गबन: अध्याय-3
अध्याय 3
इक्कीस
अगर
इस समय किसी को संसार में सबसे दुखी, जीवन से
निराश, चिंताग्नि में जलते हुए प्राणी की मूर्ति देखनी हो,
तो उस युवक को देखे, जो साइकिल पर बैठा हुआ,
अल्प्रेड पार्क के सामने चला जा रहा है। इस वक्त अगर कोई काला सांप
नज़र आए तो वह दोनों हाथ फैलाकर उसका स्वागत करेगा और उसके विष को सुधा की तरह
पिएगा। उसकी रक्षा सुधा से नहीं, अब विष ही से हो सकती है।
मौत ही अब उसकी चिंताओं का अंत कर सकती है, लेकिन क्या मौत
उसे बदनामी से भी बचा सकती है? सबेरा होते ही, यह बात घर- घर फैल जायगी,सरकारी रूपया खा गया और जब
पकडागया, तब आत्महत्या कर ली! द्दल में कलंक लगाकर, मरने के बाद भी अपनी हंसी कराके चिंताओं से मुक्त हुआ तो क्या, लेकिन दूसरा उपाय ही क्या है। अगर वह इस समय जाकर जालपा से सारी स्थिति कह
सुनाए, तो वह उसके साथ अवश्य सहानुभूति दिखाएगी। जालपा को
चाहे कितना ही दुख हो, पर अपने गहने निकालकर देने में एक
क्षण का भी विलंब न करेगी। गहनों को गिरवी रखकर वह सरकारी रूपये अदा कर सकता है।
उसे अपना परदा खोलना पड़ेगा। इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है।
मन
में यह निश्चय करके रमा घर की ओर चला, पर उसकी चाल
में वह तेज़ी न थी जो मानसिक स्फूर्ति का लक्षण है। लेकिन घर पहुंचकर उसने सोचा,जब यही करना है, तो जल्दी क्या है, जब चाहूंगा मांग लूंगा। कुछ देर गप-शप करता रहा, फिर
खाना खाकर लेटा।
सहसा
उसके जी में आया, क्यों न चुपके से कोई चीज़
उठा ले जाऊं?' कुलमर्यादा की रक्षा करने के लिए एक बार उसने
ऐसा ही किया था। उसी उपाय से क्या वह प्राणों की रक्षा नहीं कर सकता- अपनी जबान से
तो शायद वह कभी अपनी विपत्ति का हाल न कह सकेगा। इसी प्रकार आगा-पीछा में पड़े हुए
सबेरा हो जायगा। और तब उसे कुछ कहने का अवसर ही न मिलेगा।
मगर
उसे फिर शंका हुई, कहीं जालपा की आंख खुल जाय-
फिर तो उसके लिए त्रिवेणी के सिवा और स्थान ही न रह जायगा। जो कुछ भी हो एक बार तो
यह उद्योग करना ही पड़ेगा। उसने धीरे से जालपा का हाथ अपनी छाती पर से हटाया,
और नीचे खडाहो गया। उसे ऐसा ख्याल हुआ कि जालपा हाथ हटाते ही चौंकी
और फिर मालूम हुआ कि यह भ्रम-मात्र था। उसे अब जालपा के सलूके की जेब से चाभियों
का गुच्छा निकालना था। देर करने का अवसर न था। नींद में भी निम्नचेतना अपना काम
करती रहती है। बालक कितना ही ग़ाफिल सोया हो, माता के चारपाई
से उठते ही जाग पड़ता है, लेकिन जब चाभी निकालने के लिए झुका,
तो उसे जान पडा जालपा मुस्करा रही है। उसने झट हाथ खींच लिया और
लैंप के क्षीण प्रकाश में जालपा के मुख की ओर देखा, जो कोई
सुखद स्वप्न देख रही थी। उसकी स्वप्न-सुख विलसित छवि देखकर
उसका
मन कातर हो उठा। हा! इस सरला के साथ मैं ऐसा विश्वासघात करूं? जिसके लिए मैं अपने प्राणों को भेंट कर सकता हूं, उसी
के साथ यह कपट?
