गबन: अध्याय-2.5
रमेश-'मुझसे शरारत करोगे तो मार बैठूंगा। अगर जट ही लाए हो, तो भी मैं तुम्हारी पीठ ठोकूंगा, जीते रहो खूब जटो, लेकिन आबरू पर आंच न आने पाए । किसी को कानोंकान ख़बर न हो ईश्वर से तो मैं डरता नहीं। वह जो कुछ पूछेगा, उसका जवाब मैं दे लूंगा, मगर आदमी से डरता हूं। सच बताओ, किसलिए रूपये दिए - कुछ दलाली मिलने वाली हो तो मुझे भी शरीक कर लेना।'
रमानाथ-'जडाऊ कंगन बनवाने को कह गई हैं।'
रमेश-'तो चलो, मैं एक अच्छे सर्राफ से बनवा दूं। यह झंझट
तुमने बुरा मोल ले लिया। औरत का स्वभाव जानते नहीं। किसी पर विश्वास तो इन्हें आता
ही नहीं। तुम चाहे दो-चार रूपये अपने पास ही से खर्च कर दो, पर
वह यही समझेंगी कि मुझे लूट लिया। नेकनामी तो शायद ही मिले, हां,
बदनामी तैयार खड़ी है।'
रमानाथ-'आप मूर्ख स्त्रियों की बातें कर रहे हैं। शिक्षित स्त्रियां ऐसी नहीं
होतीं।'
ज़रा
देर बाद रमा अंदर जाकर जालपा से बोला, 'अभी
तुम्हारी सहेली रतन आई थीं।'
जालपा-'सच! तब तो बडा गड़बड़ हुआ होगा। यहां कुछ तैयारी तो थी ही नहीं।'
रमानाथ-'कुशल यही हुई कि कमरे में नहीं आई। कंगन के रूपये देने आई थीं। तुमने उनसे
शायद आठ सौ रूपये बताए थे। मैंने छः सौ ले लिए। '
जालपा
ने झेंपते हुए कहा,मैंने तो दिल्लगी की थी। जालपा
ने इस तरह अपनी सफाई तो दे दी, लेकिन बहुत देर तक उसकेमन में
उथल-पुथल होती रही। रमा ने अगर आठ सौ रूपये ले लिए होते, तो
शायद उथल-पुथल न होती। वह अपनी सफलता पर ख़ुश होती, पर रमा
के विवेक ने उसकी धर्म-बुद्धि को जगा दिया था। वह पछता रही थी कि मैं व्यर्थ झूठ
बोली। यह मुझे अपने मन में कितनी नीच समझ रहे होंगे। रतन भी मुझे कितनी बेईमान समझ
रही होगी।
सोलह
चाय-पार्टी
में कोई विशेष बात नहीं हुई। रतन के साथ उसकी एक नाते की बहन और थी। वकील साहब न
आए थे। दयानाथ ने उतनी देर के लिए घर से टल जाना ही उचित समझाब हां, रमेश बाबू बरामदे में बराबर खड़े रहे। रमा ने कई बार चाहा कि उन्हें भी
पार्टी में शरीक कर लें, पर रमेश में इतना साहस न था। जालपा
ने दोनों मेहमानों को अपनी सास से मिलाया। ये युवतियां उन्हें कुछ ओछी जान पड़ीं।
उनका सारे घर में दौड़ना, धम-धम करके कोठे पर जाना, छत पर इधर-उधर उचकना, खिलखिलाकर हंसना, उन्हें हुड़दंगपन मालूम होता था। उनकी नीति में बहू-बेटियों को भारी और
लज्जाशील होना चाहिए था। आश्चर्य यह था कि आज जालपा भी उन्हीं में मिल गई थी। रतन
ने आज कंगन की चर्चा तक न की।
अभी
तक रमा को पार्टी की तैयारियों से इतनी फुर्सत नहीं मिली थी कि गंगू की दुकान तक
जाता। उसने समझा था, गंगू को छः सौ रूपये दे दूंगा
तो पिछले हिसाब में जमा हो जाएंगे। केवल ढाई सौ रूपये और रह जाएंगे। इस नये हिसाब
में छः सौ और मिलाकर फिर आठ सौ रह जाएंगे। इस तरह उसे अपनी साख जमाने का सुअवसर
मिल जायगा। दूसरे दिन रमा ख़ुश होता हुआ गंगू की दुकान पर पहुंचा और रोब से बोला,
'क्या रंग-ढंग है महाराज, कोई नई चीज़ बनवाई
है इधर?'
