गबन: अध्याय-3.1
इस
समय उसकी दशा उस बालक की-सी थी, जो गोड़े पर नश्तर की
क्षणिक पीडा न सहकर उसके फटने, नासूर पड़ने, वर्षो खाट पर पड़े रहने और कदाचित प्राणांत हो जाने के भय को भी भूल जाता
है।
जालपा
नीचे जाने लगी, तो रमा ने कातर होकर उसे गले से लगा लिया
और इस तरह भींच-भींचकर उसे आलिंगन करने लगा, मानो यह सौभाग्य
उसे फिर न मिलेगा। कौन जानता है, यही उसका अंतिम आलिंगन हो
उसके करपाश मानो रेशम के सहस्रों तारों से संगठित होकर जालपा से चिमट गए थे। मानो
कोई मरणासन्न कृपण अपने कोष की कुजी मुट्ठी में बंद किए हो, और
प्रतिक्षण मुट्ठी कठोर पड़ती जाती हो क्या मुट्ठी को बलपूर्वक खोल देने से ही उसके
प्राण न निकल जाएंगे?
सहसा
जालपा बोली, 'मुझे कुछ रूपये तो दे दो, शायद वहां कुछ जरूरत पड़े। '
रमा
ने चौंककर कहा, 'रूपये! रूपये तो इस वक्त नहीं हैं।'
जालपा-'हैं हैं, मुझसे बहाना कर रहे हो बस मुझे दो रूपये दे
दो, और ज्यादा नहीं चाहती।'
यह
कहकर उसने रमा की जेब में हाथ डाल दिया, और कुछ पैसे
के साथ वह पत्र भी निकाल लिया।
रमा
ने हाथ बढ़ाकर पत्र को जालपा से छीनने की चेष्टा करते हुए कहा, 'काग़ज़ मुझे दे दो, सरकारी काग़ज़ है।'
जालपा-'किसका ख़त है ।ता दो?'
जालपा
ने तह किए हुए पुरजे क़ो खोलकर कहा,यह सरकारी
काग़ज़ है! झूठे कहीं के! तुम्हारा ही लिखा---
रमानाथ-'दे दो, क्यों परेशान करती हो!'
रमा
ने फिर काग़ज़ छीन लेना चाहा, पर जालपा ने हाथ पीछे
उधरकर कहा,मैं बिना पढ़े न दूंगी। कह दिया ज्यादा ज़िद करोगे,
तो फाड़ डालूंगी। रमानाथ-'अच्छा फाड़ डालो।'
जालपा-'तब तो मैं जरूर पढ़ूंगी।'
उसने
दो कदम पीछे हटकर फिर ख़त को खोला और पढ़ने लगी। रमा ने फिर उसके हाथ से काग़ज़
छीनने की कोशिश नहीं की। उसे जान पडा,आसमान फट
पडाहै, मानो कोई भंयकर जंतु उसे निफलने के लिए बढ़ा चला आता है।
वह धड़-धड़ करता हुआ ऊपर से उतरा और घर के बाहर निकल गया। कहां अपना मुंह छिपा ले-
कहां छिप जाए कि कोई उसे देख न सके।
उसकी
दशा वही थी, जो किसी नंगे आदमी की होती है। वह सिर से
पांव तक कपड़े पहने हुए भी नंगा था। आह! सारा परदा खुल गया! उसकी सारी कपटलीला खुल
गई! जिन बातों को छिपाने की उसने इतने दिनों चेष्टा की, जिनको
गुप्त रखने के लिए उसने कौन?कौन?सी
कठिनाइयां नहीं झेलीं, उन सबों ने आज मानो उसके मुंह पर
कालिख पोत दी। वह अपनी दुर्गति अपनी आंखों से नहीं देख सकता जालपा की सिसकियां,
पिता की झिड़कियां,पड़ोसियों की कनफुसकियां
सुनने की अपेक्षा मर जाना कहीं आसान होगा। जब कोई संसार में न रहेगा, तो उसे इसकी क्या परवा होगी, कोई उसे क्या कह रहा
है। हाय! केवल तीन सौ रूपयों के लिए उसका सर्वनाश हुआ जा रहा है, लेकिन ईश्वर की इच्छा है, तो वह क्या कर सकता है।
प्रियजनों की नज़रों से फिरकर जिए तो क्या जिए! जालपा उसे कितना नीच, कितना कपटी, कितना धूर्त, कितना
गपोडिया समझ रही होगी। क्या वह अपना मुंह दिखा सकता है?
