गबन: अध्याय-4
अध्याय
4
इकतीस
उसी
दिन शव काशी लाया गया। यहीं उसकी दाह-क्रिया हुई। वकील साहब के एक भतीजे मालवे में
रहते थे। उन्हें तार देकर बुला लिया गया। दाह-क्रिया उन्होंने की। रतन को चिता के
दृश्य की कल्पना ही से रोमांच होता था। वहां पहुंचकर शायद वह बेहोश हो जाती। जालपा
आजकल प्रायद्य सारे दिन उसी के साथ रहती। शोकातुर रतन को न घर-बार की सुधि थी, न खाने-पीने की। नित्य ही कोई-न-कोई ऐसी बात याद आ जाती जिस पर वह घंटों
रोती। पति के साथ उसका जो धर्म था, उसके एक अंश का भी उसने
पालन किया होता, तो उसे बोध होता। अपनी कर्तव्यहीनता,
अपनी निष्ठुरता, अपनी श्रृंगार-लोलुपता की
चर्चा करके वह इतना रोती कि हिचकियां बंध जातीं। वकील साहब के सदगुणों की चर्चा
करके ही वह अपनी आत्मा को शांति देती थी। जब तक जीवन के द्वार पर एक रक्षक बैठा
हुआ था, उसे कुत्तों या बिल्ली या चोर-चकार की चिंता न थी,
लेकिन अब द्वार पर कोई रक्षक न था, इसलिए वह
सजग रहती थी,पति का गुणगान किया करती। जीवन का निर्वाह कैसे
होगा, नौकरों-चाकरों में किन-किन को जवाब देना होगा, घर का कौन-कौनसा ख़र्च कम करना होगा, इन प्रश्नों के
विषय में दोनों में कोई बात न होती। मानो यह चिंता म!त आत्मा के प्रति अभक्ति
होगी। भोजन करना, साफ वस्त्र पहनना और मन को कुछ पढ़कर
बहलाना भी उसे अनुचित जान पड़ता था। श्राद्ध के दिन उसने अपने सारे वस्त्र और
आभूषण महापात्र को दान कर दिए। इन्हें लेकर अब वह क्या करेगी? इनका व्यवहार करके क्या वह अपने जीवन को कलंकित करेगी! इसके विरुद्ध पति
की छोटी से छोटी वस्तु को भी स्मृतिचिन्ह समझकर वह देखती - भालती रहती थी। उसका
स्वभाव इतना कोमल हो गया था कि कितनी ही बडी हानि हो जाय, उसे
क्रोध न आता था। टीमल के हाथ से चाय का सेट छूटकर फिर पडा, पर
रतन के माथे पर बल तक न आया। पहले एक दवात टूट जाने पर इसी टीमल को उसने बुरी डांट
बताई थी, निकाले देती थी, पर आज उससे
कई गुने नुकसान पर उसने ज़बान तक न खोली। कठोर भाव उसके ह्रदय में आते हुए मानो
डरते थे कि कहीं आघात न पहुंचे या शायद पति-शोक और पति-गुणगान के सिवा और किसी भाव
या विचार को मन में लाना वह पाप समझती थी। वकील साहब के भतीजे का नाम था मणिभूषणब
बडा ही मिलनसार, हंसमुख, कार्य-कुशलब
इसी एक महीने में उसने अपने सैकड़ों मित्र बना लिए।
शहर
में जिन-जिन वकीलों और रईसों से वकील साहब का परिचय था, उन सबसे उसने ऐसा मेल-जोल बढ़ाया, ऐसी बेतकल्लुफी
पैदा की कि रतन को ख़बर नहीं और उसने बैंक का लेन-देन अपने नाम से शुरू कर दिया।
इलाहाबाद बैंक में वकील साहब के बीस हज़ार रूपये जमा थे। उस पर तो उसने कब्ज़ा कर
ही लिया, मकानों के किराए भी वसूल करने लगा। गांवों की तहसील
भी ख़ुद ही शुरू कर दी, मानो रतन से कोई मतलब नहीं है। एक
दिन टीमल ने आकर रतन से कहा, 'बहूजी, जाने
वाला तो चला गया, अब घर-द्वार की भी कुछ ख़बर लीजिए। मैंने
सुना, भैयाजी ने बैंक का सब रूपया अपने नाम करा लिया।'
रतन
ने उसकी ओर ऐसे कठोर कुपित नजरों से देखा कि उसे फिर कुछ कहने की हिम्मत न पड़ी।
उस दिन शाम को मणिभूषण ने टीमल को निकाल दिया,चोरी का
इलज़ाम लगाकर निकाला जिससे रतन कुछ कह भी न सके। अब केवल महराज रह गए। उन्हें
मणिभूषण ने भंग पिला-पिलाकर ऐसा मिलाया कि वह उन्हीं का दम भरने लगे। महरी से कहते,
बाबूजी का बडा रईसाना मिज़ाज है। कोई सौदा लाओ, कभी नहीं पूछते,कितने का लाए। बड़ों के घर में बडे
ही होते हैं। बहूजी बाल की खाल निकाला करती थीं, यह बेचारे
कुछ नहीं बोलते। महरी का मुंह पहले ही सी दिया गया था। उसके अधेड़ यौवन ने नए
मालिक की रसिकता को चंचल कर दिया था। वह एक न एक बहाने से बाहर की बैठक में ही
मंडलाया करती। रतन को ज़रा भी ख़बर न थी, किस तरह उसके लिए
व्यूह रचा जा रहा है।
एक
दिन मणिभूषण ने रतन से कहा, 'काकीजी, अब तो मुझे यहां रहना व्यर्थ मालूम होता है। मैं सोचता हूं, अब आपको लेकर घर चला जाऊं। वहां आपकी बहू आपकी सेवा करेगी, बाल-बच्चों में आपका जी बहल जायगा और ख़र्च भी कम हो जाएगा। आप कहें तो यह
बंगला बेच दिया जाय। अच्छे दाम मिल जायंगे।'
रतन
इस तरह चौंकी, मानो उसकी मूर्छा भंग हो गई हो, मानो किसी ने उसे झंझोड़कर जगा दिया हो सकपकाई हुई आंखों से उसकी ओर देखकर
बोली, 'क्या मुझसे कुछ कह रहे हो?'
