गबन: अध्याय-3.3
रमा
कोई बहाना न कर सका। बोला, 'हां, मुनीमजी
ने पिंड ही न छोडा! बडा धर्मात्मा जीव है।'
देवीदीन
ने मुस्कराकर कहा, 'बडा धर्मात्मा! उसी के थामे
तो यह धरती थमी है, नहीं तो अब तक मिट गई होती!'
रमानाथ-'काम तो धर्मात्माओं ही के करता है, मन का हाल ईश्वर
जाने। जो सारे दिन पूजापाठ और दानव्रत में लगा रहे, उसे धर्मात्मा नहीं तो और क्या कहा जाय।'
देवीदीन-'उसे पापी कहना चाहिए, महापापी, दया तो उसके पास से होकर भी नहीं निकली। उसकी जूट की मिल है। मजूरों के
साथ जितनी निर्दयता इसकी मिल में होती है, और कहीं नहीं
होती। आदमियों को हंटरों से पिटवाता है, हंटरों से।
चर्बी-मिला घी बेचकर इसने लाखों कमा लिए। कोई नौकर एक मिनट की भी देर करे तो तुरंत
तलब काट लेता है। अगर साल में दो-चार हज़ार दान न कर दे, तो
पाप का धन पचे कैसे! धर्म-कर्म वाले ब्राह्मण तो उसके द्वार पर
झांकते
भी नहीं। तुम्हारे सिवा वहां कोई पंडित था?'रमा ने सिर
हिलाया।
'कोई जाता ही नहीं। हां, लोभी-लंपट पहुंच जाते हैं।
जितने पुजारी देखे, सबको पत्थर ही पाया। पत्थर पूजते-पूजते
इनके दिल भी पत्थर हो जाते हैं। इसके तीन तो बड़े-बडे धरमशाले हैं, मुदा है पाखंडी। आदमी चाहे और कुछ न करे, मन में दया
बनाए रखे। यही सौ धरम का एक धरम है।'
दिन
की रक्खी हुई रोटियां खाकर जब रमा कंबल ओढ़कर लेटा, तो
उसे बडी ग्लानि होने लगी। रिश्वत में उसने हज़ारों रूपये मारे थे, पर कभी एक क्षण के लिए भी उसे ग्लानि न आई थी। रिश्वत बुद्धिसे, कौशल से, पुरूषार्थ से मिलती है। दान पौरूषहीन,
कर्महीन या पाखंडियों का आधार है। वह सोच रहा था,मैं अब इतना दीन हूं कि भोजन और वस्त्र के लिए मुझे दान लेना पड़ता है! वह
देवीदीन के घर दो महीने से पडाहुआ था, पर देवीदीन उसे
भिक्षुक नहीं मेहमान समझता था। उसके मन में कभी दान का भाव आया ही न था। रमा के मन
में ऐसा उद्वेग उठा कि इसी दम थाने में जाकर अपना सारा वृत्तांत कह सुनाए। यही न
होगा, दो-तीन साल की सज़ा हो जाएगी, फिर
तो यों प्राण सूली पर न टंगे रहेंगे। कहीं डूब ही क्यों न मईंब इस तरह जीने से
फायदा ही क्या! न घर का हूं न घाट का। दूसरों का भार तो क्या उठाऊंगा, अपने ही लिए दूसरों का मुंह ताकता हूं। इस जीवन से किसका उपकार हो रहा है?
धिक्कार है मेरे जीने को! रमा ने निश्चय किया, कल निद्यशंक होकर काम की टोह में निकलूंगा। जो कुछ होना है, हो|
छब्बीस
अभी
रमा मुंह-हाथ धो रहा था कि देवीदीन प्राइमर लेकर आ पहुंचा और बोला, 'भैया, यह तुम्हारी अंगरेज़ी बडी विकट है। एस-आई-आर 'सर' होता है, तो पी-आई-टी 'पिट' क्यों हो जाता है? बी-यू-टी
'बट' है, लेकिन
पी-यू-टी 'पुट' क्यों होता है? तुम्हें भी बडी कठिन लगती होगी।
रमा
ने मुस्कराकर कहा, 'पहले तो कठिन लगती थी,
पर अब तो आसान मालूम होती है।' देवीदीन-'
'जिस दिन पराइमर खतम होगी, महाबीरजी को सवा
सेर लडडू चढ़ाऊंगा। पराई-मर का मतलब है, पराई स्त्री मर जाय।
मैं कहता हूं, हमारीमर, पराई के मरने
से हमें क्या सुख! तुम्हारे बाल-बच्चे तो हैं न भैया?'
रमा
ने इस भाव से कहा, 'मानो हैं, पर न होने के बराबर हैं,हां, हैं
तो!'
'कोई चिट्ठी-चपाती आई थी?'
'ना!'
'और न तुमने लिखी- अरे! तीन महीने से कोई चिट्ठी ही नहीं भेजी? घबडाते न होंगे लोग?'
'जब तक यहां कोई ठिकाना न लग जाय, क्या पत्र लिखूं।'
'अरे भले आदमी, इतना तो लिख दो कि मैं यहां कुशल से
हूं। घर से भाग आए थे, उन लोगों को कितनी चिंता हो रही होगी!
मां-बाप तो हैं न?'
'हां, हैं तो।'
देवीदीन
ने गिड़गिडाकर कहा,'तो भैया, आज ही चिट्ठी डाल दो, मेरी बात मानो।'
रमा
ने अब तक अपना हाल छिपाया था। उसके मन में कितनी ही बार इच्छा हुई कि देवीदीन से
कह दूं,
पर बात होंठों तक आकर रूक जाती थी। वह देवीदीन के मुंह से आलोचना
सुनना चाहता था। वह जानना चाहता था कि यह क्या सलाह देता है। इस समय देवीदीन के
सद्भाव ने उसे पराभूत कर दिया।
बोला, 'मैं घर से भाग आया हूं, दादा!'
देवीदीन
ने मूंछों में मुस्कराकर कहा,'यह तो मैं जानता हूं,
क्या बाप से लडाई हो गई?'
'नहीं!'
'मां ने कुछ कहा होगा?'
यह
भी नहीं!'
'तो फिर घरवाली से ठन गई होगी। वह कहती होगी, मैं अलग
रहूंगी, तुम कहते होगे मैं अपने मां-बाप से अलग न रहूंगा। या
गहने के लिए ज़िद करती होगी। नाक में दम कर दिया होगा। क्यों?'
रमा
ने लज्जित होकर कहा, 'कुछ ऐसी बात थी, दादा! वह तो गहनों की बहुत इच्छुक न थी, लेकिन पा
जाती थी, तो प्रसन्न हो जाती थी, और
मैं प्रेम की तरंग में आगा-पीछा कुछ न सोचता था।'
देवीदीन
के मुंह से मानो आप-ही-आप निकल आया, 'सरकारी रकम
तो नहीं उडादी?'
रमा
को रोमांच हो आया। छाती धक-से हो गई। वह सरकारी रकम की बात उससे छिपाना चाहता था।
देवीदीन के इस प्रश्न ने मानो उस पर छापा मार दिया। वह कुशल सैनिक की भांति अपनी
सेना को घाटियों से, जासूसों की आंख बचाकर,
निकाल ले जाना चाहता था, पर इस छापे ने उसकी
सेना को अस्त- व्यस्त कर दिया। उसके चेहरे का रंग उड़ गया। वह एकाएक कुछ निश्चय न
कर सका कि इसका क्या जवाब दूं।
देवीदीन
ने उसके मन का भाव भांपकर कहा, 'प्रेम बडा बेढब होता है,
भैया! बड़े-बडे चूक जाते हैं, तुम तो अभी लङके
हो ग़बन के हज़ारों मुकदमे हर साल होते हैं। तहकीकात की जाय, तो सबका कारण एक ही होगा,गहना। दस-बीस वारदात तो मैं
आंखों देख चुका हूं। यह रोग ही ऐसा है। औरत मुंह से तो यही कहे जाती है कि यह
क्यों लाए, वह क्यों लाए, रूपये कहां
से आवेंगे, लेकिन उसका मन आनंद से नाचने लगता है। यहीं एक
डाक-बाबू रहते थे। बेचारे ने छुरी से गला काट लिया। एक दूसरे मियां साहब को मैं
जानता हूं, जिनको पांच साल की सज़ा हो गई, जेहल में मर गए। एक तीसरे पंडितजी को जानता हूं, जिन्होंने
अफीम खाकर जान दे दी। बुरा रोग है। दूसरों को क्या कहूं, मैं
ही तीन साल की सज़ा काट चुका हूं। जवानी की बात है, जब इस
बुढिया पर जोबन था, ताकती थी तो मानो कलेजे पर तीर चला देती
थी। मैं डाकिया था। मनीआर्डर तकसीम किया करता था। यह कानों के झुमकों के लिए जान
खा रही थी। कहती थी, सोने ही के लूंगी। इसका बाप चौधरी था। मेवे
की दुकान थी। मिजाज बढ़ा हुआ था। मुझ पर प्रेम का नसा छाया हुआ था। अपनी आमदनी की
डींगें मारता रहता था। कभी फूल के हार लाता, कभी मिठाई,
कभी अतर-फुलेलब सहर का हलका था। जमाना अच्छा था। दुकानदारों से जो
चीज़ मांग लेता, मिल जाती थी। आख़िर मैंने एक मनीआर्डर पर
झूठे दस्तखत बनाकर रूपये उडालिए। कुल तीस रूपये थे। झुमके लाकर इसे दिए। इतनी ख़ुश
हुई, इतनी ख़ुश हुई, कि कुछ न पूछो,
लेकिन एक ही महीने में चोरी पकड़ ली गई। तीन साल की सज़ा हो गई।
सज़ा काटकर निकला तो यहां भाग आया। फिर कभी घर नहीं गया। यह मुंह कैसे दिखाता। हां,
घर पत्र भेज दिया। बुढिया खबर पाते ही चली आई। यह सब कुछ हुआ,
मगर गहनों से उसका पेट नहीं भरा। जब देखो, कुछ-नकुछ
बनता ही रहता है। एक चीज़ आज बनवाई, कल उसी को तुड़वाकर कोई
दूसरी चीज़ बनवाई, यही तार चला जाता है। एक सोनार मिल गया है,
मजूरी में साफ-भाजी ले जाता है। मेरी तो सलाह है, घर पर एक ख़त लिख दो, लेकिन पुलिस तो तुम्हारी टोह
में होगी। कहीं पता मिल गया, तो काम बिगड़ जायगा। मैं न किसी
से एक ख़त लिखाकर भेज दूं?'
रमा
ने आग्रहपूर्वक कहा, 'नहीं, दादा!
दया करो। अनर्थ हो जायगा। पुलिस से ज्यादा तो मुझे घरवालों का भय है।'
देवीदीन-'घर वाले खबर पाते ही आ जाएंगे। यह चर्चा ही न उठेगी। उनकी कोई चिंता नहीं।
डर पुलिस ही का है।'
रमानाथ-'मैं सज़ा से बिलकुल नहीं डरता। तुमसे कहा नहीं, एक
दिन मुझे वाचनालय में जान - पहचान की एक स्त्री दिखाई दी। हमारे घर बहुत आती-जाती
थी। मेरी स्त्री से बडी मित्रता थी। एक बडे वकील की पत्नी है। उसे देखते ही मेरी
नानी मर गई। ऐसा सिटपिटा गया कि उसकी ओर ताकने की हिम्मतन पड़ी। चुपके से उठकर
पीछे के बरामदे में जा छिपा। अगर उस वक्त उससे दो-चार बातें कर लेता, तो घर का सारा समाचार मालूम हो जाता और मुझे यह विश्वास है कि वह इस
मुलाकात की किसी से चर्चा भी न करती। मेरी पत्नी से भी न कहती, लेकिन मेरी हिम्मत ही न पड़ी। अब अगर मिलना भी चाहूं, तो नहीं मिल सकता उसका पता-ठिकाना कुछ भी तो नहीं मालूम । देवीदीन-'तो फिर उसी को क्यों नहीं एक चिट्ठी लिखते?'
रमानाथ-'चिटठी तो मुझसे न लिखी जाएगी।'
देवीदीन-'तो कब तक चिट्ठी न लिखोगे?'
रमानाथ-'देखा चाहिए।'
देवीदीन-'पुलिस तुम्हारी टोह में होगी।'
देवीदीन
चिंता में डूब गया। रमा को भ्रम हुआ, शायद पुलिस
का भय इसे चिंतित कर रहा है। बोला, 'हां, इसकी शंका मुझे हमेशा बनी रहती है। तुम देखते हो, मैं
दिन को बहुत कम घर से निकलता हूं, लेकिन मैं तुम्हें अपने
साथ नहीं घसीटना चाहता। मैं तो जाऊंगा ही, तुम्हें क्यों
उलझन में डालूं। सोचता हूं, कहीं और चला जाऊं, किसी ऐसे गांव में जाकर रहूं, जहां पुलिस की गंध भी
न हो देवीदीन ने गर्व से सिर उठाकर कहा, 'मेरे बारे में तुम
कुछ चिंता न करो भैया, यहां पुलिस से डरने वाले नहीं हैं।
किसी परदेशी को अपने घर ठहराना पाप नहीं है। हमें क्या मालूम किसके पीछे पुलिस है?
यह पुलिस का काम है, पुलिस जाने। मैं पुलिस का
मुखबिर नहीं, जासूस नहीं, गोइंदा नहीं।
तुम अपने को बचाए रहो, देखो भगवान क्या करते हैं। हां,
कहीं बुढिया से न कह देना,नहीं तो उसके पेट
में पानी न पचेगा।'
दोनों
एक क्षण चुपचाप बैठे रहे। दोनों इस प्रसंग को इस समय बंद कर देना चाहते थे। सहसा
देवीदीन ने कहा,क्यों भैया, कहो तो
मैं तुम्हारे घर चला जाऊं। किसी को कानों -कान खबर न होगी। मैं इधर-उधर से सारा
ब्योरा पूछ आऊंगा। तुम्हारे पिता से मिलूंगा, तुम्हारी माता
को समझाऊंगा,तुम्हारी घरवाली से बातचीत करूंगा। फिर जैसा
उचित जान पड़े, वैसा करना।
रमा
ने मन- ही-मन प्रसन्न होकर कहा, 'लेकिन कैसे पूछोगे दादा,
लोग कहेंगे न कि तुमसे इन बातों से क्या मतलब?'
देवीदीन
ने ठट्ठा मारकर कहा, 'भैया, इससे
सहज तो कोई काम ही नहीं।'
एक
जनेऊ गले में डाला और ब्राह्मन बन गए। फिर चाहे हाथ देखो, चाहे, कुंडली बांचो, चाहे सगुन
विचारो, सब कुछ कर सकते हो बुढिया भिक्षा लेकर आवेगी। उसे
देखते ही कहूंगा, माता तेरे को पुत्र के परदेस जाने का बडा
कष्ट है, क्या तेरा कोई पुत्र विदेस गया है? इतना सुनते ही घर-भर के लोग आ जाएंगे। वह भी आवेगी। उसका हाथ देखूंगा। इन
बातों में मैं पक्का हूं भैया, तुम निश्चिन्त रहो कुछ कमा
लाऊंगा, देख लेना। माघ-मेला भी होगा। स्नान करता आऊंगा।
रमा
की आंखें मनोल्लास से चमक उठीं। उसका मन मधुर कल्पनाओं के संसार में जा पहुंचा।
जालपा उसी वक्त रतन के पास दौड़ी जायगी। दोनों भांति-भांति के प्रश्न करेंगी,क्यों बाबा, वह कहां गए हैं?अच्छी
तरह हैं न? कब तक घर आवेंगे- कभी बाल-बच्चों की सुधि आती है
उनको- वहां किसी कामिनी के माया-जाल में तो नहीं फंस गए? दोनों
शहर का नाम भी पूछेंगी।
कहीं
दादा ने सरकारी रूपये चुका दिए हों, तो मज़ा आ
जाय। तब एक ही चिंता रहेगी।
देवीदीन
बोला,
'तो है न सलाह?' रमानाथ-'कहां जायंगे दादा, कष्ट होगा।'
'माघ का स्नान भी तो करूंगा। कष्ट के बिना कहीं पुन्न होता है! मैं तो कहता
हूं, तुम भी चलो। मैं वहां सब रंग-ढंग देख लूंगा। अगर देखना
कि मामला टिचन है, तो चैन से घर चले जाना। कोई खटका मालूम हो,
तो मेरे साथ ही लौट आना।'
रमा
ने हंसकर कहा, 'कहां की बात करते हो, दादा! मैं यों कभी न जाऊंगा। स्टेशन पर उतरते ही कहीं पुलिस का सिपाही
पकड़ ले, तो बस!'
देवीदीन
ने गंभीर होकर कहा,'सिपाही क्या पकड़ लेगा,
दिल्लगी है! मुझसे कहो, मैं प्रयागराज के थाने
में ले जाकर खडाकर दूं। अगर कोई तिरछी आंखों से भी देख ले तो मूंछ मुडालूं! ऐसी
बात भला! सैकडों खूनियों को जानता हूं जो यहां कलकत्ता में रहते हैं। पुलिस के
अफसरों के साथ दावतें खाते हैं, पुलिस उन्हें जानती है,
फिर भी उनका कुछ नहीं कर सकती! रूपये में बडा
बल
है,
भैया! '
रमा
ने कुछ जवाब न दिया। उसके सामने यह नया प्रश्न आ खडा हुआ। जिन बातों को वह अनुभव न
होने के कारण महाकष्ट-साकेय समझता था,उन्हें इस
बूढ़े ने निर्मूल कर दिया, और बूढ़ा शेखीबाजों में नहीं है,
वह मुंह से जो कहता है, उसे पूरा कर दिखाने की
सामर्थ्य रखता है। उसने सोचा,तो क्या मैं सचमुच देवीदीन के
साथ घर चला जाऊं?' यहां कुछ रूपये मिल जाते, तो नए सूट बनवा लेता, फिर शान से जाता। वह उस अवसर
की कल्पना करने लगा, जब वह नया सूट पहने हुए घर पहुंचेगा।
उसे देखते ही गोपी और विश्वम्भर दौड़ेंगे,भैया आए, भैया आए! दादा निकल आयंगे। अम्मां को पहले विश्वास न आयगा, मगर जब दादा जाकर कहेंगे,हां, आ
तो गए, तब वह रोती हुई द्वार की ओर चलेंगी। उसी वक्त मैं
पहुंचकर उनके पैरों पर फिर पडूंगा। जालपा वहां न आएगी। वह मान किए बैठी रहेगी। रमा
ने मन-ही-मन वह वाक्य भी सोच
लिए, जो वह जालपा को मनाने के लिए कहेगा। शायद रूपये की चर्चा ही न आए। इस विषय
पर कुछ कहते हुए सभी को संकोच होगा। अपने प्रियजनों से जब कोई अपराध हो जाता है,
तो हम उघाङ कर उसे दुखी नहीं करते। चाहते हैं कि उस बात का उसे
ध्यान ही न आए, उसके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं कि उसे हमारी
ओर से ज़रा भी भ्रम न हो, वह भूलकर भी यह न समझे कि मेरी
अपकीर्ति हो रही है।
देवीदीन
ने पूछा,
'क्या सोच रहे हो? चलोगे न?'
रमा
ने दबी जबान से कहा, 'तुम्हारी इतनी दया है,
तो चलूंगा, मगर पहले तुम्हें मेरे घर जाकर
पूरा-पूरा समाचार लाना पड़ेगा। अगर मेरा मन न भरा, तो मैं
लौट आऊंगा।'
देवीदीन
ने दृढ़ता से कहा, 'मंजूर।'
रमा
ने संकोच से आंखें नीची करके कहा, 'एक बात और है?'
देवीदीन-' 'क्या बात है? कहो।'
'मुझे कुछ कपड़े बनवाने पड़ेंगे।'
'बन जायेंगे।'
'मैं घर पहुंचकर तुम्हारे रूपये दिला दूंगा ।'
'और मैं तुम्हारी गुरू-दक्षिणा भी वहीं दे दूंगा। '
'गुरू-दक्षिणा भी मुझी को देनी पड़ेगी। मैंने तुम्हें चार हरफ अंग्रेज़ी
पढ़ा दिए, तुम्हारा इससे कोई उपकार न होगा। तुमने मुझे पाठ
पढ़ाए हैं, उन्हें मैं उम्र- भर नहीं भूल सकता मुंह पर बडाई
करना ख़ुशामद है, लेकिन दादा, मातापिता
के बाद जितना प्रेम मुझे तुमसे है, उतना और किसी से नहीं।
तुमने ऐसे गाढ़े समय मेरी बांह पकड़ी, जब मैं बीच धार में
बहा जा रहा था। ईश्वर ही
जाने, अब तक मेरी क्या गति हुई होती, किस घाट लगा होता!'
