्वीकृत हो गया।दयानाथ
एकांतप्रिय जीव थे, न किसी से मित्रता थी, न किसी से मेल-जोल। रमानाथ मिलनसार युवक था, उसके
मित्र ही इस समय हर एक काम में अग्रसरहो रहे थे। वे जो काम करते, दिल खोल कर। आतिशबाजियां बनवाई, तो अव्वल दर्जे की।
नाच ठीक किया, तो अव्वल दर्जे का; बाजे-गाजे
भी अव्वल दर्जे के, दोयम या सोयम का वहां जिक्र ही न था।
दयानाथ उसकी उच्छृंखलता देखकर चिंतित तो हो जाते थे पर कुछ कह न सकते थे। क्या
कहते!
4
नाटक
उस वक्त पास होता है, जब रसिक समाज उसे पंसद कर
लेता है। बरात का नाटक उस वक्त पास होता है, जब राह चलते
आदमी उसे पंसद कर लेते हैं। नाटक की परीक्षा चार-पांच घंटे तक होती रहती है,
बरात की परीक्षा के लिए केवल इतने ही मिनटों का समय होता है। सारी
सजावट, सारी दौड़धूप और तैयारी का निबटारा पांच मिनटों में
हो जाता है। अगर सबके मुंह से वाह-वाह निकल गया, तो तमाशा
पास नहीं तो ! रूपया, मेहनत, फिक्र,
सब अकारथ। दयानाथ का तमाशा पास हो गया। शहर में वह तीसरे दर्जे में
आता, गांव में अव्वल दर्जे में आया। कोई बाजों की धोंधों-पों-पों
सुनकर मस्त हो रहा था, कोई मोटर को आंखें गाड़-गाड़कर देख
रहा था। कुछ लोग फुलवारियों के तख्त देखकर लोट-लोट जाते थे। आतिशबाजी ही मनोरंजन
का केंद्र थी। हवाइयां जब सकै से ऊपर जातीं और आकाश में लाल, हरे, नीले, पीले, कुमकुमे-से बिखर जाते, जब चर्खियां छूटतीं और उनमें
नाचते हुए मोर निकल आते, तो लोग मंत्रमुग्ध-से हो जाते थे।
वाह, क्या कारीगरी है! जालपा के लिए इन चीजों में लेशमात्र
भी आकर्षण न था। हां, वह वर को एक आंख देखना चाहती थी,
वह भी सबसे छिपाकर; पर उस भीड़-भाड़ में ऐसा
अवसर कहां। द्वारचार के समय उसकी सखियां उसे छत पर खींच ले गई और उसने रमानाथ को
देखा। उसका सारा विराग, सारी उदासीनता, सारी मनोव्यथा मानो छू-मंतर हो गई थी। मुंह पर हर्ष की लालिमा छा गई।
अनुराग स्फूर्ति का भंडार है।
द्वारचार
के बाद बरात जनवासे चली गई। भोजन की तैयारियां होने लगीं। किसी ने पूरियां खाई, किसी ने उपलों पर खिचड़ी पकाई। देहात के तमाशा देखनेवालों के मनोरंजन के
लिए नाच-गाना होने लगा। दस बजे सहसा फिर बाजे बजने लगे। मालूम हुआ कि चढ़ावा आ रहा
है। बरात में हर एक रस्म डंके की चोट पर अदा होती है। दूल्हा कलेवा करने आ रहा है,
बाजे बजने लगे। समधी मिलने आ रहा है, बाजे
बजने लगे। चढ़ावा ज्योंही पहुंचा, घर में हलचल मच गई।
स्त्री-पुरूष, बूढ़े-जवान, सब चढ़ावा
देखने के लिए उत्सुक हो उठे। ज्योंही किश्तियां मंडप में पहुंचीं, लोग सब काम छोड़कर देखने दौड़े। आपस में धक्कम-धक्का होने लगा। मानकी
प्यास से बेहाल हो रही थी, कंठ सूखा जाता था, चढ़ावा आते ही प्यास भाग गई। दीनदयाल मारे भूख-प्यास के निर्जीव-से पड़े
थे, यह समाचार सुनते ही सचेत होकर दौड़े। मानकी एक-एक चीज़
को निकाल-निकालकर देखने और दिखाने लगी। वहां सभी इस कला के विशेषज्ञ थे। मदोऊ ने
