गबन: अध्याय-2.4
कोई
बस नहीं है। क्या करूं। मैं जितना चाहूं, ख़र्च करूं,
जैसे चाहूं रहूं, कभी नहीं बोलते। जो कुछ पाते
हैं, लाकर मेरे हाथ पर रख देते हैं। समझाती हूं, अब तुम्हें वकालत करने की क्या जरूरत है, आराम क्यों
नहीं करते, पर इनसे घर पर बैठे रहा नहीं जाता। केवल दो
चपातियों से नाता है। बहुत ज़िद की तो दो चार दाने अंगूर खा लिए। मुझे तो उन पर
दया आती है, अपने से जहां तक हो सकता है, उनकी सेवा करती हूं। आख़िर वह मेरे ही लिए तो अपनी जान खपा रहे हैं।'
जालपा-'ऐसे पुरूष को देवता समझना चाहिए। यहां तो एक स्त्री मरी नहीं कि दूसरा
ब्याह रच गया। तीस साल अकेले रहना सबका काम नहीं है।'
रतन-'हां बहन, हैं तो देवता ही। अब भी कभी उस स्त्री की
चर्चा आ जाती है, तो रोने लगते हैं। तुम्हें उनकी तस्वीर
दिखाऊंगी। देखने में जितने कठोर मालूम होते हैं, भीतर से
इनका ह्रदय उतना ही नरम है। कितने ही अनाथों, विधवाओं और
ग़रीबों के महीने बांधा रक्खे हैं। तुम्हारा वह कंगन तो बडा सुंदर है! '
जालपा-'हां, बडे अच्छे कारीगर का बनाया हुआ है।'
रतन-'मैं तो यहां किसी को जानती ही नहीं। वकील साहब को गहनों के लिए कष्ट देने
की इच्छा नहीं होती। मामूली सुनारों से बनवाते डर लगता है, न
जाने क्या मिला दें। मेरी सपत्नीजी के सब गहने रक्खे हुए हैं, लेकिन वह मुझे अच्छे नहीं लगते। तुम बाबू रमानाथ से मेरे लिए ऐसा ही एक
जोडाकंगन बनवा दो।'
जालपा-'देखिए, पूछती हूं।'
रतन-'-'आज तुम्हारे आने से जी बहुत ख़ुश हुआ। दिनभर अकेली पड़ी रहती हूं। जी
घबडाया करता है। किसके पास जाऊं?' किसी से परिचय नहीं और न
मेरा मन ही चाहता है कि उनसे मौी करूं। दो-एक महिलाओं को बुलाया, उनके घर गई, चाहा कि उनसे बहनापा जोड़ लूं, लेकिन उनके आचार-विचार देखकर उनसे दूर रहना ही अच्छा मालूम हुआ। दोनों ही
मुझे उल्लू बनाकर जटना चाहती थीं। मुझसे रूपये उधार ले गई और आज तक दे रही हैं।
ऋंगार की चीज़ों पर मैंने उनका इतना प्रेम देखा, कि कहते
लज्जा आती है। तुम घड़ी-आधा घड़ी के लिए रोज़ चली आया करो बहन।'
जालपा-'वाह इससे अच्छा और क्या होगा.'
