गबन: अध्याय-2.1
अपनापन
जाहिर होता है। हमारे मित्र समझते हैं, हमसे ज़रा
भी दुराव नहीं रखता और उन्हें हमसे सहानुभूति हो जाती है। अपनापन दिखाने की यह आदत
औरतों में कुछ अधिक होती है।
रमा
जालपा के आंसू पोंछते हुए बोला-'मैं तुमसे अप्रसन्न नहीं
हूं, प्रिये! अप्रसन्न होने की तो कोई बात ही नहीं है। आशा
का विलंब ही दुराशा है, क्या मैं इतना नहीं जानता। अगर तुमने
मुझे मना न कर दिया होता, तो अब तक मैंने किसी-न-किसी तरह
दो-एक चीजें अवश्य ही बनवा दी होतीं। मुझसे भूल यही हुई कि तुमसे सलाह ली। यह तो
वैसा ही है जैसे मेहमान को पूछ-पूछकर भोजन दिया जाय। उस वक्त मुझे यह ध्यान न रहा
कि संकोच में आदमी इच्छा होने पर भी 'नहीं-नहीं' करता है। ईश्वर ने चाहा तो तुम्हें बहुत दिनों तक इंतजार न करना पड़ेगा।'
जालपा
ने सचिंत नजरों से देखकर कहा,तो क्या उधार लाओगे?'
रमानाथ-'हां, उधार लाने में कोई हर्ज नहीं है। जब सूद नहीं
देना है, तो जैसे नगद वैसे उधार। ऋण से दुनिया का काम चलता
है। कौन ऋण नहीं लेता!हाथ में रूपया आ जाने से अलल्ले-तलल्ले खर्च हो जाते हैं।
कर्ज सिर पर सवार रहेगा, तो उसकी चिंता हाथ रोके रहेगी।'
जालपा-'मैं तुम्हें चिंता में नहीं डालना चाहती। अब मैं भूलकर भी गहनों का नाम न
लूंगी।'
रमानाथ-'नाम तो तुमने कभी नहीं लिया, लेकिन तुम्हारे नाम न
लेने से मेरे कर्तव्य का अंत तो नहीं हो जाता। तुम कर्ज से व्यर्थ इतना डरती हो
रूपये जमा होने के इंतजार में बैठा रहूंगा, तो शायद कभी न
जमा होंगे। इसी तरह लेतेदेते साल में तीन-चार चीज़ें बन जाएंगी।'
जालपा-'मगर पहले कोई छोटी-सी चीज़ लाना।'
रमानाथ-'हां, ऐसा तो करूंगा ही।'
रमा
बाज़ार चला, तो खूब अंधेरा हो गया था। दिन रहते जाता
तो संभव था, मित्रों में से किसी की निगाह उस पर पड़ जाती।
मुंशी दयानाथ ही देख लेते। वह इस मामले को गुप्त ही रखना चाहता था।
तेरह
सर्राफे
में गंगू की दुकान मशहूर थी। गंगू था तो ब्राह्मण, पर
बडा ही व्यापारकुशल! उसकी दुकान पर नित्य गाहकों का मेला लगा रहता था। उसकी
कर्मनिष्ठा गाहकों में विश्वास पैदा करती थी। और दुकानों पर ठगे जाने का भय था।
यहां किसी तरह का धोखा न था। गंगू ने रमा को देखते ही मुस्कराकर कहा, 'आइए बाबूजी, ऊपर आइए। बडी दया की। मुनीमजी, आपके वास्ते पान मंगवाओ। क्या हुक्म है बाबूजी, आप
तो जैसे मुझसे नाराज हैं। कभी आते ही नहीं, गरीबों पर भी
कभी-कभी दया किया कीजिए।'
गंगू
की शिष्टता ने रमा की हिम्मत खोल दी। अगर उसने इतने आग्रह से न बुलाया होता तो
शायद रमा को दुकान पर जाने का साहस न होता। अपनी साख का उसे अभी तक अनुभव न हुआ
था। दुकान पर जाकर बोला, 'यहां हम जैसे मजदूरों का
कहां गुज़र है, महाराज! गांठ में कुछ हो भी तो!