जालपा
का निष्कपट स्नेह-पूर्ण ह्रदय मानो उसके मुखमंडल पर अंकित हो रहा था। आह जिस समय
इसे ज्ञात होगा इसके गहने फिर चोरी हो गए,इसकी क्या
दशा होगी? पछाड़ खायगी, सिर के बाल
नोचेगी। वह किन आंखों से उसका यह क्लेश देखेगा? उसने सोचा,मैंने इसे आराम ही कौन?सा पहुंचाया है। किसी दूसरे
से विवाह होता, तो अब तक वह रत्नों से लद जाती। दुर्भाग्यवश
इस घर में आई, जहां कोई सुख नहीं,उल्टे
और रोना पड़ा।
रमा
फिर चारपाई पर लेट रहा। उसी वक्त ज़ालपा की आंखें खुल गई। उसके मुख की ओर देखकर
बोली,
'तुम कहां गए थे? मैं अच्छा सपना देख रही थी।
बडा बाग़ है, और हम-तुम दोनों उसमें टहल रहे हैं। इतने में
तुम न जाने कहां चले जाते हो, एक और साधु आकर मेरे सामने खडा
हो जाता है। बिलकुल देवताओं का-सा उसका स्वरूप है। वह मुझसे कहता है, 'बेटी, मैं तुझे वर देने आया हूं। मांग, क्या मांगती है। मैं तुम्हें इधर-उधर खोज रही हूं कि तुमसे पूछूं क्या
मांग़ूब और तुम कहीं दिखाई नहीं देते। मैं सारा बाग़ छान आई। पेडों पर झांककर देखा,
तुम न-जाने कहां चले गए हो बस इतने में नींद खुल गई, वरदान न मांगने पाई।
रमा
ने मुस्कराते हुए कहा, 'क्या वरदान मांगतीं?'
'मांगती जो जी में आता, तुम्हें क्या बता दूं?'
'नहीं, बताओ, शायद तुम बहुत-सा
धन मांगतीं।'
'धन को तुम बहुत बडी चीज़ समझते होगे? मैं तो कुछ
नहीं समझती।'
'हां, मैं तो समझता हूं। निर्धान रहकर जीना मरने से
भी बदतर है। मैं अगर किसी देवता को पकड़ पाऊं तो बिना काफी रूपये लिये न मानूंब
मैं सोने की दीवार नहीं खड़ी करना चाहता, न राकट्ठलर और
कारनेगी बनने की मेरी इच्छा है। मैं केवल इतना धन चाहता हूं कि जरूरत की मामूली
चीज़ों के लिए तरसना न पड़े। बस कोई देवता मुझे पांच लाख दे दे, तो मैं फिर उससे कुछ न मांगूंगा। हमारे ही ग़रीब मुल्क़ में ऐसे कितने ही
रईस,सेठ, ताल्लुकेदार हैं, जो पांच
लाख
एक साल में ख़र्च करते हैं, बल्कि कितनों ही का तो माहवार
खर्च पांच लाख होगा। मैं तो इसमें सात जीवन काटने को तैयार हूं, मगर मुझे कोई इतना भी नहीं देता। तुम क्या मांगतीं- अच्छे-अच्छे गहने!'
जालपा
ने त्योरियां चढ़ाकर कहा, 'क्यों चिढ़ाते हो मुझे! क्या
मैं गहनों पर और स्त्रियों से ज्यादा जान देती हूं- मैंने तो तुमसे कभी आग्रह नहीं
किया?तुम्हें जरूरत हो, आज इन्हें उठा
ले जाओ, मैं ख़ुशी से दे दूंगी।'
रमा
ने मुस्कराकर कहा, 'तो फिर बतलातीं क्यों नहीं?'
जालपा-'मैं यही मांगती कि मेरा स्वामी सदा मुझसे प्रेम करता रहे। उनका मन कभी
मुझसे न गिरे।'
रमा
ने हंसकर कहा, 'क्या तुम्हें इसकी भी शंका है?'
'तुम देवता भी होते तो शंका होती, तुम तो आदमी हो
मुझे तो ऐसी कोई स्त्री न मिली, जिसने अपने पति की निष्ठुरता
का दुखडान रोया हो सालदो साल तो वह खूब प्रेम करते हैं, फिर
न जाने क्यों उन्हें स्त्री से अरूचि-सी हो जाती है। मन चंचल होने लगता है। औरत के
लिए इससे बडी विपत्ति नहीं। उस विपत्ति से बचने के सिवा मैं और क्या वरदान मांगती?'