क्या
संसार में कोई ऐसी जगह नहीं है, जहां वह नए जीवन का
सूत्रपात कर सके, जहां वह संसार से अलग-थलग सबसे मुंह मोड़कर
अपना जीवन काट सके। जहां वह इस तरह छिप जाय कि पुलिस उसका पता न पा सके। गंगा की
गोद के सिवा ऐसी जगह और कहां थी। अगर जीवित रहा, तो महीनेदो
महीने में अवश्य ही पकड़ लिया जाएगा। उस समय उसकी क्या दशा होगी,वह हथकडियां और बेडियां पहने अदालत में खडाहोगा। सिपाहियों का एक दल उसके
ऊपर सवार होगा। सारे शहर के लोग उसका तमाशा देखने जाएंगे। जालपा भी जाएगी। रतन भी
जाएगी। उसके पिता, संबंधी, मित्र,
अपने-पराए,सभी भिन्न-भिन्न भावों से उसकी
दुर्दशा का तमाशा देखेंगे। नहीं, वह अपनी मिट्टी यों न ख़राब
करेगा, न करेगा। इससे कहीं अच्छा है, कि
वह डूब मरे! मगर फिर ख़याल आया कि जालपा किसकी होकर रहेगी! हाय, मैं अपने साथ उसे भी ले डूबा! बाबूजी और अम्मांजी तो रो-धोकर सब्र कर
लेंगे, पर उसकी रक्षा कौन करेगा- क्या वह छिपकर नहीं रह
सकता- क्या शहर से दूर किसी छोटे-से गांव में वह अज्ञातवास नहीं कर सकता- संभव है,
कभी जालपा को उस पर दया आए, उसके अपराधों को
क्षमा कर दे। संभव है, उसके पास धन भी हो जाए, पर यह असंभव है कि वह उसके सामने आंखें सीधी कर सके। न जाने इस समय उसकी
क्या दशा होगी! शायद मेरे पत्र का आशय समझ गई हो शायद परिस्थिति का उसे कुछ ज्ञान
हो गया हो शायद उसने अम्मां को मेरा पत्र दिखाया हो और दोनों घबराई हुई मुझे खोज
रही हों। शायद पिताजी को बुलाने के लिए लड़कों को भेजा गया हो चारों तरफ मेरी तलाश
हो रही होगी। कहीं कोई इधर भी न आता हो कदाचित मौत को देखकर भी वह इस समय इतना
भयभीत न होता, जितना किसी परिचित को देखकर। आगे-पीछे चौकन्नी
आंखों से ताकता हुआ, वह उस जलती हुई धूप में चला जा रहा था,कुछ ख़बर न थी, किधरब सहसा रेल की सीटी सुनकर वह
चौंक पड़ा। अरे, मैं इतनी दूर निकल आया? रेलगाड़ी सामने खड़ी थी। उसे उस पर बैठ जाने की प्रबल इच्छा हुई, मानो उसमें बैठते ही वह सारी बाधाओं से मुक्त हो जाएगा, मगर जेब में रूपये न थे। उंगली में अंगूठी पड़ी हुई थी। उसने कुलियों के
जमादार को बुलाकर कहा, 'कहीं यह अंगूठी बिकवा सकते हो?एक रूपया तुम्हें दूंगा।
मुझे
गाड़ी में जाना है। रूपये लेकर घर से चला था, पर मालूम
होता है, कहीं फिर गए। फिर लौटकर जाने में गाड़ी न मिलेगी और
बडा भारी नुकसान हो जाएगा।'
जमादार
ने उसे सिर से पांव तक देखा, अंगूठी ली और स्टेशन के
अंदर चला गया। रमा टिकट-घर के सामने टहलने लगा। आंखें उसकी ओर लगी हुई थीं। दस
मिनट गुज़र गए और जमादार का कहीं पता नहीं। अंगूठी लेकर कहीं गायब तो नहीं हो
जाएगा! स्टेशन के अंदर जाकर उसे खोजने लगा। एक कुली से पूछा, उसने पूछा, 'जमादार का नाम क्या है?'रमा ने ज़बान दांतों से काट ली।
नाम
तो पूछा ही नहीं। बतलाए क्या? इतने में गाड़ी ने सीटी
दी, रमा अधीर हो उठा। समझ गया, जमादार
ने चरका दिया। बिना टिकट लिये ही गाड़ी में आ बैठा मन में निश्चय कर लिया, साफ कह दूंगा मेरे पास टिकट नहीं है। अगर उतरना भी पडा, तो यहां से दस पांच कोस तो चला ही जाऊंगा। गाड़ी चल दी, उस वक्त रमा को अपनी दशा पर रोना आ गया। हाय, न जाने
उसे कभी लौटना नसीब भी होगा या नहीं। फिर यह सुख के दिन कहां मिलेंगे। यह दिन तो
गए, हमेशा के लिए गए। इसी तरह सारी दुनिया से मुंह छिपाए,
वह एक दिन मर जायगा। कोई उसकी लाश पर आंसू बहाने वाला भी न होगा।
घरवाले भी रो-धोकर चुप हो रहेंगे। केवल थोड़े-से संकोच के कारण उसकी यह दशा हुई।
उसने शुरू ही से, जालपा से अपनी सच्ची हालत कह दी होती,
तो आज उसे मुंह पर कालिख लगाकर क्यों भागना पड़ता। मगर कहता कैसे,
वह अपने को अभागिनी न समझने लगती- कुछ न सही, कुछ
दिन तो उसने जालपा को सुखी रक्खा। उसकी लालसाओं की हत्या तो न होने दी। रमा के
संतोष के लिए अब इतना ही काफी था। अभी गाड़ी चले दस मिनट भी न बीते होंगे। गाड़ी
का दरवाज़ा खुला,और टिकट बाबू अंदर आए। रमा के चेहरे पर
हवाइयां उड़ने लगीं। एक क्षण में वह उसके पास आ जाएगा। इतने आदमियों के सामने उसे
कितना लज्जित होना पड़ेगा। उसका कलेजा धक-धक करने लगा। ज्यों-ज्यों टिकट बाबू उसके
समीप आता था, उसकी नाड़ी की गति तीव्र होती जाती थी। आख़िर
बला सिर पर आ ही गई। टिकट बाबू ने पूछा, 'आपका टिकट?'