रमा
के टालमटोल से गंगू इतना विरक्त हो रहा था कि आज कुछ रूपये मिलने की आशा भी उसे
प्रसन्न न कर सकी। शिकायत के ढंग से बोला, 'बाबू साहब,
चीज़ें कितनी बनीं और कितनी बिकीं, आपने तो
दुकान पर आना ही छोड़ दिया। इस तरह की दुकानदारी हम लोग नहीं करते। आठ महीने हुए,
आपके यहां से एक पैसा भी नहीं मिला।
रमानाथ-'भाई, ख़ाली हाथ दुकान पर आते शर्म आती है। हम उन
लोगों में नहीं हैं, जिनसे तकाज़ा करना पड़े। आज यह छः सौ
रूपये जमा कर लो, और एक अच्छा-सा कंगन तैयार कर दो।'
गंगू
ने रूपये लेकर संदूक में रखे और बोला,'बन जाएंगे।
बाकी रूपये कब तक मिलेंगे?'
रमानाथ-'बहुत जल्द।'
गंगू-'हां बाबूजी, अब पिछला साफ कर दीजिए।'
गंगू
ने बहुत जल्द कंगन बनवाने का वचन दिया, लेकिन एक
बार सौदा करके उसे मालूम हो गया था कि यहां से जल्द रूपये वसूल होने वाले नहीं।
नतीजा यह हुआ कि रमा रोज़ तकाज़ा करता और गंगू रोज़ हीले करके टालता। कभी कारीगर
बीमार पड़ जाता, कभी अपनी स्त्री की दवा कराने ससुराल चला
जाता, कभी उसके लङके बीमार हो जाते। एक महीना गुज़र गया और
कंगन न बने। रतन के तकाज़ों के डर से रमा ने पार्क जाना छोड़ दिया, मगर उसने घर तो देख ही रक्खा था। इस एक महीने में कई बार तकाज़ा करने आई।
आख़िर जब सावन का महीना आ गया तो उसने एक दिन रमा से कहा, 'वह
सुअर नहीं बनाकर देता, तो तुम किसी और कारीगर को क्यों नहीं
देते?'
रमानाथ-'उस पाजी ने ऐसा धोखा दिया कि कुछ न पूछो, बस रोज़
आजकल किया करता है। मैंने बडी भूल की जो उसे पेशगी रूपये दे दिये। अब उससे रूपये
निकलना मुश्किल है।'
रतन-'आप मुझे उसकी दुकान दिखा दीजिए, मैं उसके बाप से
वसूल कर लूंगी। तावान अलग। ऐसे बेईमान आदमी को पुलिस में देना चाहिए।'
जालपा
ने कहा,
'हां और क्या सभी सुनार देर करते हैं, मगर ऐसा
नहीं, रूपये डकार जायं और चीज़ के लिए महीनों दौडाएं।
रमा
ने सिर खुजलाते हुए कहा, 'आप दस दिन और सब्र करें,
मैं आज ही उससे रूपये लेकर किसी दूसरे सर्राफ को दे दूंगा।'
रतन-'आप मुझे उस बदमाश की दुकान क्यों नहीं दिखा देते। मैं हंटर से बात करूं।'
रमानाथ-'कहता तो हूं। दस दिन के अंदर आपको कंगन मिल जाएंगे।'
रतन-'आप खुद ही ढील डाले हुए हैं। आप उसकी लल्लो-चप्पो की बातों में आ जाते
होंगे। एक बार कड़े पड़ जाते, तो मजाल थी कि यों हीलेहवाले
करता! '
आख़िर
रतन बडी मुश्किल से विदा हुई। उसी दिन शाम को गंगू ने साफ जवाब दे दिया,बिना आधे रूपये लिये कंगन न बन सकेंगे। पिछला हिसाब भी बेबाक हो जाना
चाहिए।'
रमा
को मानो गोली लग गई। बोला, 'महाराज, यह तो भलमनसी नहीं है। एक महिला की चीज़ है, उन्होंने
पेशगी रूपये दिए थे। सोचो, मैं उन्हें क्या मुंह दिखाऊंगा।