रतन-'मैं मोटर भेज दिया करूंगी।'
जालपा-'क्या जरूरत है। तांगे तो मिलते ही हैं।'
रतन-'न-जाने क्यों तुम्हें छोड़ने को जी नहीं चाहता। तुम्हें पाकर रमानाथजी
अपना भाग्य सराहते होंगे।'
जालपा
ने मुस्कराकर कहा, 'भाग्य-वाग्य तो कहीं नहीं
सराहते, घुड़कियां जमाया करते हैं।'
रतन-'सच! मुझे तो विश्वास नहीं आता। लो, वह भी तो आ गए।
पूछना,ऐसा दूसरा कंगन बनवा देंगे।'
जालपा-'(रमा से) क्यों चरनदास से कहा जाए तो ऐसा कंगन कितने दिन में बना देगा! रतन
ऐसा ही कंगन बनवाना चाहती हैं।'
रमा
ने तत्परता से कहा-'हां, बना
क्यों नहीं सकता इससे बहुत अच्छे बना सकता है।-'
रतन-'इस जोड़े के क्या लिए थे? '
जालपा-'आठ सौ के थे।'
रतन-'कोई हरज़ नहीं, मगर बिलकुल ऐसा ही हो, इसी नमूने का।'
रमा-'हां-हां, बनवा दूंगा। '
रतन-
'मगर भाई, अभी मेरे पास रूपये नहीं हैं।
रूपये
के मामले में पुरूष महिलाओं के सामने कुछ नहीं कह सकता क्या वह कह सकता है, इस वक्त मेरे पास रूपये नहीं हैं। वह मर जाएगा, पर
यह उज्र न करेगा। वह कर्ज़ लेगा, दूसरों की ख़ुशामद करेगा,
पर स्त्री के सामने अपनी मजबूरी न दिखाएगा। रूपये की चर्चा को ही वह
तुच्छ समझता है। जालपा पति की आर्थिक दशा अच्छी तरह जानती थी। पर यदि रमा ने इस
समय कोई बहाना कर दिया होता, तो उसे बहुत बुरा मालूम होता।
वह मन में डर रही थी कि कहीं यह महाशय यह न कह बैठें, सर्राफ
से पूछकर कहूंगा। उसका दिल धड़क रहा था, जब रमा ने वीरता के
साथ कहा, -'हां-हां, रूपये की कोई बात
नहीं, जब चाहे दे दीजिएगा, तो वह ख़ुश
हो गई।
रतन-'तो कब तक आशा करूं? '
रमानाथ-'मैं आज ही सर्राफ से कह दूंगा, तब भी पंद्रह दिन तो
लग हीजाएंगे।'
जालपा-'अब की रविवार को मेरे ही घर चाय पीजिएगा। '
रतन
ने निमंत्रण सहर्ष स्वीकार किया और दोनों आदमी विदा हुए। घर पहुंचे, तो शाम हो गई थी। रमेश बाबू बैठे हुए थे। जालपा तो तांगे से उतरकर अंदर
चली गई, रमा रमेश बाबू के पास जाकर बोला-'क्या आपको आए देर हुई?
रमेश-'नहीं, अभी तो चला आ रहा हूं। क्या वकील साहब के यहां
गए थे?'
रमा-'जी हां, तीन रूपये की चपत पड़ गई।'
रमेश-'कोई हरज़ नहीं, यह रूपये वसूल हो जाएंगे। बडे
आदमियों से राहरस्म हो जाय तो बुरा नहीं है, बड़े-बडे काम
निकलते हैं। एक दिन उन लोगों को भी तो बुलाओ।'
रमा-'अबकी इतवार को चाय की दावत दे आया हूं।'
रमेश-'कहो तो मैं भी आ जाऊं। जानते हो न वकील साहब के एक भाई इंजीनियर हैं। मेरे
एक साले बहुत दिनों से बेकार बैठे हैं। अगर वकील साहब उसकी सिफारिश कर दें,
तो ग़रीब को जगह मिल जाय। तुम ज़रा मेरा इंट्रोडक्शन करा देना,
बाकी और सब मैं कर लूंगा। पार्टी का इंतजाम ईश्वर ने चाहा, तो ऐसा होगा कि मेमसाहब ख़ुश हो जाएंगी। चाय के सेट, शीशे के रंगीन गुलदानऔर फानूस मैं ला दूंगा। कुर्सियां, मेज़ें, फर्श सब मेरे ऊपर छोड़ दो। न कुली की जरूरत,
न मजूर की। उन्हीं मूसलचंद को रगेदूंगा।'
रमानाथ-'तब तो बडा मज़ा रहेगा। मैं तो बडी चिंता में पडा हुआ था।'
रमेश-'चिंता की कोई बात नहीं, उसी लौंडे को जोत दूंगा।
कहूंगा, जगह चाहते हो तो कारगुजारी दिखाओ। फिर देखना,
कैसी दौड़-धूप करता है।'
रमानाथ-'अभी दो-तीन महीने हुए आप अपने साले को कहीं नौकर रखा चुके हैं न?'
रमेश-'अजी, अभी छः और बाकी हैं। पूरे सात जीव हैं। ज़रा
बैठ जाओ, ज़रूरी चीज़ों की सूची बना ली जाए। आज ही से
दौड़-धूप होगी, तब सब चीजें जुटा सकूंगा। और कितने मेहमान
होंगे? '
रमानाथ-'मेम साहब होंगी, और शायद वकील साहब भी आएं।'
रमेश-'यह बहुत अच्छा किया। बहुत-से आदमी हो जाते, तो
भभ्भड़ हो जाता। हमें तो मेम साहब से काम है। ठलुओं की ख़ुशामद करने से क्या फायदा?