रमा
ने ज़रा सावधान होकर कहा, 'मेरा टिकट तो कुलियों के
जमादार के पास ही रह गया। उसे टिकट लाने के लिए रूपये दिए थे। न जाने किधर निकल
गया।'
टिकट
बाबू को यकीन न आया, बोला, 'मैं
यह कुछ नहीं जानता। आपको अगले स्टेशन पर उतरना होगा। आप कहां जा रहे हैं?'
रमानाथ-'सफर तो बडी दूर का है, कलकत्ता तक जाना है।'
टिकट
बाबू-'आगे के स्टेशन पर टिकट ले लीजिएगा। '
रमानाथ-'यही तो मुश्किल है। मेरे पास पचास का नोट था। खिड़की पर बडी भीड़ थी।
मैंने नोट उस जमादार को टिकट लाने के लिए दिया, पर वह ऐसा
ग़ायब हुआ कि लौटा ही नहीं। शायद आप उसे पहचानते हों। लंबा-लंबा चेचकरू आदमी है।'
टिकट
बाबू-'इस विषय में आप लिखा-पढ़ी कर सकते है? मगर बिना टिकट
के जा नहीं सकते।
रमा
ने विनीत भाव से कहा, 'भाई साहब, आपसे क्या छिपाऊं। मेरे पास और रूपये नहीं हैं। आप जैसा मुनासिब समझें,
करें।'
टिकट
बाबू-'मुझे अफसोस है, बाबू साहब, कायदे
से मजबूर हूं।'
कमरे
के सारे मुसाफिर आपस में कानाफूसी करने लगे। तीसरा दर्जा था,अधिकांश मजदूर बैठे हुए थे, जो मजूरी की टोह में
पूरब जा रहे थे। वे एक बाबू जाति के प्राणी को इस भांति अपमानित होते देखकर आनंद
पा रहे थे। शायद टिकट बाबू ने रमा को धक्का देकर उतार दिया होता, तो और भी ख़ुश होते। रमा को जीवन में कभी इतनी झेंप न हुई थी। चुपचाप सिर
झुकाए खडाथा। अभी तो जीवन की इस नई यात्रा का आरंभ हुआ है। न जाने आगे क्या?
क्या विपत्तियां झेलनी पडेंगी। किस-किसके हाथों धोखा खाना पड़ेगा।
उसके जी में आया,गाड़ी से यद पड़ूं, इस
छीछालेदर से तो मर जाना ही अच्छा। उसकी आंखें भर आइ, उसने
खिड़की से सिर बाहर निकाल लिया और रोने लगा। सहसा एक बूढ़े आदमी ने, जो उसके पास ही बैठा हुआ था, पूछा, 'कलकत्ता में कहां जाओगे, बाबूजी?'
रमा
ने समझा,
वह गंवार मुझे बना रहा है, झुंझलाकर बोला,'तुमसे मतलब, मैं कहीं जाऊंगा!'
बूढ़े
ने इस उपेक्षा पर कुछ भी ध्यान न दिया, बोला,
'मैं भी वहीं चलूंगा। हमारा-तुम्हारा साथ हो जायगा। फिर धीरे से
बोला,किराए के रूपये मुझसे ले लो, वहां
दे देना।'
अब
रमा ने उसकी ओर ध्यान से देखा। कोई साठ-सत्तर साल का बूढ़ा घुला हुआ आदमी था। मांस
तो क्या हडिडयां तक फूल गई थीं। मूंछ और सिर के बाल मुड़े हुए थे। एक छोटी-सी
बद्दची के सिवा उसके पास कोई असबाब भी न था। रमा को अपनी ओर ताकते देखकर वह फिर
बोला,
'आप हाबडे ही उतरेंगे या और कहीं जाएंगे?'
रमा
ने एहसान के भार से दबकर कहा, 'बाबा, आगे मैं उतर पड़ूंगा। रूपये का कोई बंदोबस्त करके फिर आऊंगा। '
बूढ़ा-'तुम्हें कितने रूपये चाहिए, मैं भी तो वहीं चल रहा
हूं। जब चाहे दे देना। क्या मेरे दस-पांच रूपये लेकर भाग जाओगे। कहां घर है?'
रमानाथ-'यहीं, प्रयाग ही में रहता हूं।'
बूढ़े
ने भक्ति के भाव से कहा,मान्य है प्रयाग, धन्य है! मैं भी त्रिवेणी का स्नान करके आ रहा हूं, सचमुच
देवताओं की पुरी है। तो कै रूपये निकालूं?'
रमा
ने सकुचाते हुए कहा, 'मैं चलते ही चलते रूपया न दे
सकूंगा, यह समझ लो।'
बूढ़े
ने सरल भाव से कहा, 'अरे बाबूजी, मेरे दस-पांच रूपये लेकर तुम भाग थोड़े ही जाओगे। मैंने तो देखा, प्रयाग के पण्डे यात्रियों को बिना लिखाए -पढ़ाए रूपये दे देते हैं। दस
रूपये में तुम्हारा काम चल जाएगा?'
