गबन: अध्याय-2.6
खोलकर
अंकों की जांच करने लगा। कई दिनों से मीज़ान नहीं दिया गया था, पर बडे बाबू के हस्ताक्षर मौजूद थे। अब मीज़ान दिया, तो ढाई हजार निकले। एकाएक उसे एक बात सूझी। क्यों न ढाई हजार की जगह
मीज़ान दो हजार लिख दूं। रसीद बही की जांच कौन करता है। अगर चोरी पकड़ी भी गई तो
कह दूंगा, मीजान लगाने में गलती हो गई। मगर इस विचार को उसने
मन में टिकने न दिया। इस भय से, कहीं चित्त चंचल न हो जाए,
उसने पेंसिल के अंकों पर रोशनाई उधर दी, और
रजिस्टर को दराज में बंद करके इधर-उधर घूमने लगा। इक्की-दुक्की गाडियां आने लगीं।
गाड़ीवानों ने देखा, बाबू साहब आज यहीं हैं, तो सोचा जल्दी से चुंगी देकर छुक्री पर जायं। रमा ने इस कृपा के लिए
दस्तूरी की दूनी रकम वसूल की, और गाड़ीवानों ने शौक से दी
क्योंकि यही मंडी का समय था और बारह-एक बजे तक चुंगीघर से फुरसत पाने की दशा में
चौबीस घंटे का हर्ज होता था, मंडी दस-ग्यारह बजे के बाद बंद
हो जाती थी, दूसरे दिन का इंतज़ार करना पड़ता था। अगर भाव
रूपये में आधा पाव भी फिर गया, तो सैकड़ों के मत्थे गई।
दस-पांच रूपये का बल खा जाने में उन्हें क्या आपत्ति हो सकती थी। रमा को आज यह नई
बात मालूम हुई। सोचा, आख़िर सुबह को मैं घर ही पर बैठा रहता
हूं। अगर यहां आकर बैठ जाऊं तो रोज़ दसपांच रूपये हाथ आ जायं। फिर तो छः महीने में
यह सारा झगडासाफ हो जाय। मान लो रोज़ यह चांदी न होगी, पंद्रह
न सही, दस मिलेंगे, पांच मिलेंगे। अगर
सुबह को रोज़ पांच रूपये मिल जायं और इतने ही दिनभर में और मिल जायं, तो पांच-छः महीने में मैंर् ऋण से मुक्त हो जाऊं। उसने दराज़ खोलकर फिर
रजिस्टर निकाला। यह हिसाब लगा लेने के बाद अब रजिस्टर में हेर-उधर कर देना उसे
इतना भंयकर न जान पड़ा। नया रंगरूट जो पहले बंदूक की आवाज़ से चौंक पड़ता है,
आगे चलकर गोलियों की वर्षा में भी नहीं घबडाता। रमा दफ्तर बंद करके
भोजन करने घर जाने ही वाला था कि एक बिसाती का ठेला आ पहुंचा। रमा ने कहा, लौटकर चुंगी लूंगा। बिसाती ने मिकैत करनी शुरू की। उसे कोई बडा ज़रूरी काम
था। आख़िर दस रूपये पर मामला ठीक हुआ। रमा ने चुंगी ली, रूपये
जेब में रक्खे और घर चला। पच्चीस रूपये केवल दो-ढाई घंटों में आ गए। अगर एक महीने
भी यह औसत रहे तो पल्ला पार है। उसे इतनी ख़ुशी हुई कि वह भोजन करने घर न गया।
बाज़ार से भी कुछ नहीं मंगवाया। रूपये भुनाते हुए उसे एक रूपया कम हो जाने का