गहने बनवाए थे, औरतों ने पहने थे, सभी
आलोचना करने लगे। चूहेदन्ती कितनी सुंदर है, कोई दस तोले की
होगी वाह! साढे। ग्यारह तोले से रत्ती-भर भी कम निकल जाए, तो
कुछ हार जाऊं! यह शेरदहां तो देखो, क्या हाथ की सफाई है! जी
चाहता है कारीगर के हाथ चूम लें। यह भी बारह तोले से कम न होगा। वाह! कभी देखा भी
है, सोलह तोले से कम निकल जाए, तो मुंह
न दिखाऊं। हां, माल उतना चोखा नहीं है। यह कंगन तो देखो,
बिलकुल पक्की जडाई है, कितना बारीक काम है कि
आंख नहीं ठहरती! कैसा दमक रहा है। सच्चे नगीने हैं। झूठे नगीनों में यह आब कहां।
चीज तो यह गुलूबंद है, कितने खूबसूरत फूल हैं! और उनके बीच
के हीरे कैसे चमक रहे हैं! किसी बंगाली सुनार ने बनाया होगा। क्या बंगालियों ने
कारीगरी का ठेका ले लिया है, हमारे देश में एक-से-एक कारीगर
पड़े हुए हैं। बंगाली सुनार बेचारे उनकी क्या बराबरी करेंगे। इसी तरह एक-एक चीज की
आलोचना होती रही। सहसा किसी ने कहा--चन्द्रहार नहीं है क्या!
मानकी
ने रोनी सूरत बनाकर कहा--नहीं, चन्द्रहार नहीं आया।
एक
महिला बोली--अरे, चन्द्रहार नहीं आया?
दीनदयाल
ने गंभीर भाव से कहा--और सभी चीजें तो हैं, एक
चन्द्रहार ही तो नहीं है।
उसी
महिला ने मुंह बनाकर कहा--चन्द्रहार की बात ही और है!
मानकी
ने चढ़ाव को सामने से हटाकर कहा--बेचारी के भाग में चन्द्रहार लिखा ही नहीं है।
इस
गोलाकार जमघट के पीछे अंधेरे में आशा और आकांक्षा की मूर्ति - सी जालपा भी खड़ी
थी। और सब गहनों के नाम कान में आते थे, चन्द्रहार
का नाम न आता था। उसकी छाती धक-धक कर रही थी। चन्द्रहार नहीं है क्या? शायद सबके नीचे हो इस तरह वह मन को समझाती रही। जब मालूम हो गया चन्द्रहार
नहीं है तो उसके कलेजे पर चोट-सी लग गई। मालूम हुआ, देह में
रक्त की बूंद भी नहीं है। मानो उसे मूर्च्छा आ जायगी। वह उन्माद की सी दशा में
अपने कमरे में आई और फूट-फूटकर रोने लगी। वह लालसा जो आज सात वर्ष हुए, उसके ह्रदय में अंकुरित हुई थी, जो इस समय पुष्प और
पल्लव से लदी खड़ी थी, उस पर वज्रपात हो गया। वह हरा-भरा
लहलहाता हुआ पौधा जल गया?-केवल उसकी राख रह गई। आज ही के दिन
पर तो उसकी समस्त आशाएं अवलंबित थीं। दुर्दैव ने आज वह अवलंब भी छीन लिया। उस
निराशा के आवेश में उसका ऐसा जी चाहने लगा कि अपना मुंह नोच डाले। उसका वश चलता,
तो वह चढ़ावे को उठाकर आग में गेंक देती। कमरे में एक आले पर शिव की
मूर्ति रक्खी हुई थी। उसने उसे उठाकर ऐसा पटका कि उसकी आशाओं की भांति वह भी
चूर-चूर हो गई। उसने निश्चय किया, मैं कोई आभूषण न पहनूंगी।
आभूषण पहनने से होता ही क्या है। जो रूप-विहीन हों, वे अपने
को गहने से सजाएं, मुझे तो ईश्वर ने यों ही सुंदरी बनाया है,
मैं गहने न पहनकर भी बुरी न लगूंगी। सस्ती चीजें उठा लाए, जिसमें रूपये खर्च होते थे, उसका नाम ही न लिया। अगर
गिनती ही गिनानी थी, तो इतने ही दामों में इसके दूने गहने आ
जाते!