'
दोनों
आदमियों ने सूची तैयार की। रमेश बाबू ने दूसरे ही दिन से सामान जमा करना शुरू
किया। उनकी पहुंच अच्छे-अच्छे घरों में थी। सजावट की अच्छी-अच्छी चीज़ें बटोर लाए, सारा घर जगमगा उठा। दयानाथ भी इन तैयारियों में शरीक थे। चीज़ों को करीने
से सजाना उनका काम था। कौन गमला कहां रक्खा जाय, कौन तस्वीर
कहां लटकाई जाय, कौन?सा गलीचा कहां
बिछाया जाय, इन प्रश्नों पर तीनों मनुष्यों में घंटों
वाद-विवाद होता था। दफ्तर जाने के पहले और दफ्तर से आने के बाद तीनों इन्हीं कामों
में जुट जाते थे। एक दिन इस बात पर बहस छिड़ गई कि कमरे में आईना कहां रखा जाय।
दयानाथ कहते थे, इस कमरे में आईने की जरूरत नहीं। आईना पीछे
वाले कमरे में रखना चाहिए। रमेश इसका विरोध कर रहे थे। रमा दुविधो में चुपचाप
खडाथा। न इनकी-सी कह सकता था, न उनकी-सी।
दयानाथ-'मैंने सैकड़ों अंगरेज़ों के ड्राइंग-ईम देखे हैं, कहीं
आईना नहीं देखा। आईना ऋंगार के कमरे में रहना चाहिए। यहां आईना रखना बेतुकी-सी बात
है।'
रमेश-'मुझे सैकड़ों अंगरेज़ों के कमरों को देखने का अवसर तो नहीं मिला है,
लेकिन दो-चार जरूर देखे हैं और उनमें आईना लगा हुआ देखा। फिर क्या
यह जरूरी बात है कि इन ज़रा-ज़रा-सी बातों में भी हम अंगरेज़ों की नकल करें- हम
अंगरेज़ नहीं, हिन्दुस्तानी हैं। हिन्दुस्तानी रईसों के कमरे
में बड़े-बड़े आदमकद आईने रक्खे जाते हैं। यह तो आपने हमारे बिगड़े हुए बाबुओं
कीसी बात कही, जो पहनावे में, कमरे की
सजावट में, बोली में, चाय और शराब में,
चीनी की प्यालियों में, ग़रज़ दिखावे की सभी
बातों में तो अंगरेज़ों का मुंह चिढ़ाते हैं, लेकिन जिन
बातों ने अंगरेज़ों को अंगरेज़ बना दिया है, और जिनकी बदौलत
वे दुनिया पर राज़ करते हैं, उनकी हवा तक नहीं छू जाती। क्या
आपको भी बुढ़ापे में, अंगरेज़ बनने का शौक चर्राया है?'
दयानाथ
अंगरेजों की नकल को बहुत बुरा समझते थे। यह चाय-पार्टी भी उन्हें बुरी मालूम हो
रही थी। अगर कुछ संतोष था, तो यही कि दो-चार बडे आदमियों
से परिचय हो जायगा। उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी कोट नहीं पहना था। चाय पीते थे,
मगर चीनी के सेट की कैद न थी। कटोरा-कटोरी, गिलास,
लोटा-तसला किसी से भी उन्हें आपत्ति न थी, लेकिन
इस वक्त उन्हें अपना पक्ष निभाने की पड़ी थी। बोले, 'हिन्दुस्तानी
रईसों के कमरे में मेज़ें-कुर्सियां नहीं होतीं, फर्श होता
है। आपने कुर्सी-मेज़ लगाकर इसे अंगरेज़ी ढंग पर तो बना दिया, अब आईने के लिए हिन्दुस्तानियों की मिसाल दे रहे हैं। या तो हिन्दुस्तानी
रखिए या अंगरेज़ीब यह क्या कि आधा तीतर आधा बटेरब कोटपतलून पर चौगोशिया टोपी तो
नहीं अच्छी मालूम होती! रमेश बाबू ने समझा था कि दयानाथ की ज़बान बंद हो जायगी,
लेकिन यह जवाब सुना तो चकराए। मैदान हाथ से जाता हुआ दिखाई दिया।