मणिभूषण-'जी हां, कह रहा था कि अब हम लोगों का यहां रहना
व्यर्थ है। आपको लेकर चला जाऊं, तो कैसा हो?'
रतन
ने उदासीनता से कहा, 'हां, अच्छा
तो होगा।'
मणिभूषण-'काकाजी ने कोई वसीयतनामा लिखा हो, तो लाइए देखूं,
उनको इच्छाओं के आगे सिर झुकाना हमारा धर्म है।'
रतन
ने उसी भांति आकाश पर बैठे हुए, जैसे संसार की बातों से
अब उसे कोई सरोकार ही न रहा हो, जवाब दिया, 'वसीयत तो नहीं लिखी, और क्या जरूरत थी?'
मणिभूषण
ने फिर पूछा, 'शायद कहीं लिखकर रख गए हों?'
रतन-'मुझे तो कुछ मालूम नहीं। कभी ज़िक्र नहीं किया।'
मणिभूषण
ने मन में प्रसन्न होकर कहा,मेरी इच्छा है कि उनकी
कोई यादगार बनवा दी जाय।
रतन
ने उत्सुकता से कहा, 'हां-हां, मैं भी चाहती हूं।'
मणिभूषण-'गांव की आमदनी कोई तीन हज़ार साल की है, यह आपको
मालूम है। इतना ही उनका वार्षिक दान होता था। मैंने उनके हिसाब की किताब देखी है।
दो सौ-ढाई सौ से किसी महीने में कम नहीं है। मेरी सलाह है कि वह सब ज्यों-का-त्यों
बना रहे।'
रतन
ने प्रसन्न होकर कहा, हां, और
क्या! '
मणिभूषण-'तो गांव की आमदनी तो धार्मार्थ पर अर्पण कर दी जाए। मकानों का किराया कोई
दो सौ रूपये महीना है। इससे उनके नाम पर एक छोटीसी संस्कृत पाठशाला खोल दी जाए।
रतन-'बहुत अच्छा होगा।'
मणिभूषण-'और यह बंगला बेच दिया जाए। इस रूपये को बैंक में रख दिया जाय।'
रतन-'बहुत अच्छा होगा। मुझे रूपये-पैसे की अब क्या जरूरत है।'
मणिभूषण-'आपकी सेवा के लिए तो हम सब हाज़िर हैं। मोटर भी अलग कर दी जाय। अभी से यह
फिक्र की जाएगी, तब जाकर कहीं दो-तीन महीने में फुरसत
मिलेगी।'
रतन
ने लापरवाही से कहा, 'अभी जल्दी क्या है। कुछ
रूपये बैंक में तो हैं।'
मणिभूषण-'बैंक में कुछ रूपये थे, मगर महीने-भर से ख़र्च भी तो
होरहे हैं। हज़ार-पांच सौ पड़े होंगे। यहां तो रूपये जैसे हवा में उड़ जाते हैं।
मुझसे तो इस शहर में एक महीना भी न रहा जाय। मोटर को तो जल्द ही निकाल देना चाहिए।'
रतन
ने इसके जवाब में भी यही कह दिया, 'अच्छा तो होगा।'
वह
उस मानसिक दुर्बलता की दशा में थी, जब मनुष्य
को छोटे-छोटे काम भी असूझ मालूम होने लगते हैं। मणिभूषण की कार्य-कुशलता ने एक
प्रकार से उसे पराभूत कर दिया था। इस समय जो उसके साथ थोड़ी-सी भी सहानुभूति दिखा
देता, उसी को वह अपना शुभचिंतक समझने लगती। शोक और मनस्ताप
ने उसके मन को इतना कोमल और नर्म बना दिया था कि उस पर किसी की भी छाप पड़ सकती
थी। उसकी सारी मलिनता और भिकैता मानो भस्म हो गई थी, वह सभी
को अपना समझती थी। उसे किसी पर संदेह न था, किसी से शंका न
थी। कदाचित उसके सामने कोई चोर भी उसकी संपत्ति का अपहरण करता तो वह शोर न मचाती।
बत्तीस
षोडशी
के बाद से जालपा ने रतन के घर आना-जाना कम कर दिया था। केवल एक बार घंटे-दो घंटे
के लिए चली जाया करती थी। इधर कई दिनों से मुंशी दयानाथ को ज्वर आने लगा था।
उन्हें ज्वर में छोड़कर कैसे जाती। मुंशीजी को ज़रा भी ज्वर आता, तो वह बक-झक करने लगते थे। कभी गाते, कभी रोते,
कभी यमदूतों को अपने सामने नाचते देखते। उनका जी चाहता कि सारा घर
मेरे पास बैठा रहे, संबंधियों को भी बुला लिया जाय,जिसमें वह सबसे अंतिम भेंट कर लें। क्योंकि इस बीमारी से बचने की उन्हें
आशा न थी। यमराज स्वयं उनके सामने विमान लिये खड़े थे। जागेयेश्वरी और सब कुछ कर
सकती थी, उनकी बक-झक न सुन सकती थी। ज्योंही वह रोने लगते,