ख़याल हुआ। वह शाम तक बैठा काम करता रहा। चार रूपये और वसूल हुए। चिराग़ जले वह घर
चला, तो उसके मन पर से चिंता और निराशा का बहुत कुछ बोझ उतर
चुका था। अगर दस दिन यही तेज़ी रही, तो रतन से मुंह चुराने
की नौबत न आएगी।
सतरह
नौ
दिन गुजर गए। रमा रोज़ प्रातः दफ्तर जाता और चिराग जले लौटता। वह रोज़ यही आशा
लेकर जाता कि आज कोई बडा शिकार फंस जाएगा। पर वह आशा न पूरी होती। इतना ही नहीं।
पहले दिन की तरह फिर कभी भाग्य का सूर्य न चमका। फिर भी उसके लिए कुछ कम श्रेय की
बात नहीं थी कि नौ दिनों में ही उसने सौ रूपये जमा कर लिए थे। उसने एक पैसे का पान
भी न खाया था। जालपा ने कई बार कहा, चलो कहीं
घूम आवें, तो उसे भी उसने बातों में ही टाला। बस, कल का दिन और था। कल आकर रतन कंगन मांगेगी तो उसे वह क्या जवाब देगा।
दफ्तर से आकर वह इसी सोच में बैठा हुआ था। क्या वह एक महीना-भर के लिए और न मान
जायगी। इतने दिन वह और न बोलती तो शायद वह उससे उऋण हो जाता। उसे विश्वास था कि
मैं उससे चिकनी-चुपड़ी बातें करके राज़ी कर लूंगा। अगर उसने ज़िद की तो मैं उससे
कह दूंगा, सर्राफ रूपये नहीं लौटाता। सावन के दिन थे,
अंधेरा हो चला था, रमा सोच रहा था, रमेश बाबू के पास चलकर दो-चार बाज़ियां खेल आऊं, मगर
बादलों को देख-देख रूक जाता था। इतने में रतन आ पहुंची। वह प्रसन्न न थी। उसकी
मुद्रा कठोर हो रही थी। आज वह लड़ने के लिए घर से तैयार होकर आई है और मुरव्वत और
मुलाहजे की कल्पना को भी कोसों दूर रखना चाहती है।
जालपा
ने कहा,
' तुम खूब आई। आज मैं भी ज़रा तुम्हारे साथ घूम आऊंगी। इन्हें काम
के बोझ से आजकल सिर उठाने की भी फुर्सत नहीं है।'
रतन
ने निष्ठुरता से कहा, 'मुझे आज तो बहुत जल्द घर लौट
जाना है। बाबूजी को कल की याद दिलाने आई हूं।'
रमा
उसका लटका हुआ मुंह देखकर ही मन में सहम रहा था। किसी तरह उसे प्रसन्न करना चाहता
था। बडी तत्परता से बोला, 'जी हां, खूब याद है, अभी सर्राफ की दुकान से चला आ रहा हूं।
रोज़ सुबह-शाम घंटे-भर हाज़िरी देता हूं, मगर इन चीज़ों में
समय बहुत लगता है। दाम तो कारीगरी के हैं। मालियत देखिए तो कुछ नहीं। दो आदमी लगे
हुए हैं, पर शायद अभी एक हीने से कम में चीज़ तैयार न हो,
पर होगी लाजवाबब जी ख़ुश हो जायगा।'
पर
रतन ज़रा भी न पिघली। तिनककर बोली, 'अच्छा! अभी
महीना-भर और लगेगा। ऐसी कारीगरी है कि तीन महीने में पूरी न हुई! आप उससे कह
दीजिएगा मेरे रूपये वापस कर दे। आशा के कंगन देवियां पहनती होंगी, मेरे लिए जरूरत नहीं!'