बोले, 'तो आपने किसी अंगरेज़ के कमरे में आईना नहीं देखा-
भला ऐसे दस-पांच अंगरेजों के नाम तो बताइए? एक आपका वही
किरंटा हेड क्लर्क है, उसके सिवा और किसी अंगरेज़ के कमरे
में तो शायद आपने कदम भी न रक्खा हो उसी किरंटे को आपने अंगरेज़ी रूचि का आदर्श
समझ लिया है खूब! मानता हूं।'
दयानाथ-'यह तो आपकी ज़बान है, उसे किरंटा, चमरेशियन, पिलपिली जो चाहे कहें, लेकिन रंग को छोड़कर वह किसी बात में अंगरेज़ों से कम नहीं। और उसके पहले
तो योरोपियन था।
रमेश
इसका कोई जवाब सोच ही रहे थे कि एक मोटरकार द्वार पर आकर रूकी, और रतनबाई उतरकर बरामदे में आई। तीनों आदमी चटपट बाहर निकल आए। रमा को इस
वक्त रतन का आना बुरा मालूम हुआ। डर रहा था कि कहीं कमरे में भी न चली आए, नहीं तो सारी कलई खुल जाए। आगे बढ़कर हाथ मिलाता हुआ बोला, 'आइए, यह मेरे पिता हैं, और यह
मेरे दोस्त रमेश बाबू हैं, लेकिन उन दोनों सज्जनों ने न हाथ
बढ़ाया और न जगह से हिले। सकपकाए- से खड़े रहे। रतन ने भी उनसे हाथ मिलाने की
जरूरत न समझी। दूर ही से उनको नमस्कार करके रमा से बोली, 'नहीं,
बैठूंगी नहीं। इस वक्त फुरसत नहीं है। आपसे कुछ कहना था।' यह कहते हुए वह रमा के साथ मोटर तक आई और आहिस्ता से बोली, 'आपने सर्राफ से कह तो दिया होगा? '
रमा
ने निःसंकोच होकर कहा, 'जी हां, बना रहा है।'
रतन-'उस दिन मैंने कहा था, अभी रूपये न दे सकूंगी,
पर मैंने समझा शायद आपको कष्ट हो, इसलिए रूपये
मंगवा लिए। आठ सौ चाहिए न?'
जालपा
ने कंगन के दाम आठ सौ बताए थे। रमा चाहता तो इतने रूपये ले सकता था। पर रतन की
सरलता और विश्वास ने उसके हाथ पकड़ लिए। ऐसी उदार, निष्कपट
रमणी के साथ वह विश्वासघात न कर सका। वह व्यापारियों से दो-दो, चार-चार आने लेते ज़रा भी न झिझकता था। वह जानता था कि वे सब भी ग्राहकों
को उल्टे छुरे से मूंड़ते हैं। ऐसों के साथ ऐसा व्यवहार करते हुए उसकी आत्मा को
लेशमात्र भी संकोच न होता था, लेकिन इस देवी के साथ यह कपट
व्यवहार करने के लिए किसी पुराने पापी की जरूरत थी। कुछ सकुचाता हुआ बोला,क्या जालपा ने कंगन के दाम आठ सौ बतलाए थे? उसे शायद
याद न रही होगी। उसके कंगन छः सौ के हैं। आप चाहें तो आठ सौ का बनवा दूं! रतन-'नहीं, मुझे तो वही पसंद है। आप छः सौ का ही बनवाइए।'
उसने
मोटर पर से अपनी थैली उठाकर सौ-सौ रूपये के छः नोट निकाले।
रमा
ने कहा,
'ऐसी जल्दी क्या थी, चीज़ तैयार हो जाती,
तब हिसाब हो जाता।'
रतन-'मेरे पास रूपये खर्च हो जाते। इसलिए मैंने सोचा, आपके
सिर पर लाद आऊं। मेरी आदत है कि जो काम करती हूं, जल्द-से-जल्द
कर डालती हूं। विलंब से मुझे उलझन होती है।'
यह
कहकर वह मोटर पर बैठ गई, मोटर हवा हो गई। रमा संदूक
में रूपये रखने के लिए अंदर चला गया, तो दोनों वृद्ध'जनों में बातें होने लगीं।
रमेश-'देखा?'
