गबन: अध्याय-2.8
रमा को विश्वास न आया। बोला-'कहीं हों न तुम्हारे पास! इतने रूपये कहां से आए? '
जालपा-'तुम्हें इससे क्या मतलब, मैं तो दो सौ रूपये देने को
कहती हूं।'
रमा
का चेहरा खिल उठा। कुछ-कुछ आशा बंधी। दो-सौ रूपये यह देदे, दो सौ रूपये रतन से ले लूं, सौ रूपये मेरे पास हैं
ही, तो कुल तीन सौ की कमी रह जाएगी, मगर
यही तीन सौ रूपये कहां से आएंगे? ऐसा कोई नज़र न आता था,
जिससे इतने रूपये मिलने की आशा की जा सके। हां, अगर रतन सब रूपये दे दे तो बिगड़ी बात बन जाय। आशा का यही एक आधार रह गया
था।
जब
वह खाना खाकर लेटा, तो जालपा ने कहा, 'आज किस सोच में पड़े हो?'
रमानाथ-'सोच किस बात का- क्या मैं उदास हूं?'
जालपा-'हां, किसी चिंता में पड़े हुए हो, मगर मुझसे बताते नहीं हो!'
रमानाथ-'ऐसी कोई बात होती तो तुमसे छिपाता?'
जालपा-'वाह, तुम अपने दिल की बात मुझसे क्यों कहोगे?
ऋषियों की आज्ञा नहीं है।'
रमानाथ-'मैं उन ऋषियों के भक्तों में नहीं हूं।'
जालपा-'वह तो तब मालूम होता, जब मैं तुम्हारे ह्रदय में
पैठकर देखती।'
रमानाथ-'वहां तुम अपनी ही प्रतिमा देखतीं।'
रात
को जालपा ने एक भयंकर स्वप्न देखा, वह चिल्ला
पड़ी। रमा ने चौंककर पूछा,'क्या है? जालपा,
क्या स्वप्न देख रही हो? '
जालपा
ने इधर-उधर घबडाई हुई आंखों से देखकर कहा,'बडे संकट
में जान पड़ी थी। न जाने कैसा सपना देख रही थी! '
रमानाथ-'क्या देखा?'
जालपा-'क्या बताऊं, कुछ कहा नहीं जाता। देखती थी कि तुम्हें
कई सिपाही पकड़े लिये जा रहे हैं। कितना भंयकर रूप था उनका!'
रमा
का ख़ून सूख गया। दो-चार दिन पहले, इस स्वप्न
को उसने हंसी में उडा दिया होता, इस समय वह अपने को सशंकित
होने से न रोक सका, पर बाहर से हंसकर बोला, 'तुमने सिपाहियों से पूछा नहीं, इन्हें क्यों पकड़े
लिये जाते हो?'
जालपा-'तुम्हें हंसी सूझ रही है, और मेरा ह्रदय कांप रहा
है।'
थोड़ी
देर के बाद रमा ने नींद में बकना शुरू किया, 'अम्मां,
कहे देता हूं, फिर मेरा मुंह न देखोगी,
मैं डूब मरूंगा।'
जालपा
को अभी तक नींद न आई थी, भयभीत होकर उसने रमा को ज़ोर
से हिलाया और बोली, 'मुझे तो हंसते थे और ख़ुद बकने लगे।
सुनकर रोएं खड़े हो गए। स्वप्न देखते थे क्या? '
रमा
ने लज्जित होकर कहा, -- हां जी, न जाने क्या देख रहा था कुछ याद नहीं।'
जालपा
ने पूछा,
'अम्मांजी को क्यों धमका रहे थे। सच बताओ, क्या
देखते थे? '
रमा
ने सिर खुजलाते हुए कहा, 'कुछ याद नहीं आता, यों ही बकने लगा हूंगा।'
जालपा-'अच्छा तो करवट सोना। चित सोने से आदमी बकने लगता है।'
रमा
करवट पौढ़ गया, पर ऐसा जान पड़ता था, मानो चिंता और शंका दोनों आंखों में बैठी हुई निद्रा के आक्रमण से उनकी
रक्षा कर रही हैं। जगते हुए दो बज गए। सहसा जालपा उठ बैठी, और
सुराही से पानी उंड़ेलती हुई बोली, 'बडी प्यास लगी थी,
क्या तुम अभी तक जाग ही रहे हो? '
रमा-'हां जी, नींद उचट गई है। मैं सोच रहा था, तुम्हारे पास दो सौ रूपये कहां से आ गए? मुझे इसका
आश्चर्य है।'
जालपा-'ये रूपये मैं मायके से लाई थी, कुछ बिदाई में मिले
थे, कुछ पहले से रक्खे थे। '
रमानाथ-'तब तो तुम रूपये जमा करने में बडी कुशल हो यहां क्यों नहीं कुछ जमा किया?'
जालपा
ने मुस्कराकर कहा, 'तुम्हें पाकर अब रूपये की
परवाह नहीं रही।'
रमानाथ-'अपने भाग्य को कोसती होगी!'
जालपा-'भाग्य को क्यों कोसूं, भाग्य को वह औरतें रोएं,
जिनका पति निखट्टू हो, शराबी हो, दुराचारी हो, रोगी हो, तानों
से स्त्री को छेदता रहे, बात-बात पर बिगड़े। पुरूष मन का हो
तो स्त्री उसके साथ उपवास करके भी प्रसन्न रहेगी।'
रमा
ने विनोद भाव से कहा, 'तो मैं तुम्हारे मन का हूं! '
जालपा
ने प्रेम-पूर्ण गर्व से कहा, 'मेरी जो आशा थी,
उससे तुम कहीं बढ़कर निकले। मेरी तीन सहेलियां हैं। एक का भी पति
ऐसा नहीं। एक एम.ए. है पर सदा रोगी। दूसरा विद्वान भी है और धनी भी, पर वेश्यागामीब तीसरा घरघुस्सू है और बिलकुल निखट्टू…'
रमा
का ह्रदय गदगद हो उठा। ऐसी प्रेम की मूर्ति और दया की देवी के साथ उसने कितना बडा
विश्वासघात किया। इतना दुराव रखने पर भी जब इसे मुझसे इतना प्रेम है, तो मैं अगर उससे निष्कपट होकर रहता, तो मेरा जीवन
कितना आनंदमय होता!
उन्नीस
प्रातःकाल
रमा ने रतन के पास अपना आदमी भेजा। ख़त में लिखा, मुझे
बडा खेद है कि कल जालपा ने आपके साथ ऐसा व्यवहार किया, जो
उसे न करना चाहिए था। मेरा विचार यह कदापि न था कि रूपये आपको लौटा दूं, मैंने सर्राफ को ताकीद करने के लिए उससे रूपये लिए थे। कंगन दो-चार रोज़
में अवश्य मिल जाएंगे। आप रूपये भेज दें। उसी थैली में दो सौ रूपये मेरे भी थे। वह
भी भेजिएगा। अपने सम्मान की रक्षा करते हुए जितनी विनम्रता उससे हो सकती थी,
उसमें कोई कसर नहीं रक्खी। जब तक आदमी लौटकर न आया, वह बडी व्यग्रता से उसकी राह देखता रहा। कभी सोचता, कहीं
बहाना न कर दे, या घर पर मिले ही नहीं, या दो-चार दिन के बाद देने का वादा करे। सारा दारोमदार रतन के रूपये पर
था। अगर रतन ने साफ जवाब दे दिया, तो फिर सर्वनाश! उसकी
कल्पना से ही रमा के प्राण सूखे जा रहे थे। आख़िर नौ बजे आदमी लौटा। रतन ने दो सौ
रूपये तो दिए थे। मगर खत का कोई जवाब न दिया था। रमा ने निराश आंखों से आकाश की ओर
देखा। सोचने लगा, रतन ने ख़त का जवाब क्यों नहीं दिया-
मामूली शिष्टाचार भी नहीं जानती? कितनी मक्कार औरत है! रात
को ऐसा मालूम होता था कि साधुता और सज्जनता की प्रतिमा ही है, पर दिल में यह गुबार भरा हुआ था! शेष रूपयों की चिंता में रमा को
नहाने-खाने की भी सुध न रही। कहार अंदर गया, तो जालपा ने
पूछा, 'तुम्हें कुछ काम-धंधो की भी ख़बर है कि मटरगश्ती ही
करते रहोगे! दस बज रहे हैं, और अभी तक तरकारी-भाजी का कहीं
पता नहीं?'
कहार
ने त्योरियां बदलकर कहा, 'तो का चार हाथ-गोड़ कर लेई!
कामें से तो गवा रहिनब बाबू मेम साहब के तीर रूपैया लेबे का भेजिन रहा।'
जालपा-'कौन मेम साहब?'
कहार-' 'जौन मोटर पर चढ़कर आवत हैं।'
जालपा-'तो लाए रूपये?'
कहार
-'लाए काहे नाहींब पिरथी के छोर पर तो रहत हैं, दौरत-दौरत
गोड़ पिराय लाग।'
जालपा-'अच्छा चटपट जाकर तरकारी लाओ।'
कहार
तो उधर गया, रमा रूपये लिये हुए अंदर पहुंचा तो जालपा
ने कहा, 'तुमने अपने रूपये रतन के पास से मंगवा लिए न?
अब तो मुझसे न लोगे?'
रमा
ने उदासीन भाव से कहा, 'मत दो!'
जालपा-'मैंने कह दिया था रूपया दे दूंगी। तुम्हें इतनी जल्द मांगने की क्यों सूझी?
समझी होगी, इन्हें मेरा इतना विश्वास भी नहीं।'
रमा
ने हताश होकर कहा, 'मैंने रूपये नहीं मांगे थे।
केवल इतना लिख दिया था कि थैली में दो सौ रूपये ज्यादे हैं। उसने आप ही आप भेज
दिए।'
जालपा
ने हंसकर कहा, 'मेरे रूपये बडे भाग्यवान हैं, दिखाऊं? चुनचुनकर नए रूपये रक्खे हैं। सब इसी साल के
हैं, चमाचम! देखो तो आंखें ठंडी हो जाएं।
इतने
में किसी ने नीचे से आवाज़ दी, ' बाबूजी, सेठ ने रूपये के लिए भेजा है।'
दयानाथ
स्नान करने अंदर आ रहे थे, सेठ के प्यादे को देखकर पूछा,
'कौन सेठ, कैसे रूपये? मेरे
यहां किसी के रूपये नहीं आते!'
प्यादा-'छोटे बाबू ने कुछ माल लिया था। साल-भर हो गए, अभी तक
एक पैसा नहीं दिया। सेठजी ने कहा है, बात बिगड़ने पर रूपये
दिए तो क्या दिए। आज कुछ जरूर दिलवा दीजिए।'
दयानाथ
ने रमा को पुकारा और बोले, 'देखो, किस
सेठ का आदमी आया है। उसका कुछ हिसाब बाकी है, साफ क्यों नहीं
कर देते?कितना बाकी है इसका?'
रमा
कुछ जवाब न देने पाया था कि प्यादा बोल उठा, 'पूरे सात
सौ हैं, बाबूजी!'
दयानाथ
की आंखें फैलकर मस्तक तक पहुंच गई, 'सात सौ!
क्यों जी,यह तो सात सौ कहता है?'
रमा
ने टालने के इरादे से कहा, 'मुझे ठीक से मालूम नहीं।'
प्यादा-'मालूम क्यों नहीं। पुरजा तो मेरे पास है। तब से कुछ दिया ही नहीं,कम कहां से हो गए।'
रमा
ने प्यादे को पुकारकर कहा, 'चलो तुम दुकान पर, मैं ख़ुद आता हूं।'
प्यादा-'हम बिना कुछ लिए न जाएंगे, साहब! आप यों ही टाल दिया
करते हैं, और बातें हमको सुननी पड़ती हैं।'
रमा
सारी दुनिया के सामने जलील बन सकता था, किंतु पिता
के सामने जलील बनना उसके लिए मौत से कम न था। जिस आदमी ने अपने जीवन में कभी हराम
का एक पैसा न छुआ हो, जिसे किसी से उधार लेकर भोजन करने के
बदले भूखों सो रहना मंजूर हो, उसका लड़का इतना बेशर्म और
बेगैरत हो! रमा पिता की आत्मा का यह घोर अपमान न कर सकता था। वह उन पर यह बात
प्रकट न होने देना चाहता था कि उनका पुत्र उनके नाम को बट्टा लगा रहा है। कर्कश
स्वर में प्यादे से बोला, 'तुम अभी यहीं खड़े हो? हट जाओ, नहीं तो धक्का देकर निकाल दिए जाओगे।'
प्यादा-'हमारे रूपये दिलवाइए, हम चले जायं। हमें क्या आपके
द्वार पर मिठाई मिलती है! '
रमानाथ-'तुम न जाओगे! जाओ लाला से कह देना नालिश कर दें।'
दयानाथ
ने डांटकर कहा, 'क्या बेशर्मी की बातें करते हो जी,
जब फिरह में रूपये न थे, तो चीज़ लाए ही क्यों?
और लाए, तो जैसे बने वैसे रूपये अदा करो। कह
दिया, नालिश कर दो। नालिश कर देगा, तो
कितनी आबरू रह जायगी? इसका भी कुछ ख़याल है! सारे शहर में
उंगलियां उठेंगी, मगर तुम्हें इसकी क्या परवा। तुमको यह सूझी
क्या कि एकबारगी इतनी बडी गठरी सिर पर लाद ली। कोई शादी-ब्याह का अवसर होता,
तो एक बात भी थी। और वह औरत कैसी है जो पति को ऐसी बेहूदगी करते
देखती है और मना नहीं करती। आख़िर तुमने क्या सोचकर यह कर्ज लिया? तुम्हारी ऐसी कुछ बडी आमदनी तो नहीं है!'
रमा
को पिता की यह डांट बहुत बुरी लग रही थी। उसके विचार में पिता को इस विषय में कुछ
बोलने का अधिकार ही न था। निसंकोच होकर बोला, 'आप नाहक
इतना बिगड़ रहे हैं, आपसे रूपये मांगने जाऊं तो कहिएगा। मैं
अपने वेतन से थोडा-थोडा करके सब चुका दूंगा।'
अपने
मन में उसने कहा, 'यह तो आप ही की करनी का फल
है। आप ही के पाप का प्रायश्चित्ता कर रहा हूं।'
प्यादे
ने पिता और पुत्र में वाद-विवाद होते देखा, तो चुपके से
अपनी राह ली। मुंशीजी भुनभुनाते हुए स्नान करने चले गए। रमा ऊपर गया, तो उसके मुंह पर लज्जा और ग्लानि की फटकार बरस रही थी। जिस अपमान से बचने
के लिए वह डाल-डाल, पात-पात भागता-फिरता था, वह हो ही गया। इस अपमान के सामने सरकारी रूपयों की फिक्र भी ग़ायब हो गई।
कर्ज़ लेने वाले बला के हिम्मती होते हैं। साधारण बुद्धिका मनुष्य ऐसी
परिस्थितियों में पड़कर घबरा उठता है, पर बैठकबाजों के माथे
पर बल तक नहीं पड़ता। रमा अभी इस कला में दक्ष नहीं हुआ था। इस समय यदि यमदूत उसके
प्राण हरने आता, तो वह आंखों से दौड़कर उसका स्वागत करता।
कैसे क्या होगा, यह शब्द उसके एक-एक रोम से निकल रहा था।
कैसे क्या होगा! इससे अधिक वह इस समस्या की और व्याख्या न कर सकता था। यही प्रश्न
एक सर्वव्यापी पिशाच की भांति उसे घूरता दिखाई देता था। कैसे क्या होगा! यही शब्द
अगणित बगूलों की भांति चारों ओर उठते नज़र आते थे। वह इस पर विचार न कर सकता था।
केवल उसकी ओर से आंखें बंद कर सकता था। उसका चित्त इतना खिन्न हुआ कि आंखें सजल हो
गई।
जालपा
ने पूछा,
'तुमने तो कहा था, इसके अब थोड़े ही रूपये
बाकी हैं।'
रमा
ने सिर झुकाकर कहा, 'यह दुष्ट झूठ बोल रहा था,
मैंने कुछ रूपये दिए हैं।'
जालपा-'दिए होते, तो कोई रूपयों का तकषज़ा क्यों करता?
जब तुम्हारी आमदनी इतनी कम थी तो गहने लिए ही क्यों? मैंने तो कभी ज़िद न की थी। और मान लो, मैं दो-चार
बार कहती भी, तुम्हें समझ-बूझकर काम करना चाहिए था। अपने साथ
मुझे भी चार बातें सुनवा दीं। आदमी सारी दुनिया से परदा रखता है, लेकिन अपनी स्त्री से परदा नहीं रखता। तुम मुझसे भी परदा रखते हो अगर मैं
जानती, तुम्हारी आमदनी इतनी थोड़ी है, तो
मुझे क्या ऐसा शौक चर्राया था कि मुहल्ले-भर की स्त्रियों को तांगे पर बैठा-बैठाकर
सैर कराने ले जाती। अधिक-से-अधिक यही तो होता, कि कभी-कभी
चित्त दुखी हो जाता, पर यह तकाज़े तो न सहने पड़ते। कहीं
नालिश कर दे, तो सात सौ के एक हज़ार हो जाएं। मैं क्या जानती
थी कि तुम मुझ से यह छल कर रहे हो कोई वेश्या तो थी नहीं कि तुम्हें नोच-खसोटकर अपना
घर भरना मेरा काम होता। मैं तो भले- बुरे दोनों ही की साथिन हूं। भले में तुम चाहे
मेरी बात मत पूछो, बुरे में तो मैं तुम्हारे गले पड़ूंगी ही।'
रमा
के मुख से एक शब्द न निकला, दफ्तर का समय आ गया था। भोजन
करने का अवकाश न था। रमा ने कपड़े पहने, और दफ्तर चला।
जागेश्वरी ने कहा, 'क्या बिना भोजन किए चले जाओगे?'
रमा
ने कोई जवाब न दिया, और घर से निकलना ही चाहता था
कि जालपा झपटकर नीचे आई और उसे पुकारकर बोली, 'मेरे पास जो
दो सौ रूपये हैं, उन्हें क्यों नहीं सर्राफ को दे देते?'
रमा
ने चलते वक्त ज़ान-बूझकर जालपा से रूपये न मांगे थे। वह जानता था, जालपा मांगते ही दे देगी, लेकिन इतनी बातें सुनने के
बाद अब रूपये के लिए उसके सामने हाथ व्लाते उसे संकोच ही नहीं, भय होता था। कहीं वह फिर न उपदेश देने बैठ जाए,इसकी
अपेक्षा आने वाली विपत्तियां कहीं हल्की थीं। मगर जालपा ने उसे पुकारा, तो कुछ आशा बंधीब ठिठक गया और बोला, 'अच्छी बात है,
लाओ दे दो।'
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