गबन: अध्याय-2.3
पन्द्रह
जालपा
अब वह एकांतवासिनी रमणी न थी, जो दिन-भर मुंह लपेटे
उदास पड़ी रहती थी। उसे अब घर में बैठना अच्छा नहीं लगता था। अब तक तो वह मजबूर थी,
कहीं आ-जा न सकती थी। अब ईश्वर की दया से उसके पास भी गहने हो गए
थे। फिर वह क्यों मन मारे घर में पड़ी रहती। वस्त्राभूषण कोई मिठाई तो नहीं जिसका
स्वाद एकांत में लिया जा सके। आभूषणों को संदूकची में बंद करके रखने से क्या
फायदा। मुहल्ले या बिरादरी में कहीं से बुलावा आता, तो वह
सास के साथ अवश्य जाती। कुछ दिनों के बाद सास की जरूरत भी न रही। वह अकेली
आने-जाने लगी। फिर कार्य-प्रयोजन की कैद भी नहीं रही। उसके रूप-लावण्य, वस्त्र-आभूषण और शील-विनय ने मुहल्ले की स्त्रियों में उसे जल्दी ही
सम्मान के पद पर पहुंचा दिया। उसके बिना मंडली सूनी रहती थी। उसका कंठ-स्वर इतना
कोमल था, भाषण इतना मधुर, छवि इतनी
अनुपम कि वह मंडली की रानी मालूम होती थी। उसके आने से मुहल्ले के नारी-जीवन
में
जान-सी पड़ गई। नित्य ही कहीं-न-कहीं जमाव हो जाता। घंटे-दो घंटे गा- बजाकर या
गपशप करके रमणियां दिल बहला लिया करतीं।कभी किसी के घर, कभी किसी के घर, गागुन में पंद्रह दिन बराबर गाना
होता रहा। जालपा ने जैसा रूप पाया था, वैसा ही उदार ह्रदय भी
पाया था। पान-पत्तों का ख़र्च प्रायः उसी के मत्थे पड़ता। कभी-कभी गायनें बुलाई
जातीं, उनकी सेवा-सत्कार का भार उसी पर था। कभी-कभी वह
स्त्रियों के साथ गंगा-स्नान करने जाती, तांगे का किराया और
गंगा-तट पर जलपान का ख़र्च भी उसके मत्थे जाता। इस तरह उसके दो-तीन रूपये रोज़ उड़
जाते थे। रमा आदर्श पति था। जालपा अगर मांगती तो प्राण तक उसके चरणों पर रख देता।
रूपये की हैसियत ही क्या थी? उसका मुंह जोहता रहता था। जालपा
उससे इन जमघटों की रोज़ चर्चा करती। उसका स्त्री-समाज में कितना आदर-सम्मान है,
यह देखकर वह फूला न समाता था।
एक
दिन इस मंडली को सिनेमा देखने की धुन सवार हुई। वहां की बहार देखकर सब-की-सब मुग्ध
हो गई। फिर तो आए दिन सिनेमा की सैर होने लगी। रमा को अब तक सिनेमा का शौक न था।
शौक होता भी तो क्या करता। अब हाथ में पैसे आने लगे थे, उस पर जालपा का आग्रह, फिर भला वह क्यों न जाता-
सिनेमा-गृह में ऐसी कितनी ही रमणियां मिलतीं, जो मुंह खोले
निसंकोच हंसती-बोलती रहती थीं। उनकी आज़ादी गुप्तरूप से जालपा पर भी जादू डालती
जाती थी। वह घर से बाहर निकलते ही मुंह खोल लेती, मगर
संकोचवश परदेवाली स्त्रियों के ही स्थान पर बैठती। उसकी कितनी इच्छा होती कि रमा
भी उसके साथ बैठता। आख़िर वह उन फैशनेबुल औरतों से किस बात में कम है? रूप-रंग में वह हेठी नहीं। सजधज में किसी से कम नहीं। बातचीत करने में
कुशल। फिर वह क्यों परदेवालियों के साथ बैठे। रमा बहुत शिक्षित न होने पर भी देश
और काल के प्रभाव से उदार था। पहले तो वह परदे का ऐसा अनन्य भक्त था, कि माता को कभी गंगा-स्नान कराने लिवा जाता, तो
पंडों तक से न बोलने देता। कभी माता की हंसी मर्दाने में सुनाई देती, तो आकर बिगड़ता, तुमको ज़रा भी शर्म नहीं है अम्मां!