गंगू-'यह आप क्या कहते हैं सरकार, आपकी दुकान है, जो चीज़ चाहिए ले जाइए, दाम आगे-पीछे मिलते रहेंगे।
हम लोग आदमी पहचानते हैं बाबू साहब, ऐसी बात नहीं है। धान्य
भाग कि आप हमारी दुकान पर आए तो। दिखाऊं कोई जडाऊ चीज़? कोई
कंगन, कोई हार- अभी हाल ही में दिल्ली से माल आया है।'
रमानाथ-'कोई हलके दामों का हार दिखाइए।'
गंगू-'यही कोई सात-आठ सौ तक?'
रमानाथ-'अजी नहीं, हद चार सौ तक।'
गंगू-'मैं आपको दोनों दिखाए देता हूं। जो पसंद आवें, ले
लीजिएगा। हमारे यहां किसी तरह का दफल-गसल नहीं बाबू साहब! इसकी आप ज़रा भी चिंता न
करें। पांच बरस का लड़का हो या सौ बरस का बूढ़ा, सबके साथ एक
बात रखते हैं। मालिक को भी एक दिन मुंह दिखाना है, बाबू!'
संदूक
सामने आया, गंगू ने हार निकाल-निकालकर दिखाने शुरू
किए। रमा की आंखें खुल गई, जी लोट-पोट हो गया। क्या सगाई थी!
नगीनों की कितनी सुंदर सजावट! कैसी आब-ताब! उनकी चमक दीपक को मात करती थी। रमा ने
सोच रखा था सौ रूपये से ज्यादा उधार न लगाऊंगा, लेकिन चार सौ
वाला हार आंखों में कुछ जंचता न था। और जेब में द्दः तीन सौ रूपये थे। सोचा,
अगर यह हार ले गया और जालपा ने पसंद न किया, तो
फायदा ही क्या? ऐसी चीज़ ले जाऊं कि वह देखते ही भड़क उठे।
यह जडाऊ हार उसकी गर्दन में कितनी शोभा देगा। वह हार एक सहस्र मणि-रंजित नजरों से
उसके मन को खींचने लगा। वह अभिभूत होकर उसकी ओर ताक रहा था, पर
मुंह से कुछ कहने का साहस न होता था। कहीं गंगू ने तीन सौ रूपये उधार लगाने से
इंकार कर दिया, तो उसे कितना लज्जित होना पड़ेगा। गंगू ने
उसके मन का संशय ताड़कर कहा, 'आपके लायक तो बाबूजी यही चीज़
है, अंधेरे घर में रख दीजिए, तो उजाला
हो जाय।'
रमानाथ-'पसंद तो मुझे भी यही है, लेकिन मेरे पास कुल तीन सौ
रूपये हैं, यह समझ लीजिए।
शर्म
से रमा के मुंह पर लाली छा गई। वह धड़कते हुए ह्रदय से गंगू का मुंह देखने
लगा।गंगू ने निष्कपट भाव से कहा, 'बाबू साहब, रूपये का तो ज़िक्र ही न कीजिए। कहिए दस हज़ार का माल साथ भेज दूं। दुकान
आपकी है, भला कोई बात है? हुक्म हो,
तो एक-आधा चीज़ और दिखाऊं? एक शीशफूल अभी बनकर
आया है, बस यही मालूम होता है, गुलाब
का फल खिला हुआ है। देखकर जी खुश हो जाएगा। मुनीमजी, ज़रा वह
शीशफूल दिखाना तो। और दाम का भी कुछ ऐसा भारी नहीं, आपको ढाई
सौ में दे दूंगा।'
रमा
ने मुस्कराकर कहा, 'महाराज, बहुत बातें बनाकर कहीं उल्टे छुरे से न मूंड़ लेना, गहनों
के मामले में बिलकुल अनाड़ी हूं। '
गंगू-'ऐसा न कहो बाबूजी, आप चीज़ ले जाइए, बाज़ार में दिखा लीजिए, अगर कोई। ढाई सौ से कौड़ी कम
में दे दे, तो मैं मुफ्त दे दूंगा। शीशफूल आया, सचमुच गुलाब का फूल था, जिस पर हीरे की कलियां ओस की
बूंदों के समान चमक रही थीं। रमा की टकटकी बंध गई, मानो कोई
अलौकिक वस्तु सामने आ गई हो ।
गंगू-'बाबूजी, ढाई सौ रूपये तो कारीगर की सगाई के इनाम हैं।
यह एक चीज़ है।'
रमानाथ-'हां, है तो सुंदर, मगर भाई ऐसा
न हो, कि कल ही से दाम का तकाजा करने लगो। मैं खुद ही जहां
तक हो सकेगा, जल्दी दे दूंगा।'
गंगू
ने दोनों चीजें दो सुंदर मखमली केसों में रखकर रमा को दे दीं। फिर मुनीमजी से नाम