रमा
ने सिर झुकाकर कहा, 'हां, इतने
बहुत हैं।'
टिकट
बाबू को किराया देकर रमा सोचने लगा,यह बूढ़ा
कितना सरल, कितना परोपकारी, कितना
निष्कपट जीव है। जो लोग सभ्य कहलाते हैं, उनमें कितने आदमी
ऐसे निकलेंगे, जो बिना जान - पहचान किसी यात्री को उबार लें।
गाड़ी के और मुसाफिर भी बूढ़े को श्र'द्धा की नजरों से देखने
लगे। रमा को बूढ़े की बातों से मालूम हुआ कि वह जाति का खटिक है, कलकत्ता में उसकी शाक-भाजी की दुकान है। रहने वाला तो बिहार का है,
पर चालीस साल से कलकत्ता ही में रोजगार कर रहा है। देवीदीन नाम है,
बहुत दिनों से तीर्थयात्रा की इच्छा थी, बदरीनाथ
की यात्रा करके लौटा जा रहा है।
रमा
ने आश्चर्य से पूछा, 'तुम बदरीनाथ की यात्रा कर आए?
वहां तो पहाड़ों की बडी-बडी चढ़ाइयां हैं।'
देवीदीन-'भगवान की दया होती है तो सब कुछ हो जाता है, बाबूजी!
उनकी दया चाहिए।'
रमानाथ-'तुम्हारे बाल-बच्चे तो कलकत्ता ही में होंगे?'
देवीदीन
ने रूखी हंसी हंसकर कहा, 'बाल-बच्चे तो सब भगवान के घर
गए। चार बेटे थे। दो का ब्याह हो गया था। सब चल दिए। मैं बैठा हुआ हूं। मुझी से तो
सब पैदा हुए थे। अपने बोए हुए बीज को किसान ही तो काटता है!'यह
कहकर वह फिर हंसा, ज़रा देर बाद बोला, 'बुढिया अभी जीती हैं। देखें, हम दोनों में पहले कौन
चलता है। वह कहती है, पहले मैं जाऊंगी, मैं कहता हूं ,पहले मैं जाऊंगा। देखो किसकी टेक रहती
है। बन पडा तो तुम्हें दिखाऊंगा। अब भी गहने पहनती है। सोने की बालियां और सोने की
हसली पहने दुकान पर बैठी रहती है। जब कहा कि चल तीर्थ कर आवें तो बोली, 'तुम्हारे तीर्थ के लिए क्या दुकान मिट्टी में मिला दूं? यह है जिंदगी का हाल, आज मरे कि कल मरे, मगर दुकान न छोड़ेगी। न कोई आगे, न कोई पीछे,
न कोई रोने वाला, न कोई हंसने वाला, मगर माया बनी हुई है।अब भी एक-न?एक गहना बनवाती ही
रहती है। न जाने कब उसका पेट भरेगा। सब घरों का यही हाल है। जहां देखो,हाय गहने! हाय गहने! गहने के पीछे जान दे दें, घर के
आदमियों को भूखा मारें, घर की चीज़ें बेचेंब और कहां तक कहूं,
अपनी आबरू तक बेच दें। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब
सबको यही रोग लगा हुआ है। कलकत्ता में कहां काम करते हो, भैया?'
रमानाथ-'अभी तो जा रहा हूं। देखूं कोई नौकरी-चाकरी मिलती है या नहीं?'
देवीदीन-'तो फिर मेरे ही घर ठहरना। दो कोठरियां हैं, सामने
दालान है, एक कोठरी ऊपर है। आज बेचूं तो दस हज़ार मिलें। एक
कोठरी तुम्हें दे दूंगा। जब कहीं काम मिल जाय, तो अपना घर ले
लेना। पचास साल हुए घर से भागकर हाबडे गया था, तब से सुख भी
देखे, दुख भी देखे। अब मना रहा हूं, भगवान्
ले चलो। हां, बुढिया को अमर कर दो। नहीं, तो उसकी दुकान कौन लेगा, घर कौन लेगा और गहने कौन
लेगा!
यह
कहकर देवीदीन फिर हंसा, वह इतना हंसोड़, इतना प्रसन्नचित्त था कि रमा को आश्चर्य हो रहा था। बेबात की बात पर हंसता
था। जिस बात पर और लोग रोते हैं, उस पर उसे हंसी आती थी।
किसी जवान को भी रमा ने यों हंसते न देखा था। इतनी ही देर में उसने अपनी सारी जीवन?कथा कह सुनाई, कितने ही लतीफे याद थे। मालूम होता था,
रमा से वर्षो की मुलाकात है। रमा को भी अपने विषय में एक मनगढ़ंत
कथा कहनी पड़ी।
देवीदीन-'तो तुम भी घर से भाग आए हो? समझ गया। घर में झगडा
हुआ होगा। बहू कहती होगी,मेरे पास गहने नहीं, मेरा नसीब जल गया। सास- बहू में पटती न होगी। उनका कलह सुन-सुन जी और
खट्टा हो गया होगा। रमानाथ-'हां बाबा, बात
यही है, तुम कैसे जान गए?
देवीदीन
हंसकर बोला,'यह बडा भारी काम है भैया! इसे तेली की
खोपड़ी पर जगाया जाता है। अभी लङके-बाले तो नहीं हैं न?'
रमानाथ-'नहीं, अभी तो नहीं हैं।'
देवीदीन-'छोटे भाई भी होंगे?'
रमा
चकित होकर बोला,'हां दादा, ठीक कहते
हो तुमने कैसे जाना?'