दयानाथ-'जी हां, आंखें खुली हुई थीं। अब मेरे घर में भी वही
हवा आ रही है। ईश्वर ही बचावे।'
रमेश-'बात तो ऐसी ही है, पर आजकल ऐसी ही औरतों का काम है।
जरूरत पड़े, तो कुछ मदद तो कर सकती हैं। बीमार पड़ जाओ तो
डाक्टर को तो बुला ला सकती हैं। यहां तो चाहे हम मर जाएं, तब
भी क्या मजाल कि स्त्री घर से बाहर पांव निकाले।'
दयानाथ-'हमसे तो भाई, यह अंगरेज़ियत नहीं देखी जाती। क्या
करें। संतान की ममता है, नहीं तो यही जी चाहता है कि रमा से
साफ कह दूं, भैया अपना घर अलग लेकर रहो आंख फटी, पीर गई। मुझे तो उन मर्दो पर क्रोध आता है, जो
स्त्रियों को यों सिर चढ़ाते हैं। देख लेना, एक दिन यह औरत
वकील साहब को दगा देगी।'
रमेश-'महाशय, इस बात में मैं तुमसे सहमत नहीं हूं। यह
क्यों मान लेते हो कि जो औरत बाहर आती-जाती है, वह जरूर ही
बिगड़ी हुई है? मगर रमा को मानती बहुत है। रूपये न जाने
किसलिए दिए? '
दयानाथ-'मुझे तो इसमें कुछ गोलमाल मालूम होता है। रमा कहीं उससे कोई चाल न चल रहा
हो? '
इसी
समय रमा भीतर से निकला आ रहा था। अंतिम वाक्य उसके कान में पड़ गया। भौंहें चढ़ाकर
बोला,
'जी हां, जरूर चाल चल रहा हूं। उसे धोखा देकर
रूपये ऐंठ रहा हूं। यही तो मेरा पेशा है! '
दयानाथ
ने झेंपते हुए कहा,तो इतना बिगड़ते क्यों हो,
'मैंने तो कोई ऐसी बात नहीं कही।'
रमानाथ-'पक्का जालिया बना दिया और क्या कहते?आपके दिल में
ऐसा शुबहा क्यों आया- आपने मुझमें ऐसी कौन?सी बात देखी,
जिससे आपको यह ख़याल पैदा हुआ- मैं ज़रा साफ-सुथरे कपड़े पहनता हूं,
ज़रा नई प्रथा के अनुसार चलता हूं, इसके सिवा
आपने मुझमें कौन?सी बुराई देखी- मैं जो कुछ ख़र्च करता हूं,
ईमान से कमाकर ख़र्च करता हूं। जिस दिन धोखे और फरेब की नौबत आएगी,
ज़हर खाकर प्राण दे दूंगा। हां, यह बात है कि
किसी को ख़र्च करने की तमीज़ होती है, किसी को नहीं होती। वह
अपनी सुबुद्धि है, अगर इसे आप धोखेबाज़ी समझें, तो आपको अख्तियार है। जब आपकी तरफ से मेरे विषय में ऐसे संशय होने लगे,
तो मेरे लिए यही अच्छा है कि मुंह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाऊं।
रमेश बाबू यहां मौजूद हैं। आप इनसे मेरे विषय में जो कुछ चाहें, पूछ सकते हैं। यह मेरे खातिर झूठ न बोलेंगे।'
सत्य
के रंग में रंगी हुई इन बातों ने दयानाथ को आश्वस्त कर दिया। बोले, 'जिस दिन मुझे मालूम हो जायगा कि तुमने यह ढंग अख्तियार किया है, उसके पहले मैं मुंह में कालिख लगाकर निकल जाऊंगा। तुम्हारा बढ़ता हुआ ख़र्च
देखकर मेरे मन में संदेह हुआ था, मैं इसे छिपाता नहीं हूं,
लेकिन जब तुम कह रहे हो तुम्हारी नीयत साफ है, तो मैं संतुष्ट हूं। मैं केवल इतना ही चाहता हूं कि मेरा लड़का चाहे ग़रीब
रहे, पर नीयत न बिगाड़े। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि
वह तुम्हें सत्पथ पर रक्खे।'
रमेश
ने मुस्कराकर कहा, 'अच्छा, यह किस्सा तो हो चुका, अब यह बताओ, उसने तुम्हें रूपये किसलिए दिए! मैं गिन रहा था, छः
नोट थे, शायद सौ-सौ के थे।'
रमानाथ-'ठग लाया हूं।'
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