रमानाथ-'एक महीना न लगेगा, मैं जल्दी ही बनवा दूंगा। एक
महीना तो मैंने अंदाजन कह दिया था। अब थोड़ी ही कसर रह गई है। कई दिन तो नगीने
तलाश करने में लग गए।'
रतन-'मुझे कंगन पहनना ही नहीं है, भाई! आप मेरे रूपये
लौटा दीजिए, बस, सुनार मैंने भी बहुत
देखे हैं। आपकी दया से इस वक्त भी तीन जोड़े कंगन मेरे पास होंगे, पर ऐसी धांधली कहीं नहीं देखी। '
धांधली
के शब्द पर रमा तिलमिला उठा, 'धांधली नहीं, मेरी हिमाकत कहिए। मुझे क्या जरूरत थी कि अपनी जान संकट में डालता। मैंने
तो पेशगी रूपये इसलिए दे दिए कि सुनार खुश होकर जल्दी से बना देगा। अब आप रूपये
मांग रही हैं, सर्राफ रूपये नहीं लौटा सकता।'
रतन
ने तीव्र नजरों से देखकर कहा,क्यों, रूपये क्यों न लौटाएगा? '
रमानाथ-'इसलिए कि जो चीज़ आपके लिए बनाई है, उसे वह कहां
बेचता गिरेगा। संभव है, साल-छः महीने में बिक सके। सबकी पसंद
एक-सी तो नहीं होती।'
रतन
ने त्योरियां चढ़ाकर कहा,'मैं कुछ नहीं जानती, उसने देर की है, उसका दंड भोगे। मुझे कल या तो कंगन
ला दीजिए या रूपये। आपसे यदि सर्राफ से दोस्ती है, आप
मुलाहिजे और मुरव्वत के सबब से कुछ न कह सकते हों, तो मुझे
उसकी दुकान दिखा दीजिए।नहीं आपको शर्म आती हो तो उसका नाम बता दीजिए, मैं पता लगा लूंगी। वाह, अच्छी दिल्लगी! दुकान नीलाम
करा दूंगी। जेल भिजवा दूंगी। इन बदमाशों से लडाई के बगैर काम नहीं चलता।' रमा अप्रतिभ होकर ज़मीन की ओर ताकने लगा। वह कितनी मनहूस घड़ी थी, जब उसने रतन से रूपये लिए! बैठे-बिठाए विपत्ति मोल ली।
जालपा
ने कहा,
'सच तो है, इन्हें क्यों नहीं सर्राफ की दुकान
पर ले जाते,चीज़ आंखों से देखकर इन्हें संतोष हो जायगा।'
रतन-'मैं अब चीज़ लेना ही नहीं चाहती।'
रमा
ने कांपते हुए कहा,'अच्छी बात है, आपको रूपये कल मिल जायंगे।'
रतन-'कल किस वक्त?'
रमानाथ-'दफ्तर से लौटते वक्त लेता आऊंगा।'
रतन-'पूरे रूपये लूंगी। ऐसा न हो कि सौ-दो सौ रूपये देकर टाल दे।'
रमानाथ-'कल आप अपने सब रूपये ले जाइएगा।'
यह
कहता हुआ रमा मरदाने कमरे में आया, और रमेश
बाबू के नाम एक रूक्का लिखकर गोपी से बोला,इसे रमेश बाबू के
पास ले जाओ। जवाब लिखाते आना। फिर उसने एक दूसरा रूक्का लिखकर विश्वम्भरदास को
दिया कि माणिकदास को दिखाकर जवाब लाए। विश्वम्भर ने कहा,'पानी
आ रहा है।'
रमानाथ-'तो क्या सारी दुनिया बह जाएगी! दौड़ते हुए जाओ।'
विश्वम्भर-'और वह जो घर पर न मिलें?'
रमानाथ-'मिलेंगे। वह इस वक्त क़हीं नहीं जाते।'
आज
जीवन में पहला अवसर था कि रमा ने दोस्तों से रूपये उधार मांगे। आग्रह और विनय के
जितने शब्द उसे याद आये, उनका उपयोग किया। उसके लिए यह
बिलकुल नया अनुभव था। जैसे पत्र आज उसने लिखे, वैसे ही पत्र
उसके पास कितनी ही बार आ चुके थे। उन पत्रों को पढ़कर उसका ह्रदय कितना द्रवित हो
जाता था, पर विवश होकर उसे बहाने करने पड़ते थे। क्या रमेश
बाबू भी बहाना कर जायंगे- उनकी आमदनी ज्यादा है, ख़र्च कम,
वह चाहें तो रूपये का इंतजाम कर सकते हैं। क्या मेरे साथ इतना सुलूक
भी न करेंगे? अब तक दोनों लङके लौटकर नहीं आए। वह द्वार पर टहलने
लगा। रतन की मोटर अभी तक खड़ी थी। इतने में रतन बाहर आई और उसे टहलते देखकर भी कुछ
बोली नहीं। मोटर पर बैठी और चल दी। दोनों कहां रह गए अब तक! कहीं खेलने लगे होंगे।