देवीदीन
फिर ठटठा मारकर बोला,यह सब कर्मों का खेल है।
ससुराल धनी होगी, क्यों? '
रमानाथ-'हां दादा, है तो।'
देवीदीन-'मगर हिम्मत न होगी।'
रमानाथ-'बहुत ठीक कहते हो, दादा। बडे कम-हिम्मत हैं। जब से
विवाह हुआ अपनी लडकी तक को तो बुलाया नहीं।'
देवीदीन--'समझ गया भैया, यही दुनिया का दस्तूर है। बेटे के लिए
कहो चोरी करें, भीख मांगें, बेटी के
लिए घर में कुछ है ही नहीं।'
तीन
दिन से रमा को नींद न आई थी। दिनभर रूपये के लिए मारा-मारा फिरता, रात-भर चिंता में पडारहता। इस वक्त बातें करते-करते उसे नींद आ गई। गरदन
झुकाकर झपकी लेने लगा। देवीदीन ने तुरंत अपनी गठरी खोली, उसमें
से एक दरी निकाली, और तख्त पर बिछाकर बोला, 'तुम यहां आकर लेट रहो, भैया! मैं तुम्हारी जगह पर
बैठ जाता हूं।'
रमा
लेट रहा। देवीदीन बार-बार उसे स्नेह-भरी आंखों से देखता था, मानो उसका पुत्र कहीं परदेश से लौटा हो।
बाईस
जब
रमा कोठे से धम-धम नीचे उतर रहा था, उस वक्त
ज़ालपा को इसकी ज़रा भी शंका न हुई कि वह घर से भागा जा रहा है। पत्र तो उसने पढ़
ही लिया था। जी ऐसा झुंझला रहा था कि चलकर रमा को ख़ूब खरी-खरी सुनाऊं। मुझसे यह
छल-कपट! पर एक ही क्षण में उसके भाव बदल गए। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ है, सरकारी रूपये ख़र्च कर डाले हों। यही बात है, रतन के
रूपये सराफ को दिए होंगे। उस दिन रतन को देने के लिए शायद वे सरकारी रूपये उठा लाए
थे। यह सोचकर उसे फिर क्रोध आया,यह मुझसे इतना परदा क्यों
करते हैं? क्यों मुझसे बढ़-बढ़कर बातें करते थे? क्या मैं इतना भी नहीं जानती कि संसार में अमीर-ग़रीब दोनों ही होते हैं?क्या सभी स्त्रियां गहनों से लदी रहती हैं?गहने न
पहनना क्या कोई पाप है? जब और ज़रूरी कामों से रूपये बचते
हैं,तो गहने भी बन जाते हैं। पेट और तन काटकर, चोरी या बेईमानी करके तो गहने नहीं पहने जाते! क्या उन्होंने मुझे ऐसी
गई-गुजरी समझ लिया! उसने सोचा, रमा अपने कमरे में होगा,
चलकर पूछूं, कौन से गहने चाहते हैं। परिस्थिति
की भयंकरता का अनुमान करके क्रोध की जगह उसके मन में भय का संचार हुआ। वह बडी
तेज़ी से नीचे उतरीब उसे विश्वास था, वह नीचे बैठे हुए
इंतज़ार कर रहे होंगे। कमरे में आई तो उनका पता न था। साइकिल रक्खी हुई थी,
तुरंत दरवाज़े से झांका। सड़क पर भी नहीं। कहां चले गए? लडके दोनों पढ़ने स्यल गए थे, किसको भेजे कि जाकर
उन्हें बुला लाए। उसके ह्रदय में एक अज्ञात संशय अंद्दरित हुआ। फौरन ऊपर गई,
गले का हार और हाथ का कंगन उतारकर रूमाल में बांधा, फिर नीचे उतरी, सड़क पर आकर एक तांगा लिया, और कोचवान से बोली,चुंगी कचहरी चलो। वह पछता रही थी
कि मैं इतनी देर बैठी क्यों रही। क्यों न गहने उतारकर तुरंत दे दिए। रास्ते में वह
दोनों तरफ बडे ध्यान से देखती जाती थी। क्या इतनी जल्द इतनी दूर निकल आए? शायद देर हो जाने के कारण वह भी आज तांगे ही पर गए हैं, नहीं तो अब तक जरूर मिल गए होते। तांगे वाले से बोली, 'क्यों जी, अभी तुमने किसी बाबूजी को तांगे पर जाते
देखा?'
तांगे
वाले ने कहा,'हां माईजी, एक बाबू
अभी इधर ही से गए हैं।'
जालपा
को कुछ ढाढ़स हुआ, रमा के पहुंचते-पहुंचते वह भी
पहुंच जाएगी। कोचवान से बार-बार घोडातेज़ करने को कहती। जब वह दफ्तर पहुंची,
तो ग्यारह बज गए थे। कचहरी में सैकड़ों आदमी इधर-उधर दौड़ रहे थे।
किससे पूछे? न जाने वह कहां बैठते हैं। सहसा एक चपरासी
दिखलाई दिया। जालपा ने उसे बुलाकर कहा, 'सुनो जी, ज़रा बाबू रमानाथ को तो बुला लाओ।
चपरासी
बोला,उन्हीं को बुलाने तो जा रहा हूं। बडे बाबू ने भेजा है। आप क्या उनके घर ही
से आई हैं?'