वह
इसी क्रोध में भरी बैठी थी कि उसकी तीन सखियां आकर खड़ी हो गई। उन्होंने समझा था, जालपा को अभी चढ़ाव की कुछ खबर नहीं है। जालपा ने उन्हें देखते ही आंखें
पोंछ डालीं और मुस्कराने लगी।
राधा
मुस्कराकर बोली--जालपा- मालूम होता है, तूने बडी
तपस्या की थी, ऐसा चढ़ाव मैंने आज तक नहीं देखा था। अब तो
तेरी सब साध पूरी हो गई। जालपा ने अपनी लंबी-लंबी पलकें उठाकर उसकी ओर ऐसे दीन
-नजर से देखा, मानो जीवन में अब उसके लिए कोई आशा नहीं है?
हां
बहन,
सब साध पूरी हो गई। इन शब्दों में कितनी अपार मर्मान्तक वेदना भरी
हुई थी, इसका अनुमान तीनों युवतियों में कोई भी न कर सकी ।
तीनों कौतूहल से उसकी ओर ताकने लगीं, मानो उसका आशय उनकी समझ
में न आया हो बासन्ती ने कहा--जी चाहता है, कारीगर के हाथ
चूम लूं।
शहजादी
बोली--चढ़ावा ऐसा ही होना चाहिए, कि देखने वाले भड़क
उठें।
बासन्ती--तुम्हारी
सास बडी चतुर जान पड़ती हैं, कोई चीज नहीं छोड़ी।
जालपा
ने मुंह उधरकर कहा--ऐसा ही होगा।
राधा--और
तो सब कुछ है, केवल चन्द्रहार नहीं है।
शहजादी--एक
चन्द्रहार के न होने से क्या होता है बहन, उसकी जगह
गुलूबंद तो है।
जालपा
ने वक्रोक्ति के भाव से कहा--हां, देह में एक आंख के न
होने से क्या होता है, और सब अंग होते ही हैं, आंखें हुई तो क्या, न हुई तो क्या!
बालकों
के मुंह से गंभीर बातें सुनकर जैसे हमें हंसी आ जाती है, उसी तरह जालपा के मुंह से यह लालसा से भरी हुई बातें सुनकर राधा और
बासन्ती अपनी हंसी न रोक सकीं। हां, शहजादी को हंसी न आई। यह
आभूषण लालसा उसके लिए हंसने की बात नहीं, रोने की बात थी।
कृत्रिम सहानुभूति दिखाती हुई बोली--सब न जाने कहां के जंगली हैं कि और सब चीजें
तो लाए, चन्द्रहार न लाए, जो सब गहनों
का राजा है। लाला अभी आते हैं तो पूछती हूं कि तुमने यह कहां की रीति निकाली है?-ऐसा अनर्थ भी कोई करता है।
राधा
और बासन्ती दिल में कांप रही थीं कि जालपा कहीं ताड़ न जाय। उनका बस चलता तो
शहजादी का मुंह बंद कर देतीं, बार-बार उसे चुप रहने का
इशारा कर रही थीं, मगर जालपा को शहजादी का यह व्यंग्य,
संवेदना से परिपूर्ण जान पड़ा। सजल नेत्र होकर बोली--क्या करोगी
पूछकर बहन, जो होना था सो हो गया!
शहजादी--तुम
पूछने को कहती हो, मैं रूलाकर छोड़ूंगी। मेरे
चढ़ाव पर कंगन नहीं आया था, उस वक्त मन ऐसा खक्रा हुआ कि
सारे गहनों पर लात मार दूं। जब तक कंगन न बन गए, मैं नींद भर
सोई नहीं।
राधा--तो
क्या तुम जानती हो, जालपा का चन्द्रहार न बनेगा।
शहजादी--बनेगा
तब बनेगा,
इस अवसर पर तो नहीं बना। दस-पांच की चीज़ तो है नहीं, कि जब चाहा बनवा लिया, सैकड़ों का खर्च है, फिर कारीगर तो हमेशा अच्छे नहीं मिलते।
जालपा
का भग्न ह्रदय शहजादी की इन बातों से मानो जी उठा, वह
रूंधे कंठ से बोली--यही तो मैं भी सोचती हूं बहन, जब आज न
मिला, तो फिर क्या मिलेगा!