शैतान तो हैं ही। जो कहीं रमेश रूपये दे दें, तो चांदी है।
मैंने दो सौ नाहक मांगे, शायद इतने रूपये उनके पास न हों।
ससुराल वालों की नोच-खसोट से कुछ रहने भी तो नहीं पाता। माणिक चाहे तो हज़ार-पांच
सौ दे सकता है, लेकिन देखा चाहिए, आज
परीक्षा हो जायगी। आज अगर इन लोगों ने रूपये न दिए, तो फिर
बात भी न पूछूंगा। किसी का नौकर नहीं हूं कि जब वह शतरंज खेलने को बुलायें तो
दौडाचला जाऊं। रमा किसी की आहट पाता, तो उसका दिल ज़ोर से
धड़कने लगता था। आखिर विश्वम्भर लौटा, माणिक ने लिखा था,आजकल बहुत तंग हूं। मैं तो तुम्हीं से मांगने वाला था। रमा ने पुर्ज़ा
फाड़कर फेंक दिया। मतलबी कहीं का! अगर सब-इंस्पेक्टर ने मांगा होता तो पुर्ज़ा
देखते ही रूपये लेकर दौड़े जाते। ख़ैर, देखा जायगा। चुंगी के
लिए माल तो आयगा ही। इसकी कसर तब निकल जायगी। इतने में गोपी भी लौटा। रमेश ने लिखा
था,मैंने अपने जीवन में दोचार नियम बना लिए हैं। और बडी
कठोरता से उनका पालन करता हूं। उनमें से एक नियम यह भी है कि मित्रों से लेन-देन
का व्यवहार न करूंगा। अभी तुम्हें अनुभव नहीं हुआ है, लेकिन
कुछ दिनों में हो जाएगा कि जहां मित्रों से लेन-देन शुरू हुआ, वहां मनमुटाव होते देर नहीं लगती। तुम मेरे प्यारे दोस्त हो, मैं तुमसे दुश्मनी नहीं करना चाहता। इसलिए मुझे क्षमा करो। रमा ने इस पत्र
को भी फाड़कर फेंक दिया और कुर्सी पर बैठकर दीपक की ओर टकटकी बांधकर देखने लगा।
दीपक उसे दिखाई देता था, इसमें संदेह है। इतनी ही एकाग्रता
से वह कदाचित आकाश की काली, अभेध मेघ-राशि की ओर ताकता! मन
की एक दशा वह भी होती है, जब आंखें खुली होती हैं और कुछ
नहीं सूझता, कान खुले रहते हैं और कुछ नहीं सुनाई देता।
अठारह
संध्या
हो गई थी,
म्युनिसिपैलिटी के अहाते में सन्नाटा छा गया था। कर्मचारी एक-एक
करके जा रहे थे। मेहतर कमरों में झाड़ू लगा रहा था। चपरासियों ने भी जूते पहनना
शुरू कर दिया था। खोंचेवाले दिनभर की बिक्री के पैसे गिन रहे थे। पर रमानाथ अपनी कुर्सी पर बैठा रजिस्टर लिख रहा
था। आज भी वह प्रातःकाल आया था, पर आज भी कोई बडा शिकार न
फंसा, वही दस रूपये मिलकर रह गए। अब अपनी आबरू बचाने का उसके
पास और क्या उपाय था! रमा ने रतन को झांसा देने की ठान ली। वह खूब जानता था कि रतन
की यह अधीरता केवल इसलिए है कि शायद उसके रूपये मैंने ख़र्च कर दिए। अगर उसे मालूम
हो जाए कि उसके रूपये तत्काल मिल सकते हैं, तो वह शांत हो
जाएगी। रमा उसे रूपये से भरी हुई थैली दिखाकर उसका संदेह मिटा देना चाहता था। वह
खजांची साहब के चले जाने की राह देख रहा था। उसने आज जान-बूझकर देर की थी। आज की
आमदनी के आठ सौ रूपये उसके पास थे। इसे वह अपने घर ले जाना चाहता था। खजांची ठीक
चार बजे उठा। उसे क्या ग़रज़ थी कि रमा से आज की आमदनी मांगता। रूपये गिनने से ही
छुट्टी मिली। दिनभर वही लिखते-लिखते और रूपये गिनते-गिनते बेचारे की कमर दुख रही
थी। रमा को जब मालूम हो गया कि खजांची साहब दूर निकल गए होंगे, तो उसने रजिस्टर बंद कर दिया और चपरासी से बोला, 'थैली
उठाओ। चलकर जमा कर आएं।'
चपरासी
ने कहा,
'खजांची बाबू तो चले गए!'
रमा
ने आखें गाड़कर कहा, 'खजांची बाबू चले गए! तुमने
मुझसे कहा क्यों नहीं- अभी कितनी दूर गए होंगे?'