टंकवाया और पान खिलाकर विदा किया। रमा के मनोल्लास की इस समय सीमा न थी, किंतु यह विशुद्ध उल्लास न था, इसमें एक शंका का भी
समावेश था। यह उस बालक का आनंद न था जिसने माता से पैसे मांगकर मिठाई ली हो;
बल्कि उस बालक का, जिसने पैसे चुराकर ली हो,
उसे मिठाइयां मीठी तो लगती हैं, पर दिल कांपता
रहता है कि कहीं घर चलने पर मार न पड़ने लगे। साढ़े छः सौ रूपये चुका देने की तो
उसे विशेष चिंता न थी, घात लग जाय तो वह छः महीने में चुका
देगा। भय यही था कि बाबूजी सुनेंगे तो जरूर नाराज़ होंगे, लेकिन
ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता था, जालपा को इन आभूषणों से सुशोभित
देखने की उत्कंठा इस शंका पर विजय पाती थी। घर पहुंचने की जल्दी में उसने सड़क
छोड़ दी, और एक गली में घुस गया। सघन अंधेरा छाया हुआ था।
बादल तो उसी वक्त छाए हुए थे, जब वह घर से चला था। गली में
घुसा ही था, कि पानी की बूंद सिर पर छर्रे की तरह पड़ी। जब
तक छतरी खोले, वह लथपथ हो चुका था। उसे शंका हुई, इस अंधकारमें कोई आकर दोनों चीज़ें छीन न ले, पानी
की झरझर में कोई आवाज़ भी न सुने। अंधेरी गलियों में खून तक हो जाते हैं। पछताने
लगा, नाहक इधर से आया। दो-चार मिनट देर ही में पहुंचता,
तो ऐसी कौन-सी आफत आ जाती। असामयिक वृष्टि ने उसकी आनंद-कल्पनाओं
में बाधा डाल दी। किसी तरह गली का अंत हुआ और सड़क मिली। लालटेनें दिखाई दीं।
प्रकाश कितनी विश्वास उत्पन्न करने वाली शक्ति है, आज इसका
उसे यथार्थ अनुभव हुआ। वह घर पहुंचा तो दयानाथ बैठे हुक्का पी रहे थे। वह उस कमरे
में न गया। उनकी आंख बचाकर अंदर जाना चाहता था कि उन्होंने टोका, 'इस वक्त कहां गए थे?'
रमा
ने उन्हें कुछ जवाब न दिया। कहीं वह अख़बार सुनाने लगे, तो घंटों की खबर लेंगे। सीधा अंदर जा पहुंचा। जालपा द्वार पर खड़ी उसकी
राह देख रही थी, तुरंत उसके हाथ से छतरी ले ली और बोली,
'तुम तो बिलकुल भीग गए। कहीं ठहर क्यों न गए।'
रमानाथ-'पानी का क्या ठिकाना, रात-भर बरसता रहे।'
यह
कहता हुआ रमा ऊपर चला गया। उसने समझा था, जालपा भी
पीछेपीछे आती होगी, पर वह नीचे बैठी अपने देवरों से बातें कर
रही थी, मानो उसे गहनों की याद ही नहीं है। जैसे वह बिलकुल भूल
गई है कि रमा सर्राफे से आया है। रमा ने कपड़े बदले और मन में झुंझलाता हुआ नीचे
चला आया। उसी समय दयानाथ भोजन करने आ गए। सब लोग भोजन करने बैठ गए। जालपा ने ज़ब्त
तो किया था, पर इस उत्कंठा की दशा में आज उससे कुछ खाया न
गया। जब वह ऊपर पहुंची, तो रमा चारपाई पर लेटा हुआ था। उसे
देखते ही कौतुक से बोला, 'आज सर्राफे का जाना तो व्यर्थ ही
गया। हार कहीं तैयार ही न था। बनाने को कह आया हूं। जालपा की उत्साह से चमकती हुई
मुख-छवि मलिन पड़ गई, बोली, 'वह तो
पहले ही जानती थी। बनते-बनते पांच-छः महीने तो लग ही जाएंगे।'
रमानाथ-'नहीं जी, बहुत जल्द बना देगा, कसम
खा रहा था।'
जालपा-'ऊह, जब चाहे दे! '
उत्कंठा
की चरम सीमा ही निराशा है। जालपा मुंह उधरकर लेटने जा रही थी, कि रमा ने ज़ोर से कहकहा मारा। जालपा चौंक पड़ी। समझ गई, रमा ने शरारत की थी। मुस्कराती हुई बोली, 'तुम भी
बडे नटखट हो क्या लाए?