राधा
और बासन्ती मन-ही-मन शहजादी को कोस रही थीं, और थप्पड़
दिखा-दिखाकर धमका रही थीं, पर शहजादी को इस वक्त तमाशे का
मजा आ रहा था। बोली--नहीं, यह बात नहीं है जल्ली; आग्रह करने से सब कुछ हो सकता है, सास-ससुर को
बार-बार याद दिलाती रहना। बहनोईजी से दो-चार दिन रूठे रहने से भी बहुत कुछ काम
निकल सकता है। बस यही समझ लो कि घरवाले चैन न लेने पाएं, यह
बात हरदम उनके ध्यान में रहे। उन्हें मालूम हो जाय कि बिना चन्द्रहार बनवाए कुशल
नहीं। तुम ज़रा भी ढीली पड़ीं और काम बिगडा।
राधा
ने हंसी को रोकते हुए कहा--इनसे न बने तो तुम्हें बुला लें, क्यों - अब उठोगी कि सारी रात उपदेश ही करती रहोगी!
शहजादी--चलती
हूं,
ऐसी क्या भागड़ पड़ी है। हां, खूब याद आई,
क्यों जल्ली, तेरी अम्मांजी के पास बडा अच्छा
चन्द्रहार है। तुझे न देंगी।
जालपा
ने एक लंबी सांस लेकर कहा--क्या कहूं बहन, मुझे तो आशा
नहीं है।
शहजादी--एक
बार कहकर देखो तो, अब उनके कौन पहनने-ओढ़ने के
दिन बैठे हैं।
जालपा--मुझसे
तो न कहा जायगा।
शहजादी--मैं
कह दूंगी।
जालपा--नहीं-नहीं, तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं। मैं ज़रा उनके मातृस्नेह की परीक्षा लेना चाहती
हूं।
बासन्ती
ने शहजादी का हाथ पकड़कर कहा--अब उठेगी भी कि यहां सारी रात उपदेश ही देती रहेगी।
शहजादी
उठी,
पर जालपा रास्ता रोककर खड़ी हो गई और बोली--नहीं, अभी बैठो बहन, तुम्हारे पैरों पड़ती हूं।
शहजादी--जब
यह दोनों चुड़ैलें बैठने भी दें। मैं तो तुम्हें गुर सिखाती हूं और यह दोनों मुझ
पर झल्लाती हैं। सुन नहीं रही हो, मैं भी विष की गांठ हूं।
बासन्ती--विष
की गांठ तो तू है ही।
शहजादी--तुम
भी तो ससुराल से सालभर बाद आई हो, कौन-कौन-सी नई चीजें
बनवा लाई।
बासन्ती--और
तुमने तीन साल में क्या बनवा लिया।
शहजादी--मेरी
बात छोड़ो, मेरा खसम तो मेरी बात ही नहीं पूछता।
राधा--प्रेम
के सामने गहनों का कोई मूल्य नहीं।
शहजादी--तो
सूखा प्रेम तुम्हीं को गले।
इतने
में मानकी ने आकर कहा--तुम तीनों यहां बैठी क्या कर रही हो , चलो वहां लोग खाना खाने आ रहे हैं।
तीनों
युवतियां चली गई। जालपा माता के गले में चन्द्रहार की शोभा देखकर मन-ही-मन सोचने
लगी?-गहनों से इनका जी अब तक नहीं भरा।
महाशय
दयानाथ जितनी उमंगों से ब्याह करने गए थे, उतना ही
हतोत्साह होकर लौटे। दीनदयाल ने खूब दिया, लेकिन वहां से जो
कुछ मिला, वह सब नाच-तमाशे, नेगचार में
खर्च हो गया। बार-बार अपनी भूल पर पछताते, क्यों दिखावे और
तमाशे में इतने रूपये खर्च किए। इसकी जरूरत ही क्या थी, ज्यादा-से-
ज्यादा लोग यही तो कहते--महाशय बडे कृपण हैं। उतना सुन लेने में क्या हानि थी?