यह कहते हुए जालपा ने पति के गले में बांहें डाल दीं और प्रणय-संचित
नजरों से देखती हुई बोली, 'सच बताना, तुम
अब भी मुझे वैसे ही चाहते हो, जैसे पहले चाहते थे?देखो, सच कहना, बोलो!'
रमा
ने जालपा के गले से चिमटकर कहा, 'उससे कहीं अधिक,
लाख गुना!'
जालपा
ने हंसकर कहा, 'झूठ! बिलकुल झूठ! सोलहों आना झूठ!'
रमानाथ-'यह तुम्हारी ज़बरदस्ती है। आख़िर ऐसा तुम्हें कैसे जान पडा?'
जालपा-'आंखों से देखती हूं और कैसे जान पड़ा। तुमने मेरे पास बैठने की कसम खा ली
है। जब देखो तुम गुमसुम रहते हो मुझसे प्रेम होता, तो मुझ पर
विश्वास भी होता। बिना विश्वास के प्रेम हो ही कैसे सकता है? जिससे तुम अपनी बुरी-से-बुरी बात न कह सको, उससे तुम
प्रेम नहीं कर सकते। हां, उसके साथ विहार कर सकते हो,
विलास कर सकते हो उसी तरह जैसे कोई वेश्या के पास जाता है। वेश्या
के पास लोग आनंद उठाने ही जाते हैं, कोई उससे मन की बात कहने
नहीं जाता। तुम्हारी भी वही दशा है। बोलो है या नहीं? आंखें
क्यों छिपाते हो? क्या मैं देखती नहीं, तुम बाहर से कुछ घबडाए हुए आते हो? बातें करते समय
देखती हूं, तुम्हारा मन किसी और तरफ रहता है। भोजन में भी
देखती हूं, तुम्हें कोई आनंद नहीं आता। दाल गाढ़ी है या पतली,
शाक कम है या ज्यादा, चावल में कनी है या पक
गए हैं, इस तरफ तुम्हारी निगाह नहीं जाती। बेगार की तरह भोजन
करते हो और जल्दी से भागते हो मैं यह सब क्या नहीं देखती- मुझे देखना न चाहिए! मैं
विलासिनी हूं, इसी रूप में तो तुम मुझे देखते हो मेरा काम है,विहार करना, विलास करना, आनंद
करना। मुझे तुम्हारी चिंताओं से मतलब! मगर ईश्वर ने वैसा ह्रदय नहीं दिया। क्या
करूं? मैं समझती हूं, जब मुझे जीवन ही
व्यतीत करना है, जब मैं केवल तुम्हारे मनोरंजन की ही वस्तु
हूं, तो क्यों अपनी जान विपत्ति में डालूं?'
जालपा
ने रमा से कभी दिल खोलकर बात न की थी। वह इतनी विचारशील है, उसने अनुमान ही न किया था। वह उसे वास्तव में रमणी ही समझता था। अन्य
पुरूषों की भांति वह भी पत्नी को इसी रूप में देखता था। वह उसके यौवन पर मुग्ध था।
उसकी आत्मा का स्वरूप देखने की कभी चेष्टा ही न की। शायद वह समझता था, इसमें आत्मा है ही नहीं। अगर वह रूप-लावण्य की राशि न होती, तो कदाचित वह उससे बोलना भी पसंद न करता। उसका सारा आकर्षण, उसकी सारी आसक्ति केवल उसके रूप पर थी। वह समझता था, जालपा इसी में प्रसन्न है। अपनी चिंताओं के बोझ से वह उसे दबाना नहीं
चाहता था,पर आज उसे ज्ञात हुआ, जालपा
उतनी ही चिंतनशील है, जितना वह ख़ुद था। इस वक्त उसे अपनी
मनोव्यथा कह डालने का बहुत अच्छा अवसर मिला था, पर हाय
संकोच! इसने फिर उसकी ज़बान बंद कर दी। जो बातें वह इतने दिनों तक छिपाए रहा,
वह अब कैसे कहे? क्या ऐसा करना जालपा के
आरोपित आक्षेपों को स्वीकार करना न होगा? हां, उसकी आंखों से आज भ्रम का परदा उठ गया। उसे ज्ञात हुआ कि विलास पर प्रेम
का निर्माण करने की चेष्टा करना उसका अज्ञान था।
रमा
इन्हीं विचारों में पडा-पडा सो गया, उस समय आधी
रात से ऊपर गुज़र गई थी। सोया तो इसी सबब से था कि बहुत सबेरे उठ जाऊंगा, पर नींद खुली, तो कमरे में धूप की किरणें आ-आकर उसे
जगा रही थीं। वह चटपट उठा और बिना मुंह-हाथ धोए, कपड़े पहनकर
जाने को तैयार हो गया। वह रमेश बाबू के पास जाना चाहता था। अब उनसे यह कथा कहनी
पड़ेगी। स्थिति का पूरा ज्ञान हो जाने पर वह कुछ-न?कुछ
सहायता करने पर तैयार हो जाएंगे।
जालपा
उस समय भोजन बनाने की तैयारी कर रही थी। रमा को इस भांति जाते देखकर प्रश्न-सूचक
नजरों से देखा। रमा के चेहरे पर चिंता, भय,चंचलता और हिंसा मानो बैठी घूर रही थीं। एक क्षण के लिए वह बेसुध-सी हो
गई। एक हाथ में छुरी और दूसरे में एक करेला लिये हुए वह द्वार की ओर ताकती रही। यह
बात क्या है, उसे कुछ बताते क्यों नहीं- वह और कुछ न कर सके,
हमदर्दी तो कर ही सकती है। उसके जी में आया,पुकार
कर पूछूं, क्या बात है? उठकर द्वार तक
आई भीऋ पर रमा सड़क पर दूर निकल गया था। उसने देखा, वह बडी
तेज़ी से चला जा रहा है, जैसे सनक गया हो न दाहिनी ओर ताकता
है, न बाई ओर, केवल सिर झुकाए, पथिकों से टकराता, पैरगाडियों की परवा न करता हुआ,
भागा चला जा रहा था। आख़िर वह लौटकर फिर तरकारी काटने लगी, पर उसका मन उसी ओर लगा हुआ था। क्या बात है, क्यों
मुझसे इतना छिपाते हैं?
रमा
रमेश के घर पहुंचा तो आठ बज गए थे। बाबू साहब चौकी पर बैठे संध्या कर रहे थे।
इन्हें देखकर इशारे से बैठने को कहा, कोई आधा
घंटे में संध्या समाप्त हुई, बोले, 'क्या
अभी मुंह-हाथ भी नहीं धोया, यही लीचड़पन मुझे नापसंद है। तुम
और कुछ करो या न करो, बदन की सगाई तो करते रहो क्या हुआ,
रूपये का कुछ प्रबंध हुआ?'
रमानाथ-'इसी फिक्र में तो आपके पास आया हूं।'
रमेश-'तुम भी अजीब आदमी हो, अपने बाप से कहते हुए तुम्हें
क्यों शर्म आती है? यही न होगा, तुम्हें
ताने देंगे, लेकिन इस संकट से तो छूट जाओगे। उनसे सारी बातें
साफ-साफ कह दो। ऐसी दुर्घटनाएं अक्सर हो जाया करती हैं। इसमें डरने की क्या बात
है! नहीं कहो, मैं चलकर कह दूं।'
रमानाथ-'उनसे कहना होता, तो अब तक कभी कह चुका होता! क्या आप
कुछ बंदो।स्त नहीं कर सकते?'
रमेश-'कर क्यों नहीं सकता, पर करना नहीं चाहता। ऐसे आदमी
के साथ मुझे कोई हमदर्दी नहीं हो सकती। तुम जो बात मुझसे कह सकते हो, क्या उनसे नहीं कह सकते?मेरी सलाह मानो। उनसे जाकर
कह दो। अगर वह रूपये न दें तब मेरे पास आना।'
रमा
को अब और कुछ कहने का साहस न हुआ। लोग इतनी घनिष्ठता होने पर भी इतने कठोर हो सकते
हैं। वह यहां से उठा, पर उसे कुछ सुझाई न देता था।
चौवैया में आकाश से फिरते हुए जल-बिंदुओं की जो दशा होती है, वही इस समय रमा की हुई। दस कदम तेज़ी से आगे चलता, तो
फिर कुछ सोचकर रूक जाता और दस-पांच कदम पीछे लौट जाता। कभी इस गली में
घुस
जाता,
कभी उस गली में… सहसा उसे एक बात सूझी,
क्यों न जालपा को एक पत्र लिखकर अपनी सारी कठिनाइयां कह सुनाऊं।
मुंह से तो वह कुछ न कह सकता था, पर कलम से लिखने में उसे
कोई मुश्किल मालूम नहीं होती थी। पत्र लिखकर जालपा को दे दूंगा और बाहर के कमरे
में आ बैठूंगा। इससे सरल और क्या हो सकता है? वह भागा हुआ घर
आया, और तुरंत पत्र लिखा, 'प्रिये,
क्या कहूं, किस विपत्ति में फंसा हुआ हूं। अगर
एक घंटे के अंदर तीन सौ रूपये का प्रबंध न हो गया, तो हाथों
में हथकडियां पड़ जाएंगी। मैंने बहुत कोशिश की, किसी से उधार
ले लूं, किंतु कहीं न मिल सके। अगर तुम अपने दो-एक जेवर दे
दो, तो मैं गिरों रखकर काम चला लूं। ज्योंही रूपये हाथ आ
जाएंगे, छुडादूंगा। अगर मजबूरी न आ पड़ती तो, तुम्हें कष्ट न देता। ईश्वर के लिए रूष्ट न होना। मैं बहुत जल्द छुडा
दूंगा---'
अभी
यह पत्र समाप्त न हुआ था कि रमेश बाबू मुस्कराते हुए आकर बैठ गए और बोले, 'कहा उनसे तुमने?
रमा
ने सिर झुकाकर कहा, 'अभी तो मौका नहीं मिला।
रमेश-'तो क्या दो-चार दिन में मौका मिलेगा- मैं डरता हूं कि कहीं आज भी तुम यों
ही ख़ाली हाथ न चले जाओ, नहीं तो ग़जब ही हो जाय! '
रमानाथ-'जब उनसे मांगने का निश्चय कर लिया, तो अब क्या
चिंता! '
रमेश-'आज मौका मिले, तो ज़रा रतन के पास चले जाना। उस दिन
मैंने कितना जोर देकर कहा था, लेकिन मालूम होता है तुम भूल
गए।'
रमानाथ-'भूल तो नहीं गया, लेकिन उनसे कहते शर्म आती है।'
रमेश-'अपने बाप से कहते भी शर्म आती है? अगर अपने लोगों
में यह संकोच न होता, तो आज हमारी यह दशा क्यों होती?'
रमेश
बाबू चले गए, तो रमा ने पत्र उठाकर जेब में डाला और उसे
जालपा को देने का निश्चय करके घर में गया। जालपा आज किसी महिला के घर जाने को
तैयार थी। थोड़ी देर हुई, बुलावा आ गया। उसने अपनी सबसे
सुंदर साड़ी पहनी थी। हाथों में जडाऊ कंगन शोभा दे रहे थे, गले
में चन्द्रहार,आईना सामने रखे हुए कानों में झूमके पहन रही
थी।
रमा
को देखकर बोली, 'आज सबेरे कहां चले गए थे? हाथ-मुंह तक न धोया। दिन?भर तो बाहर रहते ही हो,
शामसबेरे तो घर पर रहा करो। तुम नहीं रहते, तो
घर सूना-सूना लगता है। मैं अभी
सोच
रही थी,
मुझे मैके जाना पड़े, तो मैं जाऊं या न जाऊं?
मेरा जी तो वहां बिलकुल न लगे।
रमानाथ-'तुम तो कहीं जाने को तैयार बैठी हो ।'
जालपा-'सेठानीजी ने बुला भेजा है, दोपहर तक चली आऊंगी।'
रमा
की दशा इस समय उस शिकारी की-सी थी, जो हिरनी को
अपने शावकों के साथ किलोल करते देखकर तनी हुई बंदूक कंधो पर रख लेता है,और वह वात्सल्य और प्रेम की क्रीडादेखने में तल्लीन हो जाता है। उसे अपनी
ओर टकटकी लगाए देखकर जालपा ने मुस्कराकर कहा, 'देखो,
मुझे
नज़र न लगा देना। मैं तुम्हारी आंखों से बहुत डरती हूं।'
टिप्पणियाँ