मुझसे अपने रूपयों के लिए पुरनोट लिखा लो, स्टांप लिखा लो और
क्या करोगे? '
गंगू-'पुरनोट को शहद लगाकर चाटूंगा क्या? आठ-आठ महीने का
उधार नहीं होता। महीना, दो महीना बहुत है। आप तो बडे आदमी
हैं, आपके लिए पांच-छः सौ रूपये कौन बडी बात है। कंगन तैयार
हैं।'
रमा
ने दांत पीसकर कहा, 'अगर यही बात थी तो तुमने एक
महीना पहले क्यों न कह दी? अब तक मैंने रूपये की कोई फिक्र
की होती न!'
गंगू-'मैं क्या जानता था, आप इतना भी नहीं समझ रहे हैं।'
रमा
निराश होकर घर लौट आया। अगर इस समय भी उसने जालपा से सारा वृत्तांत साफ-साफ कह
दिया होता तो उसे चाहे कितना ही दुःख होता, पर वह कंगन
उतारकर दे देती, लेकिन रमा में इतना साहस न था। वह अपनी आर्थिक
कठिनाइयों की दशा कहकर उसके कोमल ह्रदय पर आघात न कर सकता था। इसमें संदेह नहीं कि
रमा को सौ रूपये के करीब ऊपर से मिल जाते थे, और वह किफायत
करना जानता तो इन आठ महीनों में दोनों सर्राफों के कमसे- कम आधे रूपये अवश्य दे
देता, लेकिन ऊपर की आमदनी थी तो ऊपर का ख़र्च भी था। जो कुछ
मिलता था, सैर - सपाटे में ख़र्च हो जाता और सर्राफों का
देना किसी एकमुश्त रकम की आशा में रूका हुआ था। कौडियों से रूपये बनाना वणिकों का
ही काम है। बाबू लोग तो रूपये की कौडियां ही बनाते हैं। कुछ रात जाने पर रमा ने एक
बार फिर सर्राफे का चक्कर लगाया। बहुत चाहा, किसी सर्राफ को
झांसा दूं, पर कहीं दाल न गली। बाज़ार में बेतार की ख़बरें
चला करती हैं।
रमा
को रातभर नींद न आई। यदि आज उसे एक हज़ार का रूक्का लिखकर कोई पांच सौ रूपये भी दे
देता तो वह निहाल हो जाता, पर अपनी जान?पहचान वालों में उसे ऐसा कोई नजर न आता था। अपने मिलने वालों में उसने सभी
से अपनी हवा बांधा रक्खी थी। खिलाने-पिलाने में खुले हाथों रूपया ख़र्च करता था।
अब किस मुंह से अपनी विपत्ति कहे - वह पछता रहा था कि नाहक गंगू को रूपये दिए।
गंगू नालिश करने तो जाता न था। इस समय यदि रमा को कोई भयंकर रोग हो जाता तो वह
उसका स्वागत करता। कम-से-कम दस-पांच दिन की मुहलत तो मिल जाती, मगर बुलाने से तो मौत भी नहीं आती! वह तो उसी समय आती है, जब हम उसके लिए बिलकुल तैयार नहीं होते। ईश्वर कहीं से कोई तार ही भिजवा
दे, कोई ऐसा मित्र भी नज़र नहीं आता था, जो उसके नाम फर्जी तार भेज देता। वह इन्हीं चिंताओं में करवटें बदल रहा था
कि जालपा की आंख खुल गई। रमा ने तुरंत चादर से मुंह छिपा लिया, मानो बेखबर सो
रहा
है। जालपा ने धीरे से चादर हटाकर उसका मुंह देखा और उसे सोता पाकर ध्यान से उसका
मुंह देखने लगी। जागरण और निद्रा का अंतर उससे छिपा न रहा। उसे धीरे से हिलाकर
बोली,
'क्या अभी तक जाग रहे हो?'