चपरासी-'सड़क के नुक्कड़ तक पहुंचे होंगे।'
रमानाथ-'यह आमदनी कैसे जमा होगी?'
चपरासी-'हुकुम हो तो बुला लाऊं?'
रमानाथ-'अजी, जाओ भी, अब तक तो कहा
नहीं, अब उन्हें आधे रास्ते से बुलाने जाओगे। हो तुम भी निरे
बछिया के ताऊब आज ज्यादा छान गए थे क्या? ख़ैर, रूपये इसी दराज़ में रखे रहेंगे। तुम्हारी ज़िम्मेदारी रहेगी।'
चपरासी-'नहीं बाबू साहब, मैं यहां रूपया नहीं रखने दूंगा। सब
घड़ी बराबर नहीं जाती। कहीं रूपये उठ जायं, तो मैं बेगुनाह
मारा जाऊं। सुभीते का ताला भी तो नहीं है यहां।'
रमानाथ-'तो फिर ये रूपये कहां रक्खूं?'
चपरासी-'हुजूर, अपने साथ लेते जाएं।'
रमा
तो यह चाहता ही था। एक इक्का मंगवाया, उस पर
रूपयों की थैली रक्खी और घर चला। सोचता जाता था कि अगर रतन भभकी में आ गई, तो क्या पूछना! कह दूंगा, दो-ही-चार दिन की कसर है।
रूपये सामने देखकर उसे तसल्ली हो जाएगी।
जालपा
ने थैली देखकर पूछा,क्या कंगन न मिला?'
रमानाथ-'अभी तैयार नहीं था, मैंने समझा रूपये लेता चलूं
जिसमें उन्हें तस्कीन हो जाय।
जालपा-'क्या कहा सर्राफ ने?'
रमानाथ-'कहा क्या, आज-कल करता है। अभी रतन देवी आइ नहीं?'
जालपा-'आती ही होगी, उसे चैन कहां?'
जब
चिराग जले तक रतन न आई, तो रमा ने समझा अब न आएगी।
रूपये आल्मारी में रख दिए और घूमने चल दिया। अभी उसे गए दस मिनट भी न हुए होंगे कि
रतन आ पहुंची और आते-ही-आते बोली,कंगन तो आ गए होंगे?'
जालपा-'हां आ गए हैं, पहन लो! बेचारे कई दफा सर्राफ के पास
गए। अभागा देता ही नहीं, हीले-हवाले करता है।'
रतन-'कैसा सर्राफ है कि इतने दिन से हीले-हवाले कर रहा है। मैं जानती कि रूपये
झमेले में पड़ जाएंगे, तो देती ही क्यों। न रूपये मिलते हैं,
न कंगन मिलता है!'
रतन
ने यह बात कुछ ऐसे अविश्वास के भाव से कही कि जालपा जल उठी। गर्व से बोली,आपके रूपये रखे हुए हैं, जब चाहिए ले जाइए। अपने बस
की बात तो है नहीं। आखिर जब सर्राफ देगा, तभी तो लाएंगे?'
रतन-'कुछ वादा करता है, कब तक देगा?'
जालपा-'उसके वादों का क्या ठीक, सैकड़ों वादे तो कर चुका
है।'
रतन-'तो इसके मानी यह हैं कि अब वह चीज़ न बनाएगा?'
जालपा-'जो चाहे समझ लो!'
रतन-'तो मेरे रूपये ही दे दो, बाज आई ऐसे कंगन से।'
जालपा
झमककर उठी, आल्मारी से थैली निकाली और रतन के सामने
पटककर बोली, 'ये आपके रूपये रखे हैं, ले
जाइए।'
वास्तव
में रतन की अधीरता का कारण वही था, जो रमा ने
समझा था। उसे भ्रम हो रहा था कि इन लोगों ने मेरे रूपये ख़र्च कर डाले। इसीलिए वह
बार-बार कंगन का तकाजा करती थी। रूपये देखकर उसका भ्रम शांत हो गया। कुछ लज्जित
होकर बोली, 'अगर दो-चार दिन में देने का वादा करता हो तो
रूपये रहने दो।'
जालपा-'मुझे तो आशा नहीं है कि इतनी जल्द दे दे। जब चीज़ तैयार हो जायगी तो रूपये
मांग लिए जाएंगे।'
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