वह कमरे से निकल जाती। उसे भूत-बाधा का भ्रम होता था। मुंशीजी के
कमरे में कई समाचार-पत्रों के गाइल थे। यही उन्हें एक व्यसन था। जालपा का जी वहां
बैठे-बैठे घबडाने लगता, तो इन गाइलों को उलटपलटकर देखने
लगती। एक दिन उसने एक पुराने पत्र में शतरंज का एक नक्शा देखा, जिसे हल कर देने के लिए किसी सज्जन ने पुरस्कार भी रक्खा था। उसे
ख़याल
आया कि जिस ताक पर रमानाथ की बिसात और मुहरे रक्खे हुए हैं उस पर एक किताब में कई
नक्शे भी दिए हुए हैं। वह तुरंत दौड़ी हुई ऊपर गई और वह कापी उठा लाईब यह नक्शा उस
कापी में मौजूद था, और नक्शा ही न था, उसका हल भी दिया हुआ था। जालपा के मन में सहसा यह विचार चमक पडा, इस नक्शे को किसी पत्र में छपा दूं तो कैसा हो! शायद उनकी
निगाह
पड़ जाय। यह नक्शा इतना सरल तो नहीं है कि आसानी से हल हो जाय। इस नगर में जब कोई
उनका सानी नहीं है, तो ऐसे लोगों की संख्या बहुत
नहीं हो सकती, जो यह नक्शा हल कर सकेंब कुछ भी हो, जब उन्होंने यह नक्शा हल किया है, तो इसे देखते ही
फिर हल कर लेंगे। जो लोग पहली बार देखेंगे, उन्हें दो-एक दिन
सोचने में लग जायंगे। मैं लिख दूंगी कि जो सबसे पहले हल कर ले, उसी को पुरस्कार दिया जाय। जुआ तो है ही। उन्हें रूपये न भी मिलें,
तो भी इतना तो संभव है ही कि हल करने वालों में उनका नाम भी हो कुछ
पता लग जायगा। कुछ भी न हो,तो रूपये ही तो जायंगे। दस रूपये
का पुरस्कार रख दूं। पुरस्कार कम होगा, तो कोई बडा खिलाड़ी
इधर ध्यान न देगा। यह बात भी रमा के हित की ही होगी। इसी उधेड़-बुन में वह आज रतन
से न मिल सकी। रतन दिनभर तो उसकी राह देखती रही। जब वह शाम को भी न गई, तो उससे न रहा गया।
आज
वह पति-शोक के बाद पहली बार घर से निकली। कहीं रौनक न थी, कहीं जीवन न था, मानो सारा नगर शोक मना रहा है। उसे
तेज़ मोटर चलाने की धुन थी, पर आज वह तांगे से भी कम जा रही
थी। एक वृद्धा को सडक के किनारे बैठे देखकर उसने मोटर रोक दिया और उसे चार आने दे
दिए। कुछ आगे और बढ़ी, तो दो कांस्टेबल एक कैदी को लिये जा
रहे थे। उसने मोटर रोककर एक कांस्टेबल को बुलाया और उसे एक रूपया देकर कहा,इस कैदी को मिठाई खिला देना। कांस्टेबल ने सलाम करके रूपया ले लिया। दिल
में ख़ुश हुआ, आज किसी भाग्यवान का मुंह देखकर उठा था।
जालपा
ने उसे देखते ही कहा, 'क्षमा करना बहन, आज मैं न आ सकी। दादाजी को कई दिन से ज्वर आ रहा है।'
रतन
ने तुरंत मुंशीजी के कमरे की ओर कदम उठाया और पूछा, 'यहीं
हैं न? तुमने मुझसे न कहा।'
मुंशीजी
का ज्वर इस समय कुछ उतरा हुआ था। रतन को देखते ही बोले, 'बडा दुःख हुआ देवीजी, मगर यह तो संसार है। आज एक की
बारी है, कल दूसरे की बारी है। यही चल-चलाव लगा हुआ है। अब
मैं भी चला। नहीं बच सकता बडी प्यास है, जैसे छाती में कोई
भटठी जल रही हो फुंका जाता हूं। कोई अपना नहीं होता। बाईजी, संसार
के नाते सब स्वार्थ के नाते हैं। आदमी अकेला हाथ पसारे एक दिन चला जाता है।
हाय-हाय! लड़का था वह भी हाथ से निकल गया! न जाने कहां गया। आज होता, तो एक पानी देने वाला तो होता। यह दो लौंडे हैं, इन्हें
कोई फिक्र ही नहीं, मैं मर जाऊं या जी जाऊं। इन्हें तीन वक्त
खाने को चाहिए, तीन दट्ठ पानी पीने को, बस और किसी काम के नहीं। यहां बैठते दोनों का दम घुटता है। क्या करूं।
अबकी न बचूंगा।'
रतन