रमानाथ-'क्या जाने, क्यों नींद नहीं आ रही है। पड़े-पड़े
सोचता था, कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर चला जाऊं। कुछ रूपये
कमा लाऊं।'
जालपा-'मुझे भी लेते चलोगे न?'
रमानाथ-'तुम्हें परदेश में कहां लिये-लिये फिरूंगा? '
जालपा-'तो मैं यहां अकेली रह चुकी। एक मिनट तो रहूंगी नहीं। मगर जाओगे कहां?
'
रमानाथ-'अभी कुछ निश्चय नहीं कर सका हूं।'
जालपा-'तो क्या सचमुच तुम मुझे छोड़कर चले जाओगे? मुझसे तो
एक दिन भी न रहा जाय। मैं समझ गई, तुम मुझसे मुहब्बत नहीं करते।
केवल मुंह देखे की प्रीति करते हो।'
रमानाथ-'तुम्हारे प्रेम-पाश ही ने मुझे यहां बांधा रक्खा है। नहीं तो अब तक कभी
चला गया होता।'
जालपा-'बातें बना रहे हो अगर तुम्हें मुझसे सच्चा प्रेम होता, तो तुम कोई परदा न रखते। तुम्हारे मन में जरूर कोई ऐसी बात है, जो तुम मुझसे छिपा रहे हो कई दिनों से देख रही हूं, तुम
चिंता में डूबे रहते हो, मुझसे क्यों नहीं कहते। जहां
विश्वास नहीं है, वहां प्रेम कैसे रह सकता है? '
रमानाथ-'यह तुम्हारा भ्रम है, जालपा! मैंने तो तुमसे कभी
परदा नहीं रखा।'
जालपा-'तो तुम मुझे सचमुच दिल से चाहते हो? '
रमानाथ-'यह क्या मुंह से कहूंगा जभी! '
जालपा-'अच्छा, अब मैं एक प्रश्न करती हूं। संभले रहना। तुम
मुझसे क्यों प्रेम करते हो! तुम्हें मेरी कसम है, सच बताना।'
रमानाथ-'यह तो तुमने बेढब प्रश्न किया। अगर मैं तुमसे यही प्रश्न पूछूं तो तुम
मुझे क्या जवाब दोगी? '
जालपा-'मैं तो जानती हूं।'
रमानाथ-'बताओ।'
जालपा-'तुम बतला दो, मैं भी बतला दूं।'
रमानाथ-'मैं तो जानता ही नहीं। केवल इतना ही जानता हूं कि तुम मेरे रोम-रोम में रम
रही हो।'
जालपा-'सोचकर बतलाओ। मैं आदर्श-पत्नी नहीं हूं, इसे मैं खूब
जानती हूं। पति-सेवा अब तक मैंने नाम को भी नहीं की। ईश्वर की दया से तुम्हारे लिए
अब तक कष्ट सहने की जरूरत ही नहीं पड़ी। घर-गृहस्थी का कोई काम मुझे नहीं आता। जो
कुछ सीखा, यहीं सीखाब फिर तुम्हें मुझसे क्यों प्रेम है?
बातचीत में निपुण नहीं। रूप-रंग भी ऐसा आकर्षक नहीं। जानते हो,
मैं तुमसे क्यों प्रश्न कर रही हूं?'
रमानाथ-'क्या जाने भाई, मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा है।'
जालपा-'मैं इसलिए पूछ रही हूं कि तुम्हारे प्रेम को स्थायी बना सकूं।'
रमानाथ-'मैं कुछ नहीं जानता जालपा, ईमान से कहता हूं। तुममें
कोई कमी है, कोई दोष है, यह बात आज तक
मेरे ध्यान में नहीं आई, लेकिन तुमने मुझमें कौन?सी बात देखी- न मेरे पास धन है, न रूप है। बताओ?'