रमानाथ-' कैसा चकमा दिया?'
जालपा-'यह तो मरदों की आदत ही है, तुमने नई बात क्या की?'
जालपा
दोनों आभूषणों को देखकर निहाल हो गई। ह्रदय में आनंद की लहरें-सी उठने लगीं। वह
मनोभावों को छिपाना चाहती थी कि रमा उसे ओछी न समझे, लेकिन
एक-एक अंग खिल जाता था। मुस्कराती हुई आंखें, दमकते हुए कपोल
और खिले हुए अधर उसका भरम गंवाए देते थे। उसने हार गले में पहना, शीशफल जूड़े में सजाया और हर्ष से उन्मत्त होकर बोली, 'तुम्हें आशीर्वाद देती हूं, ईश्वर तुम्हारी सारी
मनोकामनाएं पूरी करे।' आज जालपा की वह अभिलाषा पूरी हुई,
जो बचपन ही से उसकी कल्पनाओं का एक स्वप्न, उसकी
आशाओं का क्रीडास्थल बनी हुई थी। आज उसकी वह साध पूरी हो गई। यदि मानकी यहां होती,
तो वह सबसे पहले यह हार उसे दिखाती और कहती, 'तुम्हारा
हार तुम्हें मुबारक हो! '
रमा
पर घड़ों नशा चढ़ा हुआ था। आज उसे अपना जीवन सफल जान पड़ा। अपने जीवन में आज पहली
बार उसे विजय का आनंद प्राप्त हुआ। जालपा ने पूछा, 'जाकर
अम्मांजी को दिखा आऊं?
रमा
ने नम्रता से कहा, 'अम्मां को क्या दिखाने
जाओगी। ऐसी कौन-सी बडी चीज़ें हैं।
जालपा-'अब मैं तुमसे साल-भर तक और किसी चीज़ के लिए न कहूंगी। इसके रूपये देकर ही
मेरे दिल का बोझ हल्का होगा।'
रमा
गर्व से बोला, 'रूपये की क्या चिंता! हैं ही कितने! '
जालपा-'ज़रा अम्मांजी को दिखा आऊं, देखें क्या कहती हैं! '
रमानाथ-'मगर यह न कहना, उधार लाए हैं।'
जालपा
इस तरह दौड़ी हुई नीचे गई, मानो उसे वहां कोई निधि मिल
जायगी।
आधी
रात बीत चुकी थी। रमा आनंद की नींद सो रहा था। जालपा ने छत पर आकर एक बार आकाश की
ओर देखा। निर्मल चांदनी छिटकी हुई थी,वह कार्तिक
की चांदनी जिसमें संगीत की शांति हैं, शांति का माधुर्य और
माधुर्य का उन्मादब जालपा ने कमरे में आकर अपनी संदूकची खोली और उसमें से वह कांच
का चन्द्रहार निकाला जिसे एक दिन पहनकर उसने अपने को धन्य माना था। पर अब इस नए
चन्द्रहार के सामने उसकी चमक उसी भांति मंद पड़ गई थी, जैसे
इस निर्मल चन्द्रज्योति के सामने तारों का आलोकब उसने उस नकली हार को तोड़ डाला और
उसके दानों को नीचे गली में गेंक दिया, उसी भांति जैसे पूजन
समाप्त हो जाने के बाद कोई उपासक मिट्टी की मूर्तियों को जल में विसर्जित कर देता
है।
चौदह
उस
दिन से जालपा के पति-स्नेह में सेवा-भाव का उदय हुआ। वह स्नान करने जाता, तो उसे अपनी धोती चुनी हुई मिलती। आले पर तेल और साबुन भी रक्खा हुआ पाता।
जब दफ्तर जाने लगता, तो जालपा उसके कपड़े लाकर सामने रख
देती। पहले पान मांगने पर मिलते थे, अब ज़बरदस्ती खिलाए जाते
थे। जालपा उसका रूख देखा करती। उसे कुछ कहने की जरूरत न थी। यहां तक कि जब वह भोजन