बाहर लोग बैठे हुए हैं, और तुम हंस रही हो, मां लज्जित हो जाती थीं। किंतु अवस्था के साथ रमा का यह लिहाज़ ग़ायब होता
जाता था। उस पर जालपा की रूप-छटा उसके साहस को और भी उभोजित करती थी। जालपा रूपहीन,
काली-कलूटी, फूहड़ होती तो वह ज़बरदस्ती उसको
परदे में बैठाता। उसके साथ घूमने या बैठने में उसे शर्म आती। जालपा-जैसी अनन्य
सुंदरी के साथ सैर करने में आनंद के साथ गौरव भी तो था। वहां के सभ्य समाज की कोई
महिला रूप, गठन और ऋंगारमें जालपा की बराबरी न कर सकती थी।
देहात की लडकी होने पर भी शहर के रंग में वह इस तरह रंग गई थी, मानो जन्म से शहर ही में रहती आई है। थोड़ी-सी कमी अंग्रेज़ी शिक्षा की थी,उसे भी रमा पूरी किए देता था। मगर परदे का यह बंधन टूटे कैसे। भवन में रमा
के कितने ही मित्र, कितनी ही जान - पहचान के लोग बैठे नज़र
आते थे। वे उसे जालपा के साथ बैठे देखकर कितना हंसेंगे। आख़िर एक दिन उसने समाज के
सामने ताल ठोंककर खड़े हो जाने का निश्चय कर ही लिया। जालपा से बोला, 'आज हम-तुम सिनेमाघर में साथ बैठेंगे।'
जालपा
के ह्रदय में गुदगुदी-सी होने लगी। हार्दिक आनंद की आभा चेहरे पर झलक उठी। बोली, 'सच! नहीं भाई, साथवालियां जीने न देंगी।'
रमानाथ-'इस तरह डरने से तो फिर कभी कुछ न होगा। यह क्या स्वांग है कि स्त्रियां
मुंह छिपाए चिक की आड़ में बैठी रहें।'
इस
तरह यह मामला भी तय हो गया। पहले दिन दोनों झेंपते रहे, लेकिन दूसरे दिन से हिम्मत खुल गई। कई दिनों के बाद वह समय भी आया कि रमा
और जालपा संध्या समय पार्क में साथ-साथ टहलते दिखाई दिए।
जालपा
ने मुस्कराकर कहा,'कहीं बाबूजी देख लें तो?'
रमानाथ-'तो क्या, कुछ नहीं।'
जालपा-'मैं तो मारे शर्म के गड़ जाऊं।'
रमानाथ-अभी
तो मुझे भी शर्म आएगी, मगर बाबूजी ख़ुद ही इधर न
आएंगे।'
जालपा-'और जो कहीं अम्मांजी देख लें!'
रमानाथ-'अम्मां से कौन डरता है, दो दलीलों में ठीक कर दूंगा।'
दस
ही पांच दिन में जालपा ने नए महिला-समाज में अपना रंग जमा लिया। उसने इस समाज में
इस तरह प्रवेश किया, जैसे कोई कुशल वक्ता पहली बार
परिषद के मंच पर आता है। विद्वान लोग उसकी उपेक्षा करने की इच्छा होने पर भी उसकी
प्रतिभा के सामने सिर झुका देते हैं। जालपा भी 'आई, देखा और विजय कर लिया।' उसके सौंदर्य में वह गरिमा,
वह कठोरता, वह शान, वह
तेजस्विता थी जो कुलीन महिलाओं के लक्षण हैं। पहले ही दिन एक महिला ने जालपा को
चाय का निमांण दे दिया और जालपा इच्छा न रहने पर भी उसे अस्वीकार न कर सकी। जब
दोनों प्राणी वहां से लौटे, तो रमा ने चिंतित स्वर में कहा,
'तो कल इसकी चाय-पार्टी में जाना पड़ेगा?'
जालपा-'क्या करती- इंकार करते भी तो न बनता था! '
रमानाथ-'तो सबेरे तुम्हारे लिए एक अच्छी-सी साड़ी ला दूं? '
जालपा-'क्या मेरे पास साड़ी नहीं है, ज़रा देर के लिए
पचास-साठ रूपये खर्च करने से फायदा! '
रमानाथ-'तुम्हारे पास अच्छी साड़ी कहां है। इसकी साड़ी तुमने देखी?ऐसी ही तुम्हारे लिए भी लाऊंगा।'
जालपा
ने विवशता के भाव से कहा,मुझे साफ कह देना चाहिए था कि
फुरसत नहीं है।'
रमानाथ-'फिर इनकी दावत भी तो करनी पडेगी।'
जालपा-'यह तो बुरी विपत्ति गले पड़ी।'
रमानाथ-'विपत्ति कुछ नहीं है, सिर्फ यही ख़याल है कि मेरा
मकान इस काम के लायक नहीं। मेज़, कुर्सियां, चाय के सेट रमेश के यहां से मांग लाऊंगा, लेकिन घर
के लिए क्या करूं ! '
जालपा-'क्या यह ज़रूरी है कि हम लोग भी दावत करें?'