जालपा-'बता दूं? मैं तुम्हारी सज्जनता पर मोहित हूं। अब
तुमसे क्या छिपाऊं, जब मैं यहां आई तो यद्यपि तुम्हें अपना
पति समझती थी, लेकिन कोई बात कहते या करते समय मुझे चिंता
होती थी कि तुम उसे पसंद करोगे या नहीं। यदि तुम्हारे बदले मेरा विवाह किसी दूसरे
पुरूष से हुआ होता तो उसके साथ भी मेरा यही व्यवहार होता। यह पत्नी और पुरूष का
रिवाजी नाता है, पर अब मैं तुम्हें गोपियों के कृष्ण से भी न
बदलूंगी। लेकिन तुम्हारे दिल में अब भी चोर है। तुम अब भी मुझसे किसी-किसी बात में
परदा रखते हो!'
रमानाथ-'यह तुम्हारी केवल शंका है, जालपा! मैं दोस्तों से भी
कोई दुराव नहीं करता। फिर तुम तो मेरी ह्रदयेश्वरी हो।'
जालपा-'मेरी तरफ देखकर बोलो, आंखें नीची करना मर्दो का काम
नहीं है!'
रमा
के जी में एक बार फिर आया कि अपनी कठिनाइयों की कथा कह सुनाऊं, लेकिन मिथ्या गौरव ने फिर उसकी ज़बान बंद कर दी। जालपा जब उससे पूछती,
सर्राफों को रूपये देते जाते हो या नहीं, तो
वह बराबर कहता, 'हां कुछ-न?कुछ हर
महीने देता जाता हूं, पर आज रमा की दुर्बलता ने जालपा के मन
में एक संदेह पैदा कर दिया था। वह उसी संदेह को मिटाना चाहती थी। ज़रा देर बाद
उसने पूछा, 'सर्राफ के तो अभी सब रूपये अदा न हुए होंगे?
'
रमानाथ-'अब थोड़े ही बाकी हैं।'
जालपा-'कितने बाकी होंगे, कुछ हिसाब-किताब लिखते हो?
'
रमानाथ-'हां, लिखता क्यों नहीं। सात सौ से कुछ कम ही होंगे।'
जालपा-'तब तो पूरी गठरी है, तुमने कहीं रतन के रूपये तो
नहीं दे दिए? '
रमा
दिल में कांप रहा था, कहीं जालपा यह प्रश्न न कर
बैठे। आख़िर उसने यह प्रश्न पूछ ही लिया। उस वक्त भी यदि रमा ने साहस करके सच्ची
बात स्वीकार कर ली होती तो शायद उसके संकटों का अंत हो जाता। जालपा एक मिनट तक
अवश्य सन्नाटे में आ जाती। संभव है, क्रोध और निराशा के आवेश
में दो-चार कटु शब्द मुंह से निकालती, लेकिन फिर शांत हो
जाती। दोनों मिलकर कोई-न? कोई युक्ति सोच निकालते। जालपा यदि
रतन से यह रहस्य कह सुनाती, तो रतन अवश्य मान जाती, पर हाय रे आत्मगौरव, रमा ने यह बात सुनकर ऐसा मुंह
बना लिया मानो जालपा ने उस पर कोई निष्ठुर प्रहार किया हो बोला, 'रतन के रूपये क्यों देता। आज चाहूं, तो दो-चार हज़ार
का माल ला सकता हूं। कारीगरों की आदत देर करने की होती ही है। सुनार की खटाई मशहूर
है। बस और कोई बात नहीं। दस दिन में या तो चीज़ ही लाऊंगा या रूपये वापस कर दूंगा,
मगर यह शंका तुम्हें क्यों हुई? पराई रकम भला
मैं अपने ख़र्च में कैसे लाता।'
जालपा-'कुछ नहीं, मैंने यों ही पूछा था।'
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