ने तस्कीन दी, 'यह मलेरिया है, दो-चार
दिन में आप अच्छे हो जायंगे। घबडाने की कोई बात नहीं।'
मुंशीजी
ने दीन नजरों से देखकर कहा, 'बैठ जाइए बहूजी, आप कहती हैं, आपका आशीर्वाद है, तो शायद बच जाऊं, लेकिन मुझे तो आशा नहीं है। मैं भी
ताल ठोके यमराज से लड़ने को तैयार बैठा हूं। अब उनके घर मेहमानी खाऊंगा। अब कहां
जाते हैं बचकर बचा! ऐसा-ऐसा रगेदूं, कि वह भी याद करें। लोग
कहते हैं, वहां भी आत्माएं इसी तरह रहती हैं। इसी तरह वहां
भी कचहरियां हैं, हाकिम हैं, राजा हैं,
रंक हैं। व्याख्यान होते हैं, समाचार-पत्र
छपते हैं। फिर क्या चिंता है। वहां भी अहलमद हो जाऊंगा। मज़े से अख़बार पढ़ा
करूंगा।'
रतन
को ऐसी हंसी छूटी कि वहां खड़ी न रह सकी। मुंशीजी विनोद के भाव से वे बातें नहीं
कर रहे थे। उनके चेहरे पर गंभीर विचार की रेखा थी। आज डेढ़-दो महीने के बाद रतन
हंसी,
और इस असामयिक हंसी को छिपाने के लिए कमरे से निकल आई। उसके साथ ही
जालपा भी बाहर आ गई। रतन ने अपराधी नजरों से उसकी ओर देखकर कहा, 'दादाजी ने मन में क्या समझा होगा। सोचते होंगे, मैं
तो जान से मर रहा हूं और इसे हंसी सूझती है। अब वहां न जाऊंगी, नहीं ऐसी ही कोई बात फिर कहेंगे, तो मैं बिना हंसे न
रह सकूंगी। देखो तो आज कितनी बे-मौका हंसी आई है। वह अपने मन को इस उच्छृंखलता के
लिए धिक्कारने लगी। जालपा ने
उसके
मन का भाव ताड़कर कहा,मुझे भी अक्सर इनकी बातों पर
हंसी आ जाती है, बहन! इस वक्त तो इनका ज्वर कुछ हल्का है। जब
ज़ोर का ज्वर होता है तब तो यह और भी ऊल-जलूल बकने लगते हैं। उस वक्त हंसी रोकनी
मुश्किल हो जाती है। आज सबेरे कहने लगे,मेरा पेट भक हो गया,मेरा पेट भक हो गया। इसकी रट लगा दी। इसका आशय क्या था, न मैं समझ सकी,
न
अम्मां समझ सकीं, पर वह बराबर यही रटे जाते थे,पेट भक हो गया! पेट भक हो गया! आओ कमरे में चलें।'
रतन-'मेरे साथ न चलोगी?'
जालपा-'आज तो न चल सयंगी, बहन।'
'कल आओगी?'
'कह नहीं सकती। दादा का जी कुछ हल्का रहा, तो आऊंगी।'
'नहीं भाई, जरूर आना। तुमसे एक सलाह करनी है।'
'क्या सलाह है?'
'मन्नी कहते हैं, यहां अब रहकर क्या करना है, घर चलो। बंगले को बेच देने को कहते हैं।'
जालपा
ने एकाएक ठिठककर उसका हाथ पकड़ लिया और बोली, 'यह तो
तुमने बुरी ख़बर सुनाई, बहन! मुझे इस दशा में तुम छोड़कर चली
जाओगी?मैं न जाने दूंगी! मन्नी से कह दो, बंगला बेच दें, मगर जब तक उनका कुछ पता न चल जायगा।
मैं तुम्हें न छोड़ूंगी। तुम कुल एक हफ्ते बाहर रहीं, मुझे
एक-एक पल पहाड़ हो गया। मैं न जानती थी कि मुझे तुमसे इतना प्रेम हो गया है। अब तो
शायद मैं मर ही जाऊं। नहीं बहन, तुम्हारे पैरों पड़ती हूं,
अभी जाने का नाम न लेना।'
रतन
की भी आंखें भर आई। बोली, 'मुझसे भी वहां न रहा जायगा,
सच कहती हूं। मैं तो कह दूंगी, मुझे नहीं जाना
है।' जालपा उसका हाथ पकड़े हुए ऊपर अपने कमरे में ले गई और
उसके गले में हाथ डालकर बोली, 'कसम खाओ कि मुझे छोड़कर न
जाओगी।'
रतन
ने उसे अंकवार में लेकर कहा, 'लो, कसम खाती हूं, न जाऊंगी। चाहे इधर की दुनिया उधार हो
जाय। मेरे लिए वहां क्या रक्खा है। बंगला भी क्यों बेचूं, दो-ढाई
सौ मकानों का किराया है। हम दोनों के गुज़र के लिए काफी है। मैं आज ही मन्नी से कह
दूंगी,मैं न जाऊंगी।'
सहसा
फर्श पर शतरंज के मुहरे और नक्शे देखकर उसने पूछा,यह
शतरंज किसके साथ खेल रही थीं?