देवीदीन
ने चुहल से कहा, 'और जो कहीं तुम्हारे दादा ने मुझे घर में
न घुसने दिया तो?'
रमा
ने हंसकर कहा, 'दादा तुम्हें अपना बडा भाई समझेंगे,
तुम्हारी इतनी ख़ातिर करेंगे कि तुम ऊब जाओगे। जालपा तुम्हारे चरण
धो-धो पिएगी,तुम्हारी इतनी सेवा करेगी कि जवान हो जाओगे।'
देवीदीन
ने हंसकर कहा, 'तब तो बुढिया डाह के मारे जल मरेगी।
मानेगी नहीं, नहीं तो मेरा जी चाहता है कि हम दोनों यहां से
अपना डेरा-डंडा लेकर चलते और वहीं अपनी सिरकी तानते। तुम लोगों के साथ ज़िंदगी के
बाकी दिन आराम से कट जातेऋ मगर इस चुड़ैल से कलकत्ता न छोडा जायगा। तो बात पक्की
हो गई न?'
'हां, पक्की ही है।'
'दुकान खुले तो चलें, कपड़े लावेंब आज ही सिलने को दे
दें।'
देवीदीन
के चले जाने के बाद रमा बडी देर तक आनंद-कल्पनाओं में मग्न बैठा रहा। जिन भावनाओं
को उसने कभी मन में आश्रय न दिया था,जिनकी गहराई
और विस्तार और उद्वेग से वह इतना भयभीत था कि उनमें फिसलकर डूब जाने के भय से चंचल
मन को उधर भटकने भी न देता था, उसी अथाह और अछोर कल्पना-सागर
में वह आज स्वच्छंद रूप से क्रीडाकरने लगा। उसे अब एक नौका मिल गई थी। वह त्रिवेणी
की सैर, वह अल्प्रेड पार्क की बहार, वह
ख़ुसरो बाग़ का आनंद, वह मित्रों के जलसे, सब याद आ-आकर ह्रदय को गुदगुदाने लगे। रमेश उसे देखते ही गले लिपट जाएंगे।
मित्रगण पूछेंगे, कहां गए थे, यार-
ख़ूब सैर की? रतन उसकी ख़बर पाते ही दौड़ी आएगी और पूछेगी,तुम कहां ठहरे थे, बाबूजी? मैंने
सारा कलकत्ता छान मारा। फिर जालपा की मान-प्रतिमा सामने आ खड़ी हुई।
सहसा
देवीदीन ने आकर कहा, 'भैया, दस
बज गए, चलो बाज़ार होते आवें।'
रमा
ने चौंककर पूछा, 'क्या दस बज गए?'
देवीदीन-' 'दस नहीं, ग्यारह का अमल होगा।'
रमा
चलने को तैयार हुआ, लेकिन द्वार तक आकर रूक गया।
देवीदीन
ने पूछा,'क्यों खड़े कैसे हो गए?'
''तुम्हीं चले जाओ, मैं जाकर क्या करूंगा!'
''क्या डर रहे हो?'
''नहीं, डर नहीं रहा हूं, मगर
क्या फायदा?'
'मैं अकेले जाकर क्या करूंगा! मुझे क्या मालूम, तुम्हें
कौन कपडा पसंद है। चलकर अपनी पसंद से ले लो। वहीं दरजी को दे देंगे।'
'तुम जैसा कपडा चाहे ले लेना। मुझे सब पंसद है।'
'तुम्हें डर किस बात का है? पुलिस तुम्हारा कुछ नहीं
करेगी। कोई तुम्हारी तरफ ताकेगा भी नहीं।''
'मैं डर नहीं रहा हूं दादा, जाने की इच्छा नहीं है।'
'डर नहीं रहे हो, तो क्या कर रहे हो कह रहा हूं कि
कोई तुम्हें कुछ न कहेगा, इसका मेरा जिम्मा, मुदा तुम्हारी जान निकली जाती है!'
देवीदीन
ने बहुत समझाया, आश्वासन दिया, पर
रमा जाने पर राज़ी न हुआ। वह डरने से कितना ही इंकार करे, पर
उसकी हिम्मत घर से बाहर निकलने की न पड़ती थी। वह सोचता था, अगर
किसी सिपाही ने पकड़ लिया, तो देवीदीन क्या कर लेगा। माना
सिपाही से इसका परिचय भी हो,तो यह आवश्यक नहीं कि वह सरकारी
मामले में मौी का निर्वाह करे। यह मिकैत-ख़ुशामद करके रह जाएगा, जाएगी मेरे सिरब कहीं पकडा जाऊं,तो प्रयाग के बदले
जेल जाना पड़े। आखिर देवीदीन लाचार होकर अकेला ही गया।
देवीदीन
घंटे-भर में लौटा, तो देखा, रमा छत पर टहल रहा है। बोला, 'कुछ खबर है, कै बज गए? बारह का अमल है। आज रोटी न बनाओगे क्या?घर जाने की ख़ुशी में खाना-पीना छोड़ दोगे?'