जालपा-'हां, मैं तो घर ही से आ रही हूं। अभी दस मिनट हुए वह
घर से चले हैं।'
चपरासी-'यहां तो नहीं आए।'
जालपा
बडे असमंजस में पड़ी। वह यहां भी नहीं आए, रास्ते में
भी नहीं मिले, तो फिर गए कहां? उसका
दिल बांसों उछलने लगा। आंखें भर-भर आने लगीं। वहां बडे बाबू के सिवा वह और किसी को
न जानती थी। उनसे बोलने का अवसर कभी न पडा था, पर इस समय
उसका संकोच ग़ायब हो गया। भय के सामने मन के और सभी भाव दब जाते हैं। चपरासी से
बोली,ज़रा बडे बाबू से कह दो---नहीं चलो, मैं ही चलती हूं। बडे बाबू से कुछ बातें करनी हैं। जालपा का ठाठ-बाट और
रंग-ढंग देखकर चपरासी रोब में आ गया, उल्टे पांव बडे बाबू के
कमरे की ओर चला। जालपा उसके पीछे-पीछे हो ली। बडे बाबू खबर पाते ही तुरंत बाहर
निकल आए।
जालपा
ने कदम आगे बढ़ाकर कहा, 'क्षमा कीजिए, बाबू साहब, आपको कष्ट हुआ। वह पंद्रह-बीस मिनट हुए
घर से चले, क्या अभी तक यहां नहीं आए?'
रमेश-'अच्छा आप मिसेज रमानाथ हैं। अभी तो यहां नहीं आए। मगर दफ्तर के वक्त सैर -
सपाटे करने की तो उसकी आदत न थी।'
जालपा
ने चपरासी की ओर ताकते हुए कहा, 'मैं आपसे कुछ अर्ज़
करना चाहती हूं।'
रमेश-'तो चलो अंदर बैठो, यहां कब तक खड़ी रहोगी। मुझे
आश्चर्य है कि वह गए कहां! कहीं बैठे शतरंज खेल रहे होंगे।'
जालपा-'नहीं बाबूजी, मुझे ऐसा भय हो रहा है कि वह कहीं और न
चले गए हों। अभी दस मिनट हुए, उन्होंने मेरे नाम एक पुरज़ा
लिखा था। (जेब से टटोल कर) जी हां, देखिए वह पुरज़ा मौजूद
है। आप उन पर कृपा रखते हैं, तो कोई परदा नहीं। उनके जिम्मे
कुछ सरकारी रूपये तो नहीं निकलते!'
रमेश
ने चकित होकर कहा, 'क्यों, उन्होंने तुमसे कुछ नहीं कहा?'
जालपा-'कुछ नहीं। इस विषय में कभी एक शब्द भी नहीं कहा!'
रमेश-'कुछ समझ में नहीं आता। आज उन्हें तीन सौ रूपये जमा करना है। परसों की
आमदनी उन्होंने जमा नहीं की थी? नोट थे, जेब में डालकर चल दिए। बाज़ार में किसी ने नोट निकाल लिए। (मुस्कराकर)
किसी और देवी की पूजा तो नहीं करते?'
जालपा
का मुख लज्जा से नत हो गया। बोली, 'अगर यह ऐब होता,
तो आप भी उस इलज़ाम से न बचते। जेब से किसी ने निकाल लिए होंगे।
मारे शर्म के मुझसे कहा न होगा। मुझसे ज़रा भी कहा होता, तो
तुरंत रूपये निकालकर दे देती, इसमें बात ही क्या थी।'
रमेश
बाबू ने अविश्वास के भाव से पूछा, 'क्या घर में रूपये हैं?'
जालपा
ने निशंक होकर कहा, 'तीन सौ चाहिए न, मैं अभी लिये आती हूं।'
रमेश-'अगर वह घर पर आ गए हों, तो भेज देना।'
जालपा
आकर तांगे पर बैठी और कोचवान से चौक चलने को कहा। उसने अपना हार बेच डालने का
निश्चय कर लिया। यों उसकी कई सहेलियां थीं,जिनसे उसे
रूपये मिल सकते थे। स्त्रियों में बडा स्नेह होता है। पुरूषों की भांति उनकी
मित्रता केवल पान?पभो तक ही समाप्त नहीं हो जाती, मगर अवसर नहीं था। सर्राफे में पहुंचकर वह सोचने लगी, किस दुकान पर जाऊं। भय हो रहा था, कहीं ठगी न जाऊं।
इस सिरे से उस सिरे तक चक्कर लगा आई, किसी दुकान पर जाने की
हिम्मत न पड़ी। उधार वक्त भी निकला जाता था। आख़िर एक दुकान पर एक बूढ़े सर्राफ को
देखकर उसका संकोच कुछ कम हुआ। सर्राफ बडा घाघ था, जालपा की
झिझक और हिचक देखकर समझ गया, अच्छा शिकार फंसा। जालपा ने हार
दिखाकर कहा,आप इसे ले सकते हैं?'
सर्राफ
ने हार को इधर-उधर देखकर कहा, 'मुझे चार पैसे की
गुंजाइश होगी, तो क्यों न ले लूंगा। माल चोखा नहीं है।'
जालपा-'तुम्हें लेना है, इसलिए माल चोखा नहीं है, बेचना होता, तो चोखा होता। कितने में लोगे?'