मैंने गांव वालों को तमाशा दिखाने का ठेका तो नहीं लिया था। यह सब
रमा का दुस्साहस है। उसी ने सारे खर्च बढ़ा-बढ़ाकर मेरा दिवाला निकाल दिया। और सब
तकाजे तो दस-पांच दिन टल भी सकते थे, पर सर्राफ किसी तरह न
मानता था। शादी के सातवें दिन उसे एक हजार रूपये देने का वादा था। सातवें दिन
सर्राफ आया, मगर यहां रूपये कहां थे? दयानाथ
में लल्लो-चप्पो की आदत न थी, मगर आज उन्होंने उसे चकमा देने
की खूब कोशिश की। किस्त बांधकर सब रूपये छः महीने में अदा कर देने का वादा किया।
फिर तीन महीने पर आए, मगर सर्राफ भी एक ही घुटा हुआ आदमी था,
उसी वक्त टला, जब दयानाथ ने तीसरे दिन बाकी
रकम की चीजें लौटा देने का वादा किया और यह भी उसकी सज्जनता ही थी। वह तीसरा दिन
भी आ गया, और अब दयानाथ को अपनी लाज रखने का कोई उपाय न
सूझता था। कोई चलता हुआ आदमी शायद इतना व्यग्र न होता, हीले-हवाले
करके महाजन को महीनों टालता रहता; लेकिन दयानाथ इस मामले में
अनाड़ी थे।
जागेश्वरी
ने आकर कहा--भोजन कब से बना ठंडा हो रहा है। खाकर तब बैठो।
दयानाथ
ने इस तरह गर्दन उठाई, मानो सिर पर सैकड़ों मन का
बोझ लदा हुआ है। बोले--तुम लोग जाकर खा लो, मुझे भूख नहीं
है।
जागेश्वरी--भूख
क्यों नहीं है, रात भी तो कुछ नहीं खाया था! इस तरह
दाना-पानी छोड़ देने से महाजन के रूपये थोड़े ही अदा हो जाएंगे।
दयानाथ--मैं
सोचता हूं, उसे आज क्या जवाब दूंगा- मैं तो यह विवाह
करके बुरा फंस गया। बहू कुछ गहने लौटा तो देगी।
जागेश्वरी--बहू
का हाल तो सुन चुके, फिर भी उससे ऐसी आशा रखते हो
उसकी टेक है कि जब तक चन्द्रहार न बन जायगा, कोई गहना ही न
पहनूंगी। सारे गहने संदूक में बंद कर रखे हैं। बस, वही एक
बिल्लौरी हार गले में डाले हुए है। बहुएं बहुत देखीं, पर ऐसी
बहू न देखी थी। फिर कितना बुरा मालूम होता है कि कल की आई बहू, उससे गहने छीन लिए जाएं।
दयानाथ
ने चिढ़कर कहा--तुम तो जले पर नमक छिड़कती हो बुरा मालूम होता है तो लाओ एक हजार
निकालकर दे दो, महाजन को दे आऊं, देती
हो? बुरा मुझे खुद मालूम होता है, लेकिन
उपाय क्या है? गला कैसे छूटेगा?
जागेश्वरी--बेटे
का ब्याह किया है कि ठट्ठा है? शादी-ब्याह में सभी
कर्ज़ लेते हैं, तुमने कोई नई बात नहीं की। खाने-पहनने के
लिए कौन कर्ज लेता है। धर्मात्मा बनने का कुछ फल मिलना चाहिए या नहीं- तुम्हारे ही
दर्जे पर सत्यदेव हैं, पक्का मकान खडाकर दिया, जमींदारी खरीद ली, बेटी के ब्याह में कुछ नहीं तो
पांच हज़ार तो खर्च किए ही होंगे।
दयानाथ--जभी
दोनों लङके भी तो चल दिए!
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