रमा
ने झेंपकर कहा, 'बना लूंगा दादा, जल्दी
क्या है।'
'यह देखो, नमूने लाया हूं, इनमें
जौन-सा पसंद करो, ले लूं।''
यह
कह कर देवीदीन ने ऊनी और रेशमी कपड़ों के सैकड़ों नमूने निकालकर रख दिए। पांच-छः
रूपये गज से कम का कोई कपडान था। रमा ने नमूनों को उलट-पलटकर देखा और बोला,इतने महंगे कपड़े क्यों लाए, दादा? और सस्ते न थे?'
'सस्ते थे, मुदा विलायती थे।'
'तुम विलायती कपड़े नहीं पहनते?'
'इधर बीस साल से तो नहीं लिए, उधर की बात नहीं कहता।
कुछ बेसी दाम लग जाता है, पर रूपया तो देस ही में रह जाता
है।'
रमा
ने लजाते हुए कहा, 'तुम नियम के बडे पक्के हो
दादा! '
देवीदीन
की मुद्रा सहसा तेजवान हो गई। उसकी बुझी हुई आंखें चमक उठीं। देह की नसें तन गई।
अकड़कर बोला,जिस देस में रहते हैं, जिसका अन्न-जल खाते हैं, उसके लिए इतना भी न करें तो
जीने को धिक्कार है। दो जवान बेटे इसी सुदेसी की भेंट कर चुका हूं,भैया! ऐसे-ऐसे पट्ठे थे, कि तुमसे क्या कहें। दोनों
बिदेसी कपड़ों की दुकान पर तैनात थे। क्या मजाल थी कोई गाहक दुकान पर आ जाय। हाथ
जोड़कर, घिघियाकर, धमकाकर,लजवाकर सबको उधर लेते थे। बजाजे में सियार लोटने लगे। सबों ने जाकर कमिसनर
से फरियाद की। सुनकर आग हो गया। बीस गौजी गोरे भेजे कि अभी जाकर बज़ार से पहरे उठा
दो। गोरों ने दोनों भाइयों से कहा,यहां से चले जाव, मुदा वह अपनी जगह से जौ-भर न हिले। भीड़ लग गई। गोरे उन पर घोड़े चढ़ा
लाते थे, पर दोनों चट्टान की तरह डटे खड़े थे। आख़िर जब इस
तरह कुछ बस न चला तो सबों ने डंडों से पीटना सुई किया। दोनों वीर डंडे खाते थे,
पर जगह से न हिलते थे। जब बडा भाई फिर पडातो छोटा उसकी जगह पर आ खडा
हुआ। अगर दोनों अपने डंडे संभाल लेते तो भैया उन बीसों को मार भगातेऋ लेकिन हाथ
उठाना तो बडी बात है, सिर तक न उठाया। अन्त में छोटा भी वहीं
फिर पड़ा। दोनों को लोगों ने उठाकर अस्पताल भेजा। उसी रात को दोनों सिधार गए।
तुम्हारे चरन छूकर कहता हूं भैया, उस बखत ऐसा जान पड़ता था
कि मेरी छाती गज-भर की हो गई है, पांव ज़मीन पर न पड़ते थे,
यही उमंग आती थी कि भगवान ने औरों को पहले न उठा लिया होता, तो इस समय उन्हें भी भेज देता। जब अर्थी चली है, तो
एक लाख आदमी साथ थे। बेटों को गंगा में सौंपकर मैं सीधे बजाजे पहुंचा और उसी जगह
खडा हुआ, जहां दोनों बीरों की लहास गिरी थी। गाहक के नाम
चिडिए का पूत तक न दिखाई दिया। आठ दिन वहां से हिला तक नहीं। बस भोर के समय आधा
घंटे के लिए घर आता था और नहा-धोकर कुछ जलपान करके चला जाता था। नवें दिन
दुकानदारों ने कसम खाई कि विलायती कपड़े अब न मंगावेंगे। तब पहरे उठा लिए गए। तब
से बिदेसी दियासलाई तक घर में नहीं लाया।
रमा
ने सच्चे दिल से कहा, 'दादा, तुम
सच्चे वीर हो, और वे दोनों लडके भी सच्चे योद्धा थे।
तुम्हारे दर्शनों से आंखें पवित्र होती हैं।'
देवीदीन
ने इस भाव से देखा मानो इस बडाई को वह बिलकुल अतिशयोक्ति नहीं समझता। शहीदों की
शान से बोला,इन बड़े-बडे आदमियों के किए कुछ न होगा।
इन्हें बस रोना आता है, छोकरियों की भांति बिसूरने के सिवा
इनसे और कुछ नहीं हो सकता बड़े-बडे देस-भगतों को बिना बिलायती सराब के चैन नहीं
आता। उनके घर में जाकर देखो, तो एक भी देसी चीज़ न मिलेगी।
दिखाने
को दस-बीस कुरते गाढ़े के बनवा लिए, घर का और सब
सामान बिलायती है। सब-के-सब भोग-बिलास में अंधे हो रहे हैं, छोटे
भी और बड़े भी। उस पर दावा यह है कि देस का उद्धार करेंगे। अरे तुम क्या देस का
उद्धार करोगे। पहले अपना उद्धार तो कर लो। गरीबों को लूटकर बिलायत का घर भरना
तुम्हारा काम है। इसीलिए तुम्हारा इस देस में जनम हुआ है। हां, रोए जाव, बिलायती सराबें उडाओ, बिलायती मोटरें दौडाओ, बिलायती मुरब्बे और अचार
चक्खो, बिलायती बरतनों में खाओ, बिलायती
दवाइयां पियो, पर देस के नाम को रोये जाव।मुदा इस रोने से
कुछ न होगा। रोने से मां दूध पिलाती है, सेर अपना सिकार नहीं
छोड़ता। रोओ उसके सामने, जिसमें दया और धरम हो तुम धमकाकर ही
क्या कर लोगे- जिस धमकी में कुछ दम नहीं है, उस धमकी की
परवाह कौन करता है। एक बार यहां एक बडा भारी जलसा हुआ। एक साहब बहादुर खड़े होकर
खूब उछले-यदे, जब वह नीचे आए, तब मैंने
उनसे पूछा,साहब, सच बताओ, जब तुम सुराज का नाम लेते हो, तो उसका कौनसा रूप
तुम्हारी आंखों के सामने आता है? तुम भी बडी-बडी तलब लोगे,
तुम भी अंगरेज़ों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों
की हवा खाओगे,अंगरेज़ी ठाठ बनाए घूमोगे, इस सुराज से देस का क्या कल्यान होगा। तुम्हारी और तुम्हारे भाईबंदों की
ज़िंदगी भले आराम और ठाठ से गुज़रे, पर देस का तो कोई भला न
होगा। बस, बगलें झांकने लगे। तुम दिन में पांच बेर खाना
चाहते हो, और वह भी बढिया माल, ग़रीब
किसान को एक जून सूखा चबेना भी नहीं मिलता। उसी का रक्त चूसकर तो सरकार तुम्हें
हुप्रे देती है। तुम्हारा ध्यान कभी उनकी ओर जाता है? अभी
तुम्हारा राज नहीं है,तब तो तुम भोग-बिलास पर इतना मरते हो,
जब तुम्हारा राज हो जायगा, तब तो तुम ग़रीबों
को पीसकर पी जाओगे। रमा भद्र-समाज पर यह आक्षेप न सुन सका। आख़िर वह भी तो
भद्रसमाज का ही एक अंग था। बोला, 'यह बात तो नहीं है दादा,
कि पढ़े-लिखे लोग किसानों का ध्यान नहीं करते। उनमें से कितने ही
ख़ुद किसान थे, या हैं। उन्हें अगर विश्वास हो जाय कि हमारे
कष्ट उठाने से किसानों का कोई उपकार होगा और जो बचत होगी, वह
किसानों के लिए ख़र्च की जायगी, तो वह ख़ुशी से कम वेतन पर
काम करेंगे, लेकिन जब वह देखते हैं कि बचत दूसरे हडप। जाते
हैं, तो वह सोचते हैं, अगर दूसरों को
ही खाना है, तो हम क्यों न खाएं।' देवीदीन-'तो सुराज मिलने पर दस-दस, पांच-पांच हज़ार के अफसर
नहीं रहेंगे? वकीलों की लूट नहीं रहेगी? पुलिस की लूट बंद हो जाएगी?'
एक
क्षण के लिए रमा सिटपिटा गया। इस विषय में उसने ख़ुद कभी विचार न किया था, मगर तुरंत ही उसे जवाब सूझ गया। बोला, 'दादा,
तब तो सभी काम बहुमत से होगा। अगर बहुमत कहेगा कि कर्मचारियों के
वेतन घटा दिए जाएं, तो घट जाएंगे। देहातों के संगठनों के लिए
भी बहुमत जितने रूपये मांगेगा, मिल जाएंगे। कुंजी बहुमत के
हाथ में रहेगी, और अभी दस-पांच बरस चाहे न हो लेकिन आगे चलकर
बहुमत किसानों और मजूरों ही का हो जाएगा। देवीदीन ने मुस्कराकर कहा,' भैया, तुम भी इन बातों को समझते हो यही मैंने भी
सोचा था। भगवान करे, कुछ दिन और जिऊं। मेरा पहला सवाल यह
होगा कि बिलायती चीज़ों पर दुगुना महसूल लगाया जाय और मोटरों पर चौगुना। अच्छा अब
भोजन बनाओ। सांझ को चलकर कपड़े दरजी को दे देंगे। मैं भी जब तक खा लूं।'
शाम
को देवीदीन ने आकर कहा, 'चलो भैया, अब तो अंधेरा हो गया।'
रमा
सिर पर हाथ धरे बैठा हुआ था। मुख पर उदासी छाई हुई थी। बोला, 'दादा, मैं घर न जाऊंगा।'
देवीदीन
ने चकित होकर पूछा, 'क्यों क्या बात हुई?'
रमा
की आंखें सजल हो गई। बोला, 'कौन?सा
मुंह लेकर जाऊं, दादा! मुझे तो डूब मरना चाहिए था।'
यह
कहते-कहते वह खुलकर रो पड़ा। वह वेदना जो अब तक मूर्छित पड़ी थी, शीतल जल के यह छींटे पाकर सचेत हो गई और उसके क्रंदन ने रमा के सारे
अस्तित्व को जैसे छेद डाला। इसी क्रंदन के भय से वह उसे छेड़ता न था, उसे सचेत करने की चेष्टा न करता था। संयत विस्मृति से उसे अचेत ही रखना
चाहता था, मानो कोई दुद्यखिनी माता अपने बालक को इसलिए जगाते
डरती
हो कि वह तुरंत खाने को मांगने लगेगा।
सत्ताईस
कई
दिनों के बाद एक दिन कोई आठ बजे रमा पुस्तकालय से लौट रहा था कि मार्ग में उसे कई
युवक शतरंज के किसी नक्शे की बातचीत करते मिले। यह नक्शा वहां के एक हिंदी दैनिक
पत्र में छपा था और उसे हल करने वाले को पचास रूपये इनाम देने का वचन दिया गया था।
नक्शा असाकेय-सा जान पड़ता था। कम-सेकम इन युवकों की बातचीत से ऐसा ही टपकता था।
यह भी मालूम हुआ कि वहां के और भी कितने ही शतरंजबाज़ों ने उसे हल करने के लिए
भरपूर ज़ोर लगाया, पर कुछ पेश न गई। अब रमा को
याद आया कि पुस्तकालय में एक पत्र पर बहुत-से आदमी झुके हुए थे और उस नक्शे की नकल
कर रहे थे। जो आता था, दो-चार मिनट तक वह पत्र देख लेता था।
अब मालूम हुआ, यह बात थी। रमा का इनमें से किसी से भी परिचय
न था, पर वह यह नक्शा देखने के लिए इतना उत्सुक हो रहा था कि
उससे बिना पूछे न रहा गया। बोला,आप लोगों में किसी के पास वह
नक्शा है?
युवकों
ने एक कंबलपोश आदमी को नक्शे की बात पूछते सुना तो समझे कोई अताई होगा। एक ने
रूखाई से कहा, 'हां, है तो,
मगर तुम देखकर क्या करोगे, यहां अच्छे-अच्छे
गोते खा रहे हैं। एक महाशय, जो शतरंज में अपना सानी नहीं
रखते, उसे हल करने के लिए सौ रूपये अपने पास से देने को
तैयार हैं। '
दूसरा
युवक बोला, 'दिखा क्यों नहीं देते जी, कौन जाने यही बेचारे हल कर लें, शायद इन्हीं की सूझ
लड़ जाए।' इस प्रेरणा में सज्जनता नहीं व्यंग्य था, उसमें यह भाव छिपा था कि हमें
दिखाने
में कोई उज्र नहीं है, देखकर अपनी आंखों को त!प्त कर
लो मगर तुम जैसे उल्लू उसे समझ ही नहीं सकते, हल क्या
करेंगे। जान - पहचान की एक दुकान में जाकर उन्होंने रमा को नक्शा दिखाया।
रमा
को तुरंत याद आ गया, यह नक्शा पहले भी कहीं देखा
है। सोचने लगा, कहां देखा है?
एक
युवक ने चुटकी ली, 'आपने तो हल कर लिया होगा!'
दूसरा, 'अभी नहीं किया तो एक क्षण में किए लेते हैं!'
तीसरा, 'ज़रा दो-एक चाल बताइए तो?'
रमा
ने उत्तेजित होकर कहा,यह मैं नहीं कहता कि मैं उसे
हल कर ही लूंगा, मगर ऐसा नक्शा मैंने एक बार हल किया है,
और संभव है, इसे भी हल कर लूं। ज़रा
काग़ज़-पेंसिल दीजिए तो नकल कर लूं।'
युवकों
का अविश्वास कुछ कम हुआ। रमा को काग़ज़-पेंसिल मिल गया। एक क्षण में उसने नक्शा
नकल कर लिया और युवकों को धन्यवाद देकर चला। एकाएक उसने फिरकर पूछा, 'जवाब किसके पास भेजना होगा?'
एक
युवक ने कहा,'प्रजा-मित्र' के
संपादक के पास।'
रमा
ने घर पहुंचकर उस नक्शे पर दिमाग़ लगाना शुरू किया, लेकिन
मुहरों की चालें सोचने की जगह वह यही सोच रहा था कि यह नक्शा कहां देखा। शायद याद
आते ही उसे नक्शे का हल भी सूझ जायगा। अन्य प्राणियों की तरह मस्तिष्क भी कार्य
में तत्पर न होकर बहाने खोजता है। कोई आधार मिल जाने से वह मानो छुट्टी पा जाता
है। रमा आधी रात तक नक्शा सामने खोले बैठा रहा। शतरंज की जो बडी-बडी मार्के की
बाजियां खेली थीं, उन सबका नक्शा उसे याद था, पर यह नक्शा कहां देखा?
सहसा
उसकी आंखों के सामने बिजली-सी कौधं गई। खोई हुई स्मृति मिल गई। अहा! राजा साहब ने
यह नक्शा दिया था। हां, ठीक है। लगातार तीन दिन
दिमाग़ लडाने के बाद इसे उसने हल किया था। नक्शे की नकल भी कर लाया था। फिर तो उसे
एक-एक चाल याद आ गई। एक क्षण में नक्शा हल हो गया! उसने उल्लास के नशे में ज़मीन
पर दो-तीन कुलांचें लगाई, मूछों पर ताव दिया, आईने में मुंह देखा और चारपाई पर लेट गया। इस तरह अगर महीने में एक
नक्शा
मिलता जाए, तो क्या पूछना!
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