सर्राफ-'आप ही कह दीजिए।'
सर्राफ
ने साढ़े तीन सौ दाम लगाए, और बढ़ते-बढ़ते चार सौ तक
पहुंचा। जालपा को देर हो रही थी, रूपये लिये और चल खड़ी हुई।
जिस हार को उसने इतने चाव से ख़रीदा था, जिसकी लालसा उसे
बाल्यकाल ही में उत्पन्न हो गई थी, उसे आज आधे दामों बेचकर
उसे ज़रा भी दुःख नहीं हुआ,बल्कि गर्वमय हर्ष का अनुभव हो
रहा था। जिस वक्त रमा को मालूम होगा कि उसने रूपये दे दिए हैं, उन्हें कितना आनंद होगा। कहीं दफ्तर पहुंच गए हों तो बडा मज़ा हो यह सोचती
हुई वह फिर दफ्तर पहुंची। रमेश बाबू उसे देखते हुए बोले, 'क्या
हुआ, घर पर मिले?'
जालपा-'क्या अभी तक यहां नहीं आए? घर तो नहीं गए। यह कहते
हुए उसने नोटों का पुलिंदा रमेश बाबू की तरफ बढ़ा दिया।
रमेश
बाबू नोटों को गिनकर बोले, 'ठीक है, मगर वह अब तक कहां हैं। अगर न आना था, तो एक ख़त लिख
देते। मैं तो बडे संकट में पडा हुआ था। तुम बडे वक्त से आ गई। इस वक्त तुम्हारी
सूझ-बूझ देखकर जी ख़ुश हो गया। यही सच्ची देवियों का धर्म है।'
जालपा
फिर तांगे पर बैठकर घर चली तो उसे मालूम हो रहा था, मैं
कुछ ऊंची हो गई हूं। शरीर में एक विचित्र स्फूर्ति दौड़ रही थी। उसे विश्वास था,वह आकर चिंतित बैठे होंगे। वह जाकर पहले उन्हें खूब आड़े हाथों लेगी,
और खूब लज्जित करने के बाद यह हाल कहेगी, लेकिन
जब घर में पहुंची तो रमानाथ का कहीं पता न था।
जागेश्वरी
ने पूछा,
'कहां चली गई थीं इस धूप में?'
जालपा-'एक काम से चली गई थी। आज उन्होंने भोजन नहीं किया, न
जाने कहां चले गए।'
जागेश्वरी--'दफ्तर गए होंगे।'
जालपा-'नहीं, दफ्तर नहीं गए। वहां से एक चपरासी पूछने आया
था।'
यह
कहती हुई वह ऊपर चली गई, बचे हुए रूपये संदूक में रखे
और पंखा झलने लगी। मारे गरमी के देह फुंकी जा रही थी, लेकिन
कान द्वार की ओर लगे थे। अभी तक उसे इसकी ज़रा भी शंका न थी कि रमा ने विदेश की
राह ली है।
चार
बजे तक तो जालपा को विशेष चिंता न हुई लेकिन ज्यों-ज्यों दिन ढलने लगा, उसकी चिंता बढ़ने लगी। आख़िर वह सबसे ऊंची छत पर चढ़ गई, हालांकि उसके जीर्ण होने के कारण कोई ऊपर नहीं आता था, और वहां चारों तरफ नज़र दौडाई, लेकिन रमा किसी तरफ
से आता दिखाई न दिया। जब संध्या हो गई और रमा घर न आया, तो
जालपा का जी घबराने लगा। कहां चले गए? वह दफ्तर से घर आए
बिना कहीं बाहर न जाते थे। अगर किसी मित्र के घर होते, तो
क्या अब तक न लौटते?मालूम नहीं, जेब
में कुछ है भी या नहीं। बेचारे दिनभर से न मालूम कहां भटक रहे होंगे। वह फिर
पछताने लगी कि उनका पत्र पढ़ते ही उसने क्यों न हार निकालकर दे दिया। क्यों दुविधा
में पड़ गई। बेचारे शर्म के मारे घर न आते होंगे। कहां जाय? किससे
पूछे?
चिराग़
जल गए,
तो उससे न रहा गया। सोचा, शायद रतन से कुछ पता
चले। उसके बंगले पर गई तो मालूम हुआ, आज तो वह इधर आए ही
नहीं। जालपा ने उन सभी पार्को और मैदानों को छान डाला, जहां
रमा के साथ वह बहुधा घूमने आया करती थी, और नौ बजते-बजते
निराश लौट आई। अब तक उसने अपने आंसुओं को रोका था, लेकिन घर
में कदम रखते ही जब उसे मालूम हो गया कि अब तक वह नहीं आए, तो
वह हताश होकर बैठ गई। उसकी यह शंका अब दृढ़ हो गई कि वह जरूर कहीं चले गए। फिर भी
कुछ आशा थी कि शायद मेरे पीछे आए हों और फिर चले गए हों। जाकर जागेश्वरी से पूछा,
'वह घर आए थे, अम्मांजी?'