करने बैठता, तो वह पंखा झला करती। पहले वह बडी अनिच्छा से
भोजन बनाने जाती थी और उस पर भी बेगार-सी टालती थी। अब बडे प्रेम से रसोई में
जाती। चीजें अब भी वही बनती थीं, पर उनका स्वाद बढ़गया था।
रमा को इस मधुर स्नेह के सामने वह दो गहने बहुत ही तुच्छ जंचते थे।
उधर
जिस दिन रमा ने गंगू की दुकान से गहने ख़रीदे, उसी दिन
दूसरे सर्राफों को भी उसके आभूषण-प्रेम की सूचना मिल गई। रमा जब उधर से निकलता,
तो दोनों तरफ से दुकानदार उठ-उठकर उसे सलाम करते, 'आइए बाबूजी, पान तो खाते जाइए। दो-एक चीज़ें हमारी
दुकान से तो देखिए।'
रमा
का आत्म-संयम उसकी साख को और भी बढ़ाता था। यहां तक कि एक दिन एक दलाल रमा के घर
पर आ पहुंचा, और उसके नहीं-नहीं करने पर भी अपनी
संदूकची खोल ही दी।
रमा
ने उससे पीछा छुडाने के लिए कहा, 'भाई, इस वक्त मुझे कुछ नहीं लेना है। क्यों अपना और मेरा समय नष्ट करोगे। दलाल
ने बडे विनीत भाव से कहा, 'बाबूजी, देख
तो लीजिए। पसंद आए तो लीजिएगा, नहीं तो न लीजिएगा। देख लेने
में तो कोई हर्ज नहीं है। आखिर रईसों के पास न जायं, तो
किसके पास जायं। औरों ने आपसे गहरी रकमें मारीं, हमारे भाग्य
में भी बदा होगा, तो आपसे चार पैसा पा जाएंगे। बहूजी और
माईजी को दिखा लीजिए! मेरा मन तो कहता है कि आज आप ही के हाथों बोहनी होगी।'
रमानाथ-'औरतों के पसंद की न कहो, चीज़ें अच्छी होंगी ही।
पसंद आते क्या देर लगती है, लेकिन भाई, इस वक्त हाथ ख़ाली है।'
दलाल
हंसकर बोला, 'बाबूजी, बस ऐसी बात
कह देते हैं कि वाह! आपका हुक्म हो जाय तो हज़ार-पांच सौ आपके ऊपर निछावर कर दें।
हम लोग आदमी का मिज़ाज देखते हैं, बाबूजी! भगवान् ने चाहा तो
आज मैं सौदा करके ही उठूंगा।'
दलाल
ने संदूकची से दो चीज़ें निकालीं, एक तो नए फैशन का जडाऊ
कंगन था और दूसरा कानों का रिंग दोनों ही चीजें अपूर्व थीं। ऐसी चमक थी मानो दीपक
जल रहा हो दस बजे थे, दयानाथ दफ्तर जा चुके थे, वह भी भोजन करने जा रहा था। समय बिलकुल न था, लेकिन
इन दोनों चीज़ों को देखकर उसे किसी बात की सुध ही न रही। दोनों केस लिये हुए घर
में आया। उसके हाथ में केस देखते ही दोनों स्त्रियां टूट पड़ीं और उन चीज़ों को
निकाल-निकालकर देखने लगीं। उनकी चमक-दमक ने उन्हें ऐसा मोहित कर लिया कि गुण-दोष
की विवेचना करने की उनमें शक्ति ही न रही।
जागेश्वरी-'आजकल की चीज़ों के सामने तो पुरानी चीज़ें कुछ जंचती ही नहीं।
जालपा-'मुझे तो उन पुरानी चीज़ों को देखकर कै आने लगती है। न जाने उन दिनों औरतें
कैसे पहनती थीं।'
रमा
ने मुस्कराकर कहा,'तो दोनों चीज़ें पसंद हैं न?'
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