रमा
ने ऐसी बात का कुछ उत्तर न दिया। उसे जालपा के लिए एक जूते की जोड़ी और सुंदर कलाई
की घड़ी की फिक्र पैदा हो गई। उसके पास कौड़ी भी न थी। उसका ख़र्च रोज़ बढ़ता जाता
था। अभी तक गहने वालों को एक पैसा भी देने की नौबत न आई थी। एक बार गंगू महाराज ने
इशारे से तकाजा भी किया था, लेकिन यह भी तो नहीं हो सकता
कि जालपा फटे हालों चाय- पार्टी में जाय। नहीं, जालपा पर वह
इतना अन्याय नहीं कर सकता इस अवसर पर जालपा की रूप-शोभा का सिक्का बैठ जायगा। सभी
तो आज चमाचम साडियां पहने हुए थीं। जडाऊ कंगन और मोतियों के हारों की भी तो कमी न
थी, पर जालपा अपने सादे आवरण में उनसे कोसों आगे थी। उसके
सामने एक भी नहीं जंचती थी। यह मेरे पूर्व कर्मो का फल है कि मुझे ऐसी सुंदरी
मिली। आख़िर यही तो खाने-पहनने और जीवन का आनंद उठाने के दिन हैं। जब जवानी ही में
सुख न उठाया, तो बुढ़ापे में क्या कर लेंगे! बुढ़ापे में मान
लिया धन हुआ ही तो क्या यौवन बीत जाने पर विवाह किस काम का- साड़ी और घड़ी लाने की
उसे धुन सवार हो गई। रातभर तो उसने सब्र किया। दूसरे दिन दोनों चीजें लाकर ही दम
लिया। जालपा ने झुंझलाकर कहा, 'मैंने तो तुमसे कहा था कि इन
चीज़ों का काम नहीं है। डेढ़सौ से कम की न होंगी?
रमानाथ-'डेढ़सौ! इतना फजूल-ख़र्च मैं नहीं हूं।'
जालपा-'डेढ़सौ से कम की ये चीज़ें नहीं हैं।'
जालपा
ने घड़ी कलाई में बांधा ली और साड़ी को खोलकर मंत्रमुग्ध नजरों से देखा।
रमानाथ-'तुम्हारी कलाई पर यह घड़ी कैसी खिल रही है! मेरे रूपये वसूल हो गए।
जालपा-'सच बताओ, कितने रूपये ख़र्च हुए?
रमानाथ-'सच बता दूं- एक सौ पैंतीस रूपये। पचहत्तर रूपये की साड़ी, दस के जूते और पचास की घड़ी।'
जालपा-'यह डेढ़सौ ही हुए। मैंने कुछ बढ़ाकर थोड़े कहा था, मगर
यह सब रूपये अदा कैसे होंगे? उस चुडै।ल ने व्यर्थ ही मुझे
निमांण दे दिया। अब मैं बाहर जाना ही छोड़ दूंगी।'
रमा
भी इसी चिंता में मग्न था, पर उसने अपने भाव को प्रकट
करके जालपा के हर्ष में बाधा न डाली। बोला,सब अदा हो जायगा।
जालपा ने तिरस्कार के भाव से कहां,कहां से अदा हो जाएगा,
ज़रा सुनूं। कौड़ी तो बचती नहीं, अदा कहां से
हो जायगा? वह तो कहो बाबूजी घर का ख़र्च संभाले हुए हैं,
नहीं तो मालूम होता। क्या तुम समझते हो कि मैं गहने और साडियों पर
मरती हूं? इन चीज़ों को लौटा आओ। रमा ने प्रेमपूर्ण नजरों से
कहा, 'इन चीज़ों को रख लो। फिर तुमसे बिना पूछे कुछ न
लाऊंगा।'
संध्या
समय जब जालपा ने नई साड़ी और नए जूते पहने, घड़ी कलाई
पर बांधी और आईने में अपनी सूरत देखी, तो मारे गर्व और
उल्लास के उसका मुखमंडल प्रज्वलित हो उठा। उसने उन चीज़ों के लौटाने के लिए सच्चे
दिल से कहा हो, पर इस समय वह इतना त्याग करने को तैयार न थी।
संध्या समय जालपा और रमा छावनी की ओर चले। महिला ने केवल बंगले का नंबर बतला दिया
था। बंगला आसानी से मिल गया। गाटक पर साइनबोर्ड था,'इन्दुभूषण,
ऐडवोकेट, हाईकोर्ट' अब
रमा को मालूम हुआ कि वह महिला पं. इन्दुभूषण की पत्नी थी। पंडितजी काशी के नामी
वकील थे। रमा ने उन्हें कितनी ही बार देखा था, पर इतने बडे
आदमी से परिचय का सौभाग्य उसