गबन: अध्याय-4.2
देवीदीन
ने सड़क की ओर ताकते हुए कहा, 'भैया अब नहीं आवेंगे। जब
अपने ही अपने न हुए तो बेगाने तो बेगाने हैं ही!' वह चला
गया। बुढिया भी पीछे-पीछे भुनभुनाती चली।
पैंतीस
रूदन
में कितना उल्लास, कितनी शांति, कितना बल है। जो कभी एकांत में बैठकर, किसी की
स्मृति में, किसी के वियोग में, सिसक-सिसक
और बिलखबिलख नहीं रोया, वह जीवन के ऐसे सुख से वंचित है,
जिस पर सैकड़ों हंसियां न्योछावर हैं। उस मीठी वेदना का आनंद उन्हीं
से पूछो,जिन्होंने यह सौभाग्य प्राप्त किया है। हंसी के बाद
मन खिकै हो जाता है, आत्मा क्षुब्धा हो जाती है, मानो हम थक गए हों, पराभूत हो गए हों। रूदन के
पश्चात एक नवीन स्फूर्ति,
एक
नवीन जीवन, एक नवीन उत्साह का अनुभव होता है। जालपा
के पास 'प्रजा-मित्र' कार्यालय का पत्र
पहुंचा, तो उसे पढ़कर वह रो पड़ी। पत्र एक हाथ में लिये,
दूसरे हाथ से चौखट पकड़े, वह खूब रोई।क्या
सोचकर रोई, वह कौन कह सकता है। कदाचित अपने उपाय की इस आशातीत
सफलता ने उसकी आत्मा को विह्नल कर दिया, आनंद की उस गहराई पर
पहुंचा दिया जहां पानी है, या उस ऊंचाई पर जहां उष्णता हिम
बन जाती है। आज छः महीने के बाद यह सुख-संवाद मिला। इतने दिनों वह छलमयी आशा और
कठोर दुराशा का खिलौना बनी रही। आह! कितनी बार उसके मन में तरंग उठी कि इस जीवन का
क्यों न अंत कर दूं! कहीं मैंने सचमुच प्राण त्याग दिए होते तो उनके दर्शन भी न
पाती! पर उनका हिया कितना कठोर है। छः महीने से वहां बैठे हैं, एक पत्र भी न लिखा, ख़बर तक नहीं ली। आख़िर यही न
समझ लिया होगा कि बहुत होगा रो-रोकर मर जायगी। उन्होंने मेरी परवाह ही कब की!
दस-बीस रूपये तो आदमी यार-दोस्तों पर भी ख़र्च कर देता है। वह प्रेम नहीं है।
प्रेम ह्रदय की वस्तु है, रूपये की नहीं। जब तक रमा का कुछ
पता न था, जालपा सारा इलज़ाम अपने सिर रखती थी,, पर आज उनका पता पाते ही उसका मन अकस्मात कठोर हो गया। तरह-तरह के शिकवे
पैदा होने लगे। वहां क्या समझकर बैठे हैं?इसीलिए तो कि वह
स्वाधीन हैं, आज़ाद हैं,किसी का दिया
नहीं खाते।
इसी
तरह मैं कहीं बिना कहे-सुने चली जाती, तो वह मेरे
साथ किस तरह पेश आते?शायद तलवार लेकर गर्दन पर सवार हो जाते
या जिंदगी-भर मुंह न देखते। वहीं खड़े-खड़े जालपा ने मन-ही-मन शिकायतों का दफ्तर
खोल दिया।
सहसा
रमेश बाबू ने द्वार पर पुकारा, 'गोपी, गोपी, ज़रा इधर आना।'
मुंशीजी
ने अपने कमरे में पड़े-पड़े कराहकर कहा, 'कौन है भाई,
कमरे में आ जाओ। अरे! आप हैं रमेश बाबू! बाबूजी, मैं तो मरकर जिया हूं। बस यही समझिए कि नई ज़िंदगी हुई। कोई आशा न थी। कोई
आगे न कोई पीछे, दोनों लौंडे आवारा हैं, मैं मईं या जीऊं, उनसे मतलब नहीं। उनकी मां को मेरी
सूरत देखते डर लगता है। बस बेचारी बहू ने मेरी जान बचाईब वह न होती तो अब तक चल
बसा होता।'
रमेश
बाबू ने कृत्रिम संवेदना दिखाते हुए कहा, 'आप इतने
बीमार हो गए और मुझे ख़बर तक न हुई। मेरे यहां रहते आपको इतना कष्ट हुआ! बहू ने भी
मुझे एक पुर्ज़ा न लिख दिया। छुट्टी लेनी पड़ी होगी?'
मुंशी-'छुट्टी के लिए दरख्वास्त तो भेज दी थी, मगर साहब
मैंने डाक्टरी सर्टिफिकेट नहीं भेजी। सोलह रूपये किसके घर से लाता। एक दिन सिविल
सर्जन के पास गया, मगर उन्होंने चिट्ठी लिखने से इनकार किया।
आप तो जानते हैं वह बिना फीस लिये बात नहीं करते। मैं चला आया और दरख्वास्त भेज
दी। मालूम नहीं मंजूर हुई या नहीं। यह तो डाक्टरों का हाल है। देख रहे हैं
कि
आदमी मर रहा है, पर बिना भेंट लिये कदम न उठावेंगे! '
रमेश
बाबू ने चिंतित होकर कहा, 'यह तो आपने बुरी ख़बर सुनाई,
मगर आपकी छुट्टी नामंजूर हुई तो क्या होगा?'
मुंशीजी
ने माथा ठोंकर कहा,'होगा क्या, घर बैठ रहूंगा। साहब पूछेंगे तो साफ कह दूंगा, मैं
सर्जन के पास गया था, उसने छुट्टी नहीं दी। आख़िर इन्हें
क्यों सरकार ने नौकर रक्खा है। महज़ कुर्सी की शोभा बढ़ाने के लिए? मुझे डिसमिस हो जाना मंज़ूर है, पर सर्टिगिष्धट न
दूंगा। लौंडे ग़ायब हैं। आपके लिए पान तक लाने वाला कोई नहीं। क्या करूं?'
रमेश
ने मुस्कराकर कहा, 'मेरे लिए आप तरददुद न करें।
मैं आज पान खाने नहीं, भरपेट मिठाई खाने आया हूं। (जालपा को
पुकारकर) बहूजी,तुम्हारे लिए ख़ुशख़बरी लाया हूं। मिठाई
मंगवा लो।'
जालपा
ने पान की तश्तरी उनके सामने रखकर कहा, 'पहले वह
ख़बर सुनाइए। शायद आप जिस ख़बर को नई-नई समझ रहे हों, वह
पुरानी हो गई हो'
रमेश-'जी कहीं हो न! रमानाथ का पता चल गया। कलकत्ता में हैं।'
जालपा-'मुझे पहले ही मालूम हो चुका है।'
मुंशीजी
झपटकर उठ बैठे। उनका ज्वर मानो भागकर उत्सुकता की आड़ में जा छिपा, रमेश का हाथ पकड़कर बोले, 'मालूम हो गया कलकत्ता में
हैं?कोई ख़त आया था?'
रमेश-'खत नहीं था, एक पुलिस इंक्वायरी थी। मैंने कह दिया,
उन पर किसी तरह का इलज़ाम नहीं है। तुम्हें कैसे मालूम हुआ, बहूजी?'
जालपा
ने अपनी स्कीम बयान की। 'प्रजा-मित्र' कार्यालय का पत्र भी दिखाया। पत्र के साथ रूपयों की एक रसीद थी जिस पर रमा
का हस्ताक्षर था।
रमेश-'दस्तख़त तो रमा बाबू का है, बिलकुल साफ धोखा हो ही
नहीं सकता मान गया बहूजी तुम्हें! वाह, क्या हिकमत निकाली
है! हम सबके कान काट लिए। किसी को न सूझी। अब जो सोचते हैं, तो
मालूम होता है, कितनी आसान बात थी। किसी को जाना चाहिए जो
बचा को पकड़कर घसीट लाए। यह बातचीत हो रही थी कि रतन आ पहुंची। जालपा उसे देखते ही
वहां
से
निकली और उसके गले से लिपटकर बोली, 'बहन
कलकत्ता से पत्र आ गया। वहीं हैं।'रतन-'मेरे सिर की कसम?'
जालपा-'हां, सच कहती हूं। ख़त देखो न!'
रतन-'तो आज ही चली जाओ।'
जालपा-'यही तो मैं भी सोच रही हूं। तुम चलोगी?'
रतन-'चलने को तो मैं तैयार हूं, लेकिन अकेला घर किस पर
छोड़ूं! बहन, मुझे मणिभूषण पर कुछ शुबहा होने लगा है। उसकी
नीयत अच्छी नहीं मालूम होती। बैंक में बीस हज़ार रूपये से कम न थे। सब न जाने कहां
उडादिए। कहता है, क्रिया-कर्म में ख़र्च हो गए। हिसाब मांगती
हूं, तो आंखें दिखाता है। दफ्तर की कुंजी अपने पास रखे हुए
है। मांगती हूं, तो टाल जाता है। मेरे साथ कोई कानूनी चाल चल
रहा है। डरती हूं, मैं उधार जाऊं,इधर
वह सब कुछ ले-देकर चलता बने। बंगले के गाहक आ रहे हैं। मैं भी सोचती हूं, गांव में जाकर शांति से पड़ी रहूं। बंगला बिक जायगा, तो नकद रूपये हाथ आ जाएंगे। मैं न रहूंगी,तो शायद ये
रूपये मुझे देखने को भी न मिलें। गोपी को साथ लेकर आज ही चली जाओ। रूपये का इंतजाम
मैं कर दूंगी।'
जालपा-'गोपीनाथ तो शायद न जा सकें, दादा की दवा-दारू के लिए
भी तो कोई चाहिए।
रतन-'वह मैं कर दूंगी। मैं रोज़ सबेरे आ जाऊंगी और दवा देकर चली जाऊंगी। शाम को
भी एक बार आ जाया करूंगी। '
जालपा
ने मुस्कराकर कहा, 'और दिन?भर उनके पास बैठा कौन रहेगा।'
रतन-'मैं थोड़ी देर बैठी भी रहा करूंगी, मगर तुम आज ही
जाओ। बेचारे वहां न जाने किस दशा में होंगे। तो यही तय रही न? '
रतन
मुंशीजी के कमरे में गई, तो रमेश बाबू उठकर खड़े हो गए
और बोले, 'आइए देवीजी, रमा बाबू का पता
चल गया! '
रतन-'इसमें आधा श्रेय मेरा है।'
रमेश-'आपकी सलाह से तो हुआ ही होगा। अब उन्हें यहां लाने की फिक्र करनी है।'
रतन-'जालपा चली जाएं और पकड़ लाएं। गोपी को साथ लेती जावें, आपको इसमें कोई आपत्ति तो नहीं है, दादाजी?'
मुंशीजी
को आपत्ति तो थी, उनका बस चलता तो इस अवसर पर
दसपांच आदमियों को और जमा कर लेते, फिर घर के आदमियों के चले
जाने पर क्यों आपत्ति न होती, मगर समस्या ऐसी आ पड़ी थी कि
कुछ बोल न सके। गोपी कलकत्ता की सैर का ऐसा अच्छा अवसर पाकर क्यों न ख़ुश होता।
विशम्भर दिल में ऐंठकर रह गया। विधाता ने उसे छोटा न बनाया होता, तो आज
उसकी
यह हकतलफी न होती। गोपी ऐसे कहां के बडे होशियार हैं, जहां जाते हैं कोई-न-कोई चीज़ खो आते हैं। हां, मुझसे
बडे हैं। इस दैवी विधान ने उसे मजबूर कर दिया।
रात
को नौ बजे जालपा चलने को तैयार हुई। सास-ससुर के चरणों पर सिर झुकाकर आशीर्वाद
लिया,
विशम्भर रो रहा था, उसे गले लगा कर प्यार किया
और मोटर पर बैठी। रतन स्टेशन तक पहुंचाने के लिए आई थी। मोटर चली तो जालपा ने कहा,
'बहन, कलकत्ता तो बहुत बडा शहर होगा। वहां कैसे
पता चलेगा?'
रतन-'पहले 'प्रजा-मित्र' के
कार्यालय में जाना। वहां से पता चल जाएगा। गोपी बाबू तो हैं ही।'
जालपा-'ठहरूंगी कहां? '
रतन-'कई धर्मशाले हैं। नहीं होटल में ठहर जाना। देखो रूपये की जरूरत पड़े,
तो मुझे तार देना। कोई-न कोई इंतज़ाम करके भेजूंगी। बाबूजी आ जाएं,तो मेरा बडा उपकार हो यह मणिभूषण मुझे तबाह कर देगा।'
जालपा-'होटल वाले बदमाश तो न होंगे? '
रतन-'कोई ज़रा भी शरारत करे, तो ठोकर मारना। बस, कुछ पूछना मत, ठोकर जमाकर तब बात करना। (कमर से एक
छुरी निकालकर) इसे अपने पास रख लो। कमर में छिपाए रखना। मैं जब कभी बाहर निकलती
हूं, तो इसे अपने पास रख लेती हूं। इससे दिल बडा मज़बूत रहता
है। जो मर्द किसी स्त्री को छेड़ता है, उसे समझ लो कि पल्ले
सिरे का कायर, नीच और लंपट है। तुम्हारी छुरी की चमक और
तुम्हारे तेवर देखकर ही उसकी ईह गष्ना हो जायगी। सीधा दुम दबाकर भागेगा, लेकिन अगर ऐसा मौका आ ही पड़े जब तुम्हें छुरी से काम लेने के लिए मजबूर
हो जाना पड़े, तो ज़रा भी मत झिझकना। छुरी लेकर पिल पड़ना।
इसकी बिलकुल फिक्र मत करना कि क्या होगा, क्या न होगा। जो
कुछ होना होगा, हो जायगा। '
जालपा
ने छुरी ले ली, पर कुछ बोली नहीं। उसका दिल भारी हो रहा
था। इतनी बातें सोचने और पूछने की थीं कि उनके विचार से ही उसका दिल बैठा जाता था।
स्टेशन
आ गया। द्दलियों ने असबाब उतारा, गोपी टिकट लाया। जालपा
पत्थर की मूर्ति की भांति प्लेटफार्म पर खड़ी रही, मानो
चेतना शून्य हो गई हो किसी बडी परीक्षा के पहले हम मौन हो जाते हैं। हमारी सारी
शक्तियां उस संग्राम की तैयारी में लग जाती हैं। रतन ने गोपी से कहा, 'होशियार रहना।'
गोपी
इधर कई महीनों से कसरत करता था। चलता तो मुडढे और छाती को देखा करता। देखने वालों
को तो वह ज्यों का त्यों मालूम होता है, पर अपनी
नज़र में वह कुछ और हो गया था। शायद उसे आश्चर्य होता था कि उसे आते देखकर क्यों
लोग रास्ते से नहीं हट जाते, क्यों उसके डील-डौल से भयभीत
नहीं हो जाते। अकड़कर बोला, 'किसी ने ज़रा चीं-चपड़ की तो
तोड़ दूंगा।'
रतन
मुस्कराई,
'यह तो मुझे मालूम है। सो मत जाना।'
गोपी, 'पलक तक तो झपकेगी नहीं। मजाल है नींद आ जाय।'
गाड़ी
आ गई। गोपी ने एक डिब्बे में घुसकर कब्जा जमाया। जालपा की आंखों में आंसू भरे हुए
थे। बोली,
बहन, 'आशीर्वाद दो कि उन्हें लेकर कुशल से लौट
आऊं।'
इस
समय उसका दुर्बल मन कोई आश्रय, कोई सहारा, कोई बल ढूंढ रहा था और आशीर्वाद और प्रार्थना के सिवा वह बल उसे कौन
प्रदान करता। यही बल और शांति का वह अक्षय भंडार है जो किसी को निराश नहीं करता,
जो सबकी बांह पकड़ता है, सबका बेडापार लगाता
है। इंजन ने सीटी दी। दोनों सहेलियां गले मिलीं। जालपा गाड़ी में जा बैठी।
रतन
ने कहा,
'जाते ही जाते ख़त भेजना।' जालपा ने सिर
हिलाया।
'अगर मेरी जरूरत मालूम हो, तो तुरंत लिखना। मैं सब
कुछ छोड़कर चली आऊंगी।'
जालपा
ने सिर हिला दिया।
'रास्ते में रोना मत।' जालपा हंस पड़ी। गाड़ी चल दी।
छत्तीस
देवीदीन
ने चाय की दूकान उसी दिन से बंद कर दी थी और दिन-भर उस अदालत की खाक छानता फिरता
था जिसमें डकैती का मुकदमा पेश था और रमानाथ की शहादत हो रही थी। तीन दिन रमा की
शहादात बराबर होती रही और तीनों दिन देवीदीन ने न कुछ खाया और न सोया। आज भी उसने
घर आते ही आते कुरता उतार दिया और एक पंखिया लेकर झलने लगा। फागुन लग गया था और
कुछ-कुछ गर्मी शुरू हो गई थी, पर इतनी गर्मी न थी कि
पसीना बहे या पंखे की जरूरत हो अफसर लोग तो जाड़ों के कपड़े पहने हुए थे, लेकिन देवीदीन पसीने में तर था। उसका चेहरा, जिस पर
निष्कपट बुढ़ापा हंसता रहता था, खिसियाया हुआ था, मानो बेगार से लौटा हो जग्गो ने लोटे में पानी लाकर रख दिया और बोली,चिलम रख दूं? देवीदीन की आज तीन दिन से यह ख़ातिर हो
रही थी। इसके पहले बुढिया कभी चिलम रखने को न पूछती थी। देवीदीन इसका मतलब समझता
था। बुढिया को सदय नजरों से देखकर बोला,नहीं, रहने दो, चिलम न पिऊंगा।
'तो मुंह-हाथ तो धो लो। गर्द पड़ी हुई है।'
'धो लूंगा, जल्दी क्या है।'
बुढिया
आज का हाल जानने को उत्सुक थी, पर डर रही थी कहीं
देवीदीन झुंझला न पड़े। वह उसकी थकान मिटा देना चाहती थी, जिससे
देवीदीन प्रसन्न होकर आप-ही-आप सारा वृत्तांत कह चले।
'तो कुछ जलपान तो कर लो। दोपहर को भी तो कुछ नहीं खाया था,
मिठाई
लाऊं- लाओ, पंखी मुझे दे दो।'
देवीदीन
ने पंखिया दे दी। बुढिया झलने लगी। दो-तीन मिनट तक आंखें बंद करके बैठे रहने के
बाद देवीदीन ने कहा, 'आज भैया की गवाही खत्म हो
गई!
बुढिया
का हाथ रूक गया। बोली, 'तो कल से वह घर आ जाएंगे?'
देवीदीन-'अभी नहीं छुट्टी मिली जाती, यही बयान दीवानी में
देना पड़ेगा। और अब वह यहां आने ही क्यों लगे! कोई अच्छी जगह मिल जायगी,घोड़े पर चढ़े-चढ़े घूमेंगे, मगर है ।डा पक्का
मतलबीब पंद्रह बेगुनाहों को फंसा दिया। पांच-छः को तो फांसी हो जाएगी। औरों को
दस-दस बारह-बारह साल की सज़ा मिली रक्खी है। इसी के बयान से मुकदमा सबूत हो गया।
कोई कितनी ही जिरह करे, क्या मजाल ज़रा भी हिचकिचाए। अब एक
भी न बचेगा। किसने कर्म किया, किसने नहीं किया इसका हाल दैव
जाने, पर मारे सब जाएंगे। घर से भी तो सरकारी रूपया खाकर
भागा था। हमें बडा धोखा हुआ। जग्गो ने मीठे तिरस्कार से देखकर कहा, 'अपनी नेकी-बदी अपने साथ है। मतलबी तो संसार है, कौन
किसके लिए मरता है।'
देवीदीन
ने तीव्र स्वर में कहा,'अपने मतलब के लिए जो दूसरों
का गला काटे उसको ज़हर दे देना भी पाप नहीं है।'
सहसा
दो प्राणी आकर खड़े हो गए। एक गोरा, खूबसूरत
लड़का था, जिसकी उम्र पंद्रह-सोलह साल से ज्यादा न थी। दूसरा
अधेड़ था और सूरत से चपरासी मालूम होता था। देवीदीन ने पूछा, 'किसे खोजते हो?'
चपरासी
ने कहा,'तुम्हारा ही नाम देवीदीन है न? मैं 'प्रजा-मित्र' के दफ्तर से आया हूं। यह बाबू उन्हीं
रमानाथ के भाई हैं जिन्हें सतरंज का इनाम मिला था। यह उन्हीं की खोज में दफ्तर गए
थे। संपादकजी ने तुम्हारे पास भेज दिया। तो मैं जाऊं न?' यह
कहता हुआ वह चला गया। देवीदीन ने गोपी को सिर से पांव तक देखा। आकृति रमा से मिलती
थी। बोला, 'आओ बेटा, बैठो। कब आए घर से?'गोपी ने एक खटिक की दूकान पर बैठना शान के ख़िलाफ समझा, खडा-खडा बोला, 'आज ही तो आया हूं। भाभी भी साथ हैं।
धर्मशाले में ठहरा हुआ हूं।'
देवीदीन
ने खड़े होकर कहा, 'तो जाकर बहू को यहां लाओ नब
ऊपर तो रमा बाबू का कमरा है ही, आराम से रहो धरमसाले में
क्यों पड़े रहोगे। नहीं चलो, मैं भी चलता हूं। यहां सब तरह
का आराम है।'
उसने
जग्गो को यह ख़बर सुनाई और ऊपर झाडू लगाने को कहकर गोपी के साथ धर्मशाले चल दिया।
बुढिया ने तुरंत ऊपर जाकर झाडू। लगाया,लपककर हलवाई
की दूकान से मिठाई और दही लाई, सुराही में पानी भरकर रख
दिया। फिर अपना हाथ-मुंह धोया, एक रंगीन साड़ी निकाली,
गहने पहने और बन-ठनकर बहू की राह देखने लगी।
इतने
में फिटन भी आ पहुंची। बुढिया ने जाकर जालपा को उतारा। जालपा पहले तो साफ-भाजी की
दूकान देखकर कुछ झिझकी, पर बुढिया का स्नेह-स्वागत
देखकर उसकी झिझक दूर हो गई। उसके साथ ऊपर गई, तो हर एक चीज़
इसी तरह अपनी जगह पर पाई मानो अपना ही घर हो
जग्गो
ने लोटे में पानी रखकर कहा, 'इसी घर में भैया रहते थे,
बेटी! आज पंद्रह रोज़ से घर सूना पडाहुआ है। हाथ-मुंह धोकर दही-चीनी
खा लो न,बेटी! भैया का हाल तो अभी तुम्हें न मालूम हुआ होगा।
'
जालपा
ने सिर हिलाकर कहा, 'कुछ ठीक-ठीक नहीं मालूम हुआ।
वह जो पत्र छपता है, वहां मालूम हुआ था कि पुलिस ने गिरफ्तार
कर लिया है।'
देवीदीन
भी ऊपर आ गया था। बोला, 'गिरफ्तार तो किया था,
पर अब तो वह एक मुकदमे में सरकारी गवाह हो गए हैं। परागराज में अब
उन पर कोई मुकदमा न चलेगा और साइत नौकरी-चाकरी भी मिल जाए। जालपा ने गर्व से कहा,
'क्या इसी डर से वह सरकारी गवाह हो गए हैं?
वहां
तो उन पर कोई मामला ही नहीं है। मुकदमा क्यों चलेगा?'
देवीदीन
ने डरते-डरते कहा, 'कुछ रूपये-पैसे का मुआमला था
न?'
जालपा
ने मानो आहत होकर कहा, 'वह कोई बात न थी। ज्योंही हम
लोगों को मालूम हुआ कि कुछ सरकारी रकम इनसे खर्च हो गई है, उसी
वक्त पहुंचा दी। यह व्यर्थ घबडाकर चले आए और फिर ऐसी चुप्पी साधी कि अपनी ख़बर तक
न दी।'
देवीदीन
का चेहरा जगमगा उठा, मानो किसी व्यथा से आराम मिल
गया हो बोला, 'तो यह हम लोगों को क्या मालूम! बार-बार समझाया
कि घर पर खत-पत्तर भेज दो, लोग घबडाते होंगे, पर मारे शर्म के लिखते ही न थे। इसी धोखे में पड़े रहे कि परागराज में
मुकदमा चल गया होगा। जानते तो सरकारी गवाह क्यों बनते?'
'सरकारी गवाह' का आशय जालपा से छिपा न था। समाज में
उनकी जो निंदा और अपकीर्ति होती है, यह भी उससे छिपी न थी।
सरकारी गवाह क्यों बनाए जाते हैं, किस तरह प्रलोभन दिया जाता
है, किस भांति वह पुलिस के पुतले बनकर अपने ही मित्रों का
गला घोंटते हैं, यह उसे मालूम था। मगर कोई आदमी अपने बुरे
आचरण पर लज्जित होकर भी सत्य का उदघाटन करे, छल और कपट का
आवरण हटा दे, तो वह सज्जन है, उसके
साहस की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। मगर शर्त यही है कि वह
अपनी गोष्ठी के साथ किए का फल भोगने को तैयार रहे। हंसता-खेलता फांसी पर चढ़जाए तो
वह सच्चा वीर है, लेकिन अपने प्राणों की रक्षा के लिए
स्वार्थ के नीच विचार से, दंड की कठोरता से भयभीत होकर अपने
साथियों से दगा करे, आस्तीन का सांप बन जाए तो वह कायर है,
पतित है, बेहया है। विश्वासघात डाकुओं और समाज
के शत्रुओं में भी उतना ही हेय है जितना किसी अन्य क्षो मेंब ऐसे प्राणी को समाज
कभी क्षमा नहीं करता, कभी नहीं,जालपा
इसे ख़ूब समझती थी। यहां तो समस्या और भी जटिल हो गई थी। रमा ने दंड के भय से अपने
किए हुए पापों का परदा नहीं खोला था। उसमें कम-से-कम सच्चाई तो होती। निंदा होने
पर भी आंशिक सच्चाई का एक गुण तो होता। यहां तो उन पापों का परदा खोला गया था,
जिनकी हवा तक उसे न लगी थी। जालपा को सहसा इसका विश्वास न आया।
अवश्य कोई-न?कोई बात हुई होगी, जिसने
रमा को सरकारी गवाह बनने पर मज़बूर कर दिया होगा। सद्दचाती हुई बोली,'क्या यहां भी कोई---कोई बात हो गई थी?'
देवीदीन
उसकी मनोव्यथा का अनुभव करता हुआ बोला, 'कोई बात
नहीं। यहां वह मेरे साथ ही परागराज से आए। जब से आए यहां से कहीं गए नहीं। बाहर
निकलते ही न थे। बस एक दिन निकले और उसी दिन पुलिस ने पकड़ लिया। एक सिपाही को आते
देखकर डरे कि मुझी को पकड़ने आ रहा है, भाग खड़े हुए। उस
सिपाही को खटका हुआ। उसने शुबहे में गिरफ्तार कर लिया। मैं भी इनके पीछे थाने में
पहुंचा। दारोग़ा पहले तो रिसवत मांगते थे, मगर जब मैं घर से
रूपये लेकर गया, तो वहां और ही गुल खिल चुका था। अफसरों में
न जाने क्या बातचीत हुई। उन्हें सरकारी गवाह बना लिया। मुझसे तो भैया ने कहा कि इस
मुआमले में बिलकुल झूठ न बोलना पड़ेगा। पुलिस का मुकदमा सच्चा है। सच्ची बात कह
देने में क्या हरज है। मैं चुप हो रहा। क्या करता।'
जग्गो-'न जाने सबों ने कौनसी बूटी सुंघा दी। भैया तो ऐसे न थे। दिन भर
अम्मां-अम्मां करते रहते थे। दूकान पर सभी तरह के लोग आते हैं,मर्द भी औरत भी, क्या मजाल कि किसी की ओर आंख उठाकर
देखा हो ।'
देवीदीन-'कोई बुराई न थी। मैंने तो ऐसा लड़का ही नहीं देखा। उसी धोखे में आ गए।'
जालपा
ने एक मिनट सोचने के बाद कहा, 'क्या उनका बयान हो गया?'
'हां, तीन दिन बराबर होता रहा। आज खतम हो गया।'
जालपा
ने उद्विग्न होकर कहा, 'तो अब कुछ नहीं हो सकता?
मैं उनसे मिल सकती हूं?'
देवीदीन
जालपा के इस प्रश्न पर मुस्करा पड़ा। बोला, 'हां,
और क्या, जिसमें जाकर भंडागोड़ कर दो, सारा खेल बिगाड़ दो! पुलिस ऐसी गधी नहीं है। आजकल कोई भी उनसे नहीं मिलने
पाता। कडा पहरा रहता है।'
इस
प्रश्न पर इस समय और कोई बातचीत न हो सकती थी। इस गुत्थी को सुलझाना आसान न था।
जालपा ने गोपी को बुलाया। वह छज्जे पर खडा सड़क का तमाशा देख रहा था। ऐसा शरमा रहा
था,
मानो ससुराल आया हो धीरे-धीरे आकर खडा हो गया। जालपा ने कहा,
'मुंह-हाथ धोकर कुछ खा तो लो। दही तो तुम्हें बहुत अच्छा लगता है।'गोपी लजा कर फिर बाहर चला गया।
देवीदीन
ने मुस्कराकर कहा, 'हमारे सामने न खाएंगे। हम
दोनों चले जाते हैं। तुम्हें जिस चीज़ की जरूरत हो, हमसे कह
देना, बहूजी! तुम्हारा ही घर है।'
'भैया को तो हम अपना ही समझते थे। और हमारे कौन बैठा हुआ है।'जग्गो ने गर्व से कहा, 'वह तो मेरे हाथ का बनाया खा
लेते थे।'
जालपा
ने मुस्कराकर कहा, 'अब तुम्हें भोजन न बनाना
पड़ेगा, मांजी, मैं बना दिया करूंगी।'
जग्गो
ने आपत्ति की, 'हमारी बिरादरी में दूसरों के हाथ का खाना
मना है, बहू, अब चार दिन के लिए
बिरादरी में नक्य क्या बनूं!'
जालपा-'हमारी बिरादरी में भी तो दूसरों का खाना मना है।'
जग्गो-'यहां तुम्हें कौन देखने आता है। फिर पढ़े-लिखे आदमी इन बातों का विचार भी
तो नहीं करते। हमारी बिरादरी तो मूरख लोगों की है। '
जालपा-'यह तो अच्छा नहीं लगता कि तुम बनाओ और मैं खाऊं। जिसे बहू बनाया, उसके हाथ का खाना पड़ेगा। नहीं खाना था, तो बहू
क्यों बनाया।'
देवीदीन
ने जग्गो की ओर प्रशंसा-सूचक नजरों से देखकर कहा, 'बहू
ने बात पते की कह दी। इसका जवाब सोचकर देना। अभी चलो। इन लोगों को ज़रा आराम करने
दो।'
दोनों
नीचे चले गए, तो गोपी ने आकर कहा, 'भैया इसी खटिक के यहां रहते थे क्या? खटिक ही तो
मालूम होते हैं।'
जालपा
ने फटकारकर कहा, 'खटिक हों या चमार हों, लेकिन हमसे और तुमसे सौगुने अच्छे हैं। एक परदेशी आदमी को छः महीने तक
अपने घर में ठहराया, खिलाया, पिलाया।
हममें है इतनी हिम्मत! यहां तो कोई मेहमान आ जाता है, तो वह
भी भारी हो जाता है। अगर यह नीचे हैं, तो हम इनसे कहीं नीचे
हैं।'
गोपी
मुंह-हाथ धो चुका था। मिठाई खाता हुआ बोला, किसी को
ठहरा लेने से कोई ऊंचा नहीं हो जाता। चमार कितना ही दानपुण्य करे, पर रहेगा तो चमार ही।'
जालपा-'मैं उस चमार को उस पंडित से अच्छा समझूंगी, जो हमेशा
दूसरों का धन खाया करता है।'
जलपान
करके गोपी नीचे चला गया। शहर घूमने की उसकी बडी इच्छा थी। जालपा की इच्छा कुछ खाने
की न हुई। उसके सामने एक जटिल समस्या खड़ी थी,रमा को कैसे
इस दलदल से निकाले। उस निंदा और उपहास की कल्पना ही से उसका अभिमान आहत हो उठता
था। हमेशा के लिए वह सबकी आंखों से फिर जाएंगे, किसी को मुंह
न दिखा सकेंगे। फिर, बेगुनाहों का ख़ून किसकी गर्दन पर होगा।
अभियुक्तों में न जाने कौन अपराधी है, कौन निरपराध है,
कितने द्वेष के शिकार हैं, कितने लोभ के,
सभी सज़ा पा जाएंगे। शायद दो-चार को फांसी भी हो जाय। किस पर यह
हत्या पड़ेगी? उसने फिर सोचा, माना
किसी पर हत्या न पड़ेगी। कौन जानता है, हत्या पड़ती है या
नहीं, लेकिन अपने स्वार्थ के लिए,ओह!
कितनी बडी नीचता है। यह कैसे इस बात पर राज़ी हुए! अगर म्युनिसिपैलिटी के मुकदमा
चलाने का भय भी था, तो दो-चार साल की कैद के सिवा और क्या
होता, उससे बचने के लिए इतनी घोर नीचता पर उतर आए! अब अगर
मालूम भी हो जाए कि म्युनिसिपैलिटी कुछ नहीं कर सकती, तो अब
हो ही क्या सकता है। इनकी शहादत तो हो ही गई। सहसा एक बात किसी भारी कील की तरह
उसके ह्रदय में चुभ गई।
क्यों
न यह अपना बयान बदल दें। उन्हें मालूम हो जाए कि म्युनिसिपैलिटी उनका कुछ नहीं कर
सकती,
तो शायद वह ख़ुद ही अपना बयान बदल दें। यह बात उन्हें कैसे बताई जाए?
किसी तरह संभव है। वह अधीर होकर नीचे उतर आई और देवीदीन को इशारे से
बुलाकर बोली,'क्यों दादा, उनके पास कोई
खत भी नहीं पहुंच सकता? पहरे वालों को दस-पांच रूपये देने से
तो शायद ख़त पहुंच जाय।'
देवीदीन
ने गर्दन हिलाकर कहा,'मुसकिल है। पहरे पर बडे जंचे
हुए आदमी रखे गए हैं। मैं दो बार गया था। सबों ने फाटक के सामने खडाभी न होने
दिया।'
'उस बंगले के आसपास क्या है?'
'एक ओर तो दूसरा बंगला है। एक ओर एक कलमी आम का बाग़ है और सामने सड़क है।'
'हां, शाम को घूमने-घामने तो निकलते ही होंगे?'
'हां, बाहर द्दरसी डालकर बैठते हैं। पुलिस के दो-एक
अफसर भी साथ रहते हैं।'
'अगर कोई उस बाग़ में छिपकर बैठे, तो कैसा हो! जब
उन्हें अकेले देखे, ख़त फेंक दे। वह जरूर उठा लेंगे।'
देवीदीन
ने चकित होकर कहा, 'हां, हो
तो सकता है, लेकिन अकेले मिलें तब तो!'
ज़रा
और अंधेरा हुआ, तो जालपा ने देवीदीन को साथ लिया और
रमानाथ का बंगला देखने चली। एक पत्र लिखकर जेब में रख लिया था। बार-बार देवीदीन से
पूछती, अब कितनी दूर है? अच्छा! अभी
इतनी ही दूर और! वहां हाते में रोशनी तो होगी ही। उसके दिल में लहरें-सी उठने
लगीं। रमा अकेले टहलते हुए मिल जाएं, तो क्या पूछना। ईमाल
में बांधकर ख़त को उनके सामने फेंक दूं। उनकी सूरत बदल गई होगी। सहसा उसे शंका हो
गई,कहीं वह पत्र पढ़कर भी अपना बयान न बदलें, तब क्या होगा? कौन जाने अब मेरी याद भी उन्हें है या
नहीं। कहीं मुझे देखकर वह मुंह उधर लें तो- इस शंका से वह सहम उठी। देवीदीन से
बोली, 'क्यों दादा, वह कभी घर की चर्चा
करते थे?'
देवीदीन
ने सिर हिलाकर कहा,'कभी नहीं। मुझसे तो कभी नहीं
की। उदास बहुत रहते थे। '
इन
शब्दों ने जालपा की शंका को और भी सजीव कर दिया। शहर की घनी बस्ती से ये लोग दूर
निकल आए थे। चारों ओर सन्नाटा था। दिनभर वेग से चलने के बाद इस समय पवन भी विश्राम
कर रहा था। सड़क के किनारे के वृक्ष और मैदान चन्द्रमा के मंद प्रकाश में हतोत्साह, निर्जीव-से मालूम होते थे। जालपा को ऐसा आभास होने लगा कि उसके प्रयास का
कोई फल नहीं है, उसकी यात्रा का कोई लक्ष्य नहीं है, इस अनंत मार्ग में उसकी दशा उस अनाथ की-सी है जो मुत्तीभर अकै के लिए
द्वार-द्वार फिरता हो वह जानता है, अगले द्वार पर उसे अकै न
मिलेगा, गालियां ही मिलेंगी,फिर भी वह
हाथ फैलाता है, बढ़ती मनाता है। उसे आशा का अवलंब नहीं निराशा
ही का अवलंब है।
एकाएक
सड़क के दाहनी तरफ बिजली का प्रकाश दिखाई दिया। देवीदीन ने एक बंगले की ओर उंगली
उठाकर कहा, 'यही उनका बंगला है।'
जालपा
ने डरते-डरते उधर देखा, मगर बिलकुल सन्नाटा छाया हुआ
था। कोई आदमी न था। फाटक पर ताला पडाहुआ था।
जालपा
बोली,'यहां तो कोई नहीं है।'
देवीदीन
ने फाटक के अंदर झांककर कहा, 'हां, शायद यह बंगला छोड़ दिया।'
'कहीं घूमने गए होंगे?'
'घूमने जाते तो द्वार पर पहरा होता। यह बंगला छोड़ दिया।'
'तो लौट चलें।'
'नहीं, ज़रा पता लगाना चाहिए, गए
कहां?'
बंगले
की दाहनी तरफ आमों के बाग़ में प्रकाश दिखाई दिया। शायद खटिक बाग़ की रखवाली कर
रहा था। देवीदीन ने बाग में आकर पुकारा, 'कौन है
यहां? किसने यह बाग़ लिया है?'
एक
आदमी आमों के झुरमुट से निकल आया। देवीदीन ने उसे पहचानकर कहा ,
'अरे! तुम हो जंगली? तुमने यह बाग़ लिया है?'
जगंली
ठिगना-सा गठीला आदमी था, बोला,'हां
दादा, ले लिया, पर कुछ है नहीं। डंड ही
भरना पड़ेगा। तुम यहां कैसे आ गए?'
'कुछ नहीं, यों ही चला आया था। इस बंगले वाले आदमी
क्या हुए?'
जंगली
ने इधर-उधर देखकर कनबतियों में कहा, 'इसमें वही
मुखबर टिका हुआ था। आज सब चले गए। सुनते हैं, पंद्रह-बीस दिन
में आएंगे, जब फिर हाईकोर्ट में मुकदमा पेस होगा। पढ़े-लिखे
आदमी भी ऐसे दगाबाज होते हैं, दादा! सरासर झूठी गवाही दी। न
जाने इसके बाल-बच्चे हैं या नहीं,भगवान को भी नहीं डरा!'
जालपा
वहीं खड़ी थी। देवीदीन ने जंगली को और ज़हर उगलने का अवसर न दिया। बोला,
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