जागेश्वरी--'यार-दोस्तों में बैठे कहीं गपशप कर रहे होंगे। घर तो सराय है। दस बजे घर
से निकले थे, अभी तक पता नहीं।'
जालपा-'दफ्तर से घर आकर तब वह कहीं जाते थे। आज तो आए नहीं। कहिए तो गोपी बाबू को
भेज दूं। जाकर देखें, कहां रह गए।'
जागेश्वरी--'लङके इस वक्त क़हां देखने जाएंगे। उनका क्या ठीक है। थोड़ी देर और देख लो,
फिर खाना उठाकर रख देना। कोई कहां तक इंतज़ार करे।'
जालपा
ने इसका कुछ जवाब न दिया। दफ्तर की कोई बात उनसे न कही। जागेश्वरी सुनकर घबडा जाती, और उसी वक्त रोना-पीटना मच जाता। वह ऊपर जाकर लेट गई और अपने भाग्य पर
रोने लगी। रह-रहकर चित्त ऐसा विकल होने लगा, मानो कलेजे में
शूल उठ रहा हो बार-बार सोचती, अगर रातभर न आए तो कल क्या
करना होगा? जब तक कुछ पता न चले कि वह किधर गए, तब तक कोई जाय तो कहां जाय! आज उसके मन ने पहली बार स्वीकार किया कि यह सब
उसी की करनी का फल है। यह सच है कि उसने कभी आभूषणों के लिए आग्रह नहीं कियाऋ
लेकिन उसने कभी स्पष्ट रूप से मना भी तो नहीं किया। अगर गहने चोरी जाने के बाद
इतनी अधीर न हो गई होती, तो आज यह दिन क्यों आता। मन की इस
दुर्बल अवस्था में जालपा अपने भार से अधिक भाग अपने ऊपर लेने लगी। वह जानती थी,
रमा रिश्वत लेता है,
नोच-खसोटकर
रूपये लाता है। फिर भी कभी उसने मना नहीं किया। उसने ख़ुद क्यों अपनी कमली के बाहर
पांव व्लाया- क्यों उसे रोज़ सैर - सपाटे की सूझती थी? उपहारों को ले-लेकर वह क्यों फली न समाती थी? इस
जिम्मेदारी को भी इस वक्त ज़ालपा अपने ही ऊपर ले रही थी। रमानाथ ने प्रेम के वश
होकर उसे प्रसन्न करने के लिए ही तो सब कुछ करते थे। युवकों का यही स्वभाव है। फिर
उसने उनकी रक्षा के लिए क्या किया- क्यों उसे यह समझ न आई कि आमदनी से ज्यादा
ख़र्च करने का दंड एक दिन भोगना पड़ेगा। अब उसे ऐसी कितनी ही बातें याद आ रही थीं,
जिनसे उसे रमा के मन की विकलता का परिचय पा जाना चाहिए था, पर उसने कभी उन बातों की ओर ध्यान न दिया।
जालपा
इन्हीं चिंताओं में डूबी हुई न जाने कब तक बैठी रही। जब चौकीदारों की सीटियों की
आवाज़ उसके कानों में आई, तो वह नीचे जाकर जागेश्वरी से
बोली, 'वह तो अब तक नहीं आए। आप चलकर भोजन कर लीजिए।'
जागेश्वरी
बैठे-बैठे झपकियां ले रही थी। चौंककर बोली, 'कहां चले
गए थे? '
जालपा-'वह तो अब तक नहीं आए।'
जागेश्वरी--'अब तक नहीं आए? आधी रात तो हो गई होगी। जाते वक्त
तुमसे कुछ कहा भी नहीं?'
जालपा-'कुछ नहीं।'
जागेश्वरी--'तुमने तो कुछ नहीं कहा?'
जालपा-'मैं भला क्यों कहती।'
जागेश्वरी--'तो मैं लालाजी को जगाऊं?'
जालपा-'इस वक्त ज़गाकर क्या कीजिएगा? आप चलकर कुछ खा लीजिए
न।'
जागेश्वरी--'मुझसे अब कुछ न खाया जायगा। ऐसा मनमौजी लड़का है कि कुछ कहा न सुना,
न जाने कहां जाकर बैठ रहा। कम-से-कम कहला तो देता कि मैं इस वक्त न
आऊंगा।'
जागेश्वरी
फिर लेट रही, मगर जालपा उसी तरह बैठी रही। यहां तक कि
सारी रात गुज़र गई,पहाड़-सी रात जिसका एक-एक पल एक-एक वर्ष
के समान कट रहा था।
तेईस
एक
सप्ताह हो गया, रमा का कहीं पता नहीं। कोई कुछ कहता है,
कोई कुछ। बेचारे रमेश बाबू दिन में कई-कई बार आकर पूछ जाते हैं।
तरह-तरह के अनुमान हो रहे हैं। केवल इतना ही पता चलता है कि रमानाथ ग्यारह बजे
रेलवे स्टेशन की ओर गए थे। मुंशी दयानाथ का खयाल है, यद्यपि
वे इसे स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं करते कि रमा ने आत्महत्या कर ली। ऐसी दशा में यही
होता है। इसकी कई मिसालें उन्होंने ख़ुद आंखों से देखी हैं। सास और ससुर दोनों ही
जालपा पर सारा इलज़ाम थोप रहे हैं। साफ-साफ कह रहे हैं कि इसी के कारण उसके प्राण
गए। इसने उसका नाकों दम कर दिया। पूछो, थोड़ी-सी तो आपकी
आमदनी, फिर तुम्हें रोज़ सैर - सपाटे और दावत-तवाज़े की
क्यों सूझती थी। जालपा पर किसी को दया नहीं आती। कोई उसके आंसू नहीं पोंछता। केवल
रमेश बाबू उसकी तत्परता और सदबुद्धि की प्रशंसा करते हैं, लेकिन
मुंशी दयानाथ की आंखों में उस कृत्य का कुछ मूल्य नहीं। आग लगाकर पानी लेकर दौड़ने
से कोई निर्दोष नहीं हो जाता!
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