जालपा
ने शतरंज के नक्शे पर अपने भाग्य का पांसा फेंकने की जो बात सोची थी, वह सब उससे कह सुनाई,मन में डर रही थी कि यह कहीं इस
प्रस्ताव को व्यर्थ न समझे, पागलपन न ख़याल करे, लेकिन रतन सुनते ही बाग़-बाग़ हो गई। बोली,दस रूपये
तो बहुत कम पुरस्कार है। पचास रूपये कर दो। रूपये मैं देती हूं।
जालपा
ने शंका की, 'लेकिन इतने पुरस्कार के लोभ से कहीं
अच्छे शतरंजबाज़ों ने मैदान में कदम रक्खा तो?'
रतन
ने दृढ़ता से कहा,कोई हरज नहीं। बाबूजी की निगाह
पड़ गई, तो वह इसे जरूर हल कर लेंगे और मुझे आशा है कि सबसे
पहले उन्हीं का नाम आवेगा। कुछ न होगा, तो पता तो लग ही
जायगा। अख़बार के दफ्तर में तो उनका पता आ ही जायगा। तुमने बहुत अच्छा उपाय सोच
निकाला है। मेरा मन कहता है, इसका अच्छा फल होगा, मैं अब मन की प्रेरणा की कायल हो गई हूं। जब मैं इन्हें लेकर कलकत्ता चली
थी, उस वक्त मेरा मन कह रहा था, यहां
जाना
अच्छा न होगा।'
जालपा-'तो तुम्हें आशा है?'
'पूरी! मैं कल सबेरे रूपये लेकर आऊंगी।'
'तो मैं आज ख़त लिख रक्खूंगी। किसके पास भेजूं? वहां
का कोई प्रसिद्ध पत्र होना चाहिए।'
'वहां तो 'प्रजा-मित्र' की बडी
चर्चा थी। पुस्तकालयों में अक्सर लोग उसी को पढ़ते नज़र आते थे। '
'तो 'प्रजा-मित्र' ही को
लिखूंगी, लेकिन रूपये हड़प कर जाय और नक्शा न छापे तो क्या
हो?'
'होगा क्या, पचास रूपये ही तो ले जाएगा। दमड़ी की
हंडिया खोकर कुत्तों की जात तो पहचान ली जायगी, लेकिन ऐसा हो
नहीं सकता जो लोग देशहित के लिए जेल जाते हैं, तरह-तरह की
धौंस सहते हैं, वे इतने नीच नहीं हो सकते। मेरे साथ आधा घंटे
के लिए चलो तो तुम्हें इसी वक्त रूपये दे दूं।'
जालपा
ने नीमराजी होकर कहा, 'इस वक्त क़हां चलूं। कल ही
आऊंगी।'
उसी
वक्त मुंशीजी पुकार उठे, 'बहू! बहू!'
जालपा
तो लपकी हुई उनके कमरे की ओर चली। रतन बाहर जा रही थी कि जागेश्वरी पंखा लिये अपने
को झलती हुई दिखाई पड़ गई। रतन ने पूछा, 'तुम्हें
गर्मी लग रही है अम्मांजी? मैं तो ठंड के मारे कांप रही हूं।
अरे! तुम्हारे पांवों में यह क्या उजला-उजला लगा हुआ है? क्या
आटा पीस रही थीं?'
जागेश्वरी
ने लज्जित होकर कहा, 'हां, वैद्य
जी ने इन्हें हाथ के आटे की रोटी खाने को कहा है। बाज़ार में हाथ का आटा कहां
मयस्सर- मुहल्ले में कोई पिसनहारी नहीं मिलती। मजूरिनें तक चक्की से आटा पिसवा
लेती हैं। मैं तो एक आना सेर देने को राज़ी हूं, पर कोई
मिलती ही नहीं।'
रतन
ने अचंभे से कहा, 'तुमसे चक्की चल जाती है?'
जागेश्वरी
ने झेंप से मुस्कराकर कहा,'कौन बहुत था। पाव-भर तो दो
दिन के लिए हो जाता है। खाते नहीं एक कौर भी, बहू पीसने जा
रही थी, लेकिन फिर मुझे उनके पास बैठना पड़ता। मुझे रात-भर
चक्की पीसना गौं है, उनके पास घड़ी-भर बैठना गौं नहीं।
रतन
जाकर जांत के पास एक मिनट खड़ी रही, फिर
मुस्कराकर माची पर बैठ गई और बोली, 'तुमसे तो अब जांत न चलता
होगा, मांजी! लाओ थोडासा गेहूं मुझे दो, देखूं तो।'
जागेश्वरी
ने कानों पर हाथ रखकर कहा, 'अरे नहीं बहू, तुम क्या पीसोगी!चलो यहां से।'
रतन
ने प्रमाण दिया, 'मैंने बहुत दिनों तक पीसा है, मांजीब जब मैं अपने घर थी, तो रोज़ पीसती थी। मेरी
अम्मां, लाओ थोडा-सा गेहूं।'
'हाथ दुखने लगेगा। छाले पड़ जाएंगे।'
'कुछ नहीं होगा मांजी, आप गेहूं तो लाइए।'
जागेश्वरी
ने उसका हाथ पकड़कर उठाने की कोशिश करके कहा, 'गेहूं घर
में नहीं हैं। अब इस वक्त बाज़ार से कौन लावे।'
'अच्छा चलिए, मैं भंडारे में देखूं। गेहूं होगा कैसे
नहीं।'
रसोई
की बगल वाली कोठरी में सब खाने-पीने का सामान रहता था। रतन अंदर चली गई और
हांडियों में टटोल-टटोलकर देखने लगी। एक हांडी में गेहूं निकल आए। बडी खुश हुई।
बोली,देखो मांजी, निकले कि नहीं, तुम
मुझसे बहाना कर रही थीं। उसने एक टोकरी में थोडा-सा गेहूं निकाल लिया और ख़ुश-ख़ुश
चक्की पर जाकर पीसने लगी। जागेश्वरी ने जाकर जालपा से कहा, 'बहू,
वह जांत पर बैठी गेहूं पीस रही हैं। उठाती हूं, उठतीं ही नहीं। कोई देख ले तो क्या कहे।
जालपा
ने मुंशीजी के कमरे से निकलकर सास की घबराहट का आनंद उठाने के लिए कहा, 'यह तुमने क्या ग़ज़ब किया, अम्मांजी! सचमुच, कोई देख ले तो नाक ही कट जाय! चलिए, ज़रा देखूं।'
जागेश्वरी
ने विवशता से कहा, 'क्या करूं, मैं तो समझा के हार गई, मानतीं ही नहीं।'
जालपा
ने जाकर देखा, तो रतन गेहूं पीसने में मग्न थी। विनोद के
स्वाभाविक आनंद से उसका चेहरा खिला हुआ था। इतनी ही देर में उसके माथे पर पसीने की
बूंदें आ गई थीं। उसके बलिष्ठ हाथों में जांत लट्टू के समान नाच रहा था।
जालपा
ने हंसकर कहा, 'ओ री, आटा महीन हो,
नहीं पैसे न मिलेंगे।'
रतन
को सुनाई न दिया। बहरों की भांति अनिश्चित भाव से मुस्कराई।
जालपा
ने और ज़ोर से कहा, 'आटा खूब महीन पीसना, नहीं पैसे न पाएगी।' रतन ने भी हंसकर कहा, जितना महीन कहिए उतना महीन पीस दूं,बहूजी। पिसाई
अच्छी मिलनी चाहिए।
जालपा-'मोले सेर।'
रतन-'मोले सेर सही।'
जालपा-'मुंह धो आओ। धोले सेर मिलेंगे।'
रतन-'मैं यह सब पीसकर उठूंगी। तुम यहां क्यों खड़ी हो?'
जालपा-'आ जाऊं, मैं भी खिंचा दूं।'
रतन-'जी चाहता है, कोई जांत का गीत गाऊं!'
जालपा-'अकेले कैसे गाओगी! (जागेश्वरी से) अम्मां आप ज़रा दादाजी के पास बैठ जायं,
मैं अभी आती हूं।'
जालपा
भी जांत पर जा बैठी और दोनों जांत का यह गीत गाने लगीं।
'मोहि जोगिन बनाके कहां गए रे जोगिया।'
दोनों
के स्वर मधुर थे। जांत की घुमुर-घुमुर उनके स्वर के साथ साज़ का काम कर रही थी। जब
दोनों एक कड़ी गाकर चुप हो जातीं, तो जांत का स्वर माना
कंठ-ध्वनि से रंजित होकर और भी मनोहर हो जाता था। दोनों के ह्रदय इस समय जीवन के
स्वाभाविक आनंद से पूर्ण थे? न शोक का भार था, न वियोग का दुःख। जैसे दो चिडियां प्रभात की अपूर्व शोभा से मग्न होकर चहक
रही हों।
तैंतीस
रमानाथ
की चाय की दूकान खुल तो गई, पर केवल रात को खुलती थी।
दिन-भर बंद रहती थी। रात को भी अधिकतर देवीदीन ही दुकान पर बैठता,पर बिक्री अच्छी हो जाती थी। पहले ही दिन तीन रूपये के पैसे आए, दूसरे दिन से चारपांच रूपये का औसत पड़ने लगा। चाय इतनी स्वादिष्ट होती थी
कि जो एक बार यहां चाय पी लेता फिर दूसरी दूकान पर न जाता। रमा ने मनोरंजन की भी
कुछ सामग्री जमा कर दी। कुछ रूपये जमा हो गए,तो उसने एक
सुंदर मेज़ ली। चिराग़ जलने के बाद साफ-भाजी की बिक्री ज्यादा न होती थी। वह उन
टोकरों को उठाकर अंदर रख देता और बरामदे में वह मेज़ लगा देता। उस पर ताश के सेट
रख देता। दो दैनिक-पत्र भी मंगाने लगा। दुकान चल निकली। उन्हीं तीन-चार घंटों में
छः-सात रूपये आ जाते थे और सब ख़र्च निकालकर तीनचार रूपये बच रहते थे।
इन
चार महीनों की तपस्या ने रमा की भोग-लालसा को और भी प्रचंड कर दिया था। जब तक हाथ
में रूपये न थे, वह मजबूर था। रूपये आते ही सैरसपाटे की
धुन सवार हो गई। सिनेमा की याद भी आई। रोज़ के व्यवहार की मामूली चीजें, ज़िन्हें अब तक वह टालता आया था, अब अबाधा रूप से
आने लगीं। देवीदीन के लिए वह एक सुंदर रेशमी चादर लाया। जग्गो के सिर में पीडा
होती रहती थी। एक दिन सुगंधित तेल की शीशियां लाकर उसे दे दीं। दोनों निहाल हो गए।
अब बुढिया कभी अपने सिर पर बोझ लाती तो डांटता, 'काकी,
अब तो मैं भी चार पैसे कमाने लगा हूं, अब तू
क्यों जान देती है? अगर फिर कभी तेरे सिर पर टोकरी देखी तो
कहे देता हूं, दूकान उठाकर फेंक दूंगा। फिर मुझे जो सज़ा
चाहे दे देना। बुढिया बेटे की डांट सुनकर गदगद हो जाती। मंडी से बोझ लाती तो पहले
चुपके से देखती, रमा दुकान पर नहीं है। अगर वह बैठा होता तो
किसी द्दली को एक-दो पैसा देकर उसके सिर पर रख देती। वह न होता तो लपकी हुई आती और
जल्दी से बोझ उतारकर शांत बैठ जाती,जिससे रमा भांप न सके।
एक
दिन 'मनोरमा थियेटर' में राधेश्याम का कोई नया ड्रामा
होने वाला था। इस ड्रामे की बडी धूम थी। एक दिन पहले से ही लोग अपनी जगहें रक्षित
करा रहे थे। रमा को भी अपनी जगह रक्षित करा लेने की धुन सवार हुई। सोचा, कहीं रात को टिकट न मिला तो टापते रह जायंगे। तमाशे की बडी तारीफ है। उस
वक्त एक के दो देने पर भी जगह न मिलेगी। इसी उत्सुकता ने पुलिस के भय को भी पीछे
डाल दिया। ऐसी आफत नहीं आई है कि घर से निकलते ही पुलिस पकड़ लेगी। दिन को न सही,
रात को तो निकलता ही हूं। पुलिस चाहती तो क्या रात को न पकड़ लेती।
फिर मेरा वह हुलिया भी नहीं रहा। पगड़ी चेहरा बदल देने के लिए काफी है। यों मन को
समझाकर वह दस बजे घर से निकला। देवीदीन कहीं गया हुआ था। बुढिया ने पूछा,कहां जाते हो, बेटा- रमा ने कहा, 'कहीं नहीं काकी, अभी आता हूं।'
रमा
सड़क पर आया, तो उसका साहस हिम की भांति पिघलने लगा।
उसे पग-पग पर शंका होती थी, कोई कांस्टेबल न आ रहा हो उसे
विश्वास था कि पुलिस का एक-एक चौकीदार भी उसका हुलिया पहचानता है और उसके चेहरे पर
निगाह पड़ते ही पहचान लेगा। इसलिए वह नीचे सिर झुकाए चल रहा था। सहसा उसे ख़याल
आया, गुप्त पुलिस वाले सादे कपड़े पहने इधर-उधर घूमा करते
हैं। कौन जाने, जो आदमी मेरे बग़ल में आ रहा है, कोई जासूस ही हो मेरी ओर ध्यान से देख रहा है। यों सिर झुकाकर चलने से ही
तो नहीं उसे संदेह हो रहा है। यहां और सभी सामने ताक रहे हैं। कोई यों सिर झुकाकर
नहीं चल रहा है। मोटरों की इस रेल-पेल में सिर झुकाकर चलना मौत को नेवता देना है।
पार्क में कोई इस तरह चहलकदमी करे, तो कर सकता है। यहां तो
सामने देखना चाहिए। लेकिन बग़लवाला आदमी अभी तक मेरी ही तरफ ताक रहा है। है शायद
कोई खुफिया ही। उसका साथ छोड़ने के लिए वह एक तंबोली की दूकान पर पान खाने लगा। वह
आदमी आगे निकल गया। रमा ने आराम की लंबी सांस ली।
अब
उसने सिर उठा लिया और दिल मज़बूत करके चलने लगा। इस वक्त ट्राम का भी कहीं पता न
था,
नहीं उसी पर बैठ लेता। थोड़ी ही दूर चला होगा कि तीन कांस्टेबल आते
दिखाई दिए। रमा ने सड़क छोड़ दी और पटरी पर चलने लगा। ख्वामख्वाह सांप के बिल में
उंगली डालना कौनसी बहादुरी है। दुर्भाग्य की बात, तीनों
कांस्टेबलों ने भी सड़क छोड़कर वही पटरी ले ली। मोटरों के आने-जाने से बार-बार
इधर-उधर दौड़ना पड़ता था। रमा का कलेजा धक-धक करने लगा। दूसरी पटरी पर जाना तो
संदेह को और भी बढ़ा देगा। कोई ऐसी गली भी नहीं जिसमें घुस जाऊं। अब तो सब बहुत
समीप आ गए। क्या बात है, सब मेरी ही तरफ देख रहे हैं। मैंने
बडी हिमाकत की कि यह पग्गड़ बांध लिया और बंधी भी कितनी बेतुकी। एक टीले-सा ऊपर उठ
गया है। यह पगड़ी आज मुझे पकडावेगी। बांधी थी कि इससे सूरत बदल जाएगी। यह उल्टे और
तमाशा बन गई। हां, तीनों मेरी ही ओर ताक रहे हैं। आपस में
कुछ बातें भी कर रहे हैं। रमा को ऐसा जान पडा, पैरों में
शक्ति नहीं है।ब शायद सब मन में मेरा हुलिया मिला रहे हैं। अब नहीं बच सकता घर
वालों को मेरे पकड़े जाने की ख़बर मिलेगी, तो कितने लज्जित
होंगे। जालपा तो रो-रोकर प्राण ही दे देगी। पांच साल से कम सज़ा न होगी। आज इस
जीवन का अंत हो रहा है। इस कल्पना ने उसके ऊपर कुछ ऐसा आतंक जमाया कि उसके औसान
जाते रहे। जब सिपाहियों का दल समीप आ गया, तो उसका चेहरा भय
से कुछ ऐसा विकृत हो गया, उसकी आंखें कुछ ऐसी सशंक हो गई और
अपने को उनकी आंखों से बचाने के लिए वह कुछ इस तरह दूसरे आदमियों की आड़ खोजने लगा
कि मामूली आदमी को भी उस पर संदेह होना स्वाभाविक था, फिर
पुलिस वालों की मंजी हुई आंखें क्यों चूकतीं। एक ने अपने साथी से कहा, 'यो मनई चोर न होय, तो तुमरी टांगन ते निकर जाईब कस
चोरन की नाई ताकत है।' दूसरा बोला, 'कुछ
संदेह तो हमऊ का हुय रहा है। फुरै कह पांडे, असली चोर है।'
तीसरा
आदमी मुसलमान था, उसने रमानाथ को ललकारा,
'ओ जी ओ पगड़ी, ज़रा इधर आना, तुम्हारा क्या नाम है?'
रमानाथ
ने सीनाजोरी के भाव से कहा,'हमारा नाम पूछकर क्या करोगे?
मैं क्या चोर हूं?'
'चोर नहीं, तुम साह हो, नाम
क्यों नहीं बताते?'
रमा
ने एक क्षण आगा-पीछा में पड़कर कहा, 'हीरालाल।'
'घर कहां है?'
'घर!'
'हां, घर ही पूछते हैं।'
'शाहजहांपुर।'
'कौन मुहल्ला-'
रमा
शाहजहांपुर न गया था, न कोई कल्पित नाम ही उसे याद
आया कि बता दे। दुस्साहस के साथ बोला, 'तुम तो मेरा हुलिया
लिख रहे हो!'
कांस्टेबल
ने भभकी दी,'तुम्हारा हुलिया पहले से ही लिखा हुआ है!
नाम झूठ बताया, सयनत झूठ बताई, मुहल्ला
पूछा तो बगलें झांकने लगे। महीनों से तुम्हारी तलाश हो रही है, आज जाकर मिले हो चलो थाने पर।' यह कहते हुए उसने
रमानाथ का हाथ पकड़ लिया। रमा ने हाथ छुडाने की चेष्टा करके कहा, 'वारंट लाओ तब हम चलेंगे। क्या मुझे कोई देहाती समझ लिया है?'
कांस्टेबल
ने एक सिपाही से कहा, 'पकड़ लो जी इनका हाथ,
वहीं थाने पर वारंट दिखाया जाएगा।'
शहरों
में ऐसी घटनाएं मदारियों के तमाशों से भी ज्यादा मनोरंजक होती हैं। सैकड़ों आदमी
जमा हो गए। देवीदीन इसी समय अफीम लेकर लौटा आ रहा था, यह जमाव देखकर वह भी आ गया। देखा कि तीन कांस्टेबल रमानाथ को घसीटे लिये
जा रहे हैं। आगे बढ़कर बोला, 'हैं?हैं,
जमादार! यह क्या करते हो? यह पंडितजी तो हमारे
मिहमान हैं, कहां पकड़े लिये जाते हो? '
तीनों
कांस्टेबल देवीदीन से परिचित थे। रूक गए। एक ने कहा, 'तुम्हारे
मिहमान हैं यह, कब से? '
देवीदीन
ने मन में हिसाब लगाकर कहा, 'चार महीने से कुछ बेशी हुए
होंगे। मुझे प्रयाग में मिल गए थे। रहने वाले भी वहीं के हैं। मेरे साथ ही तो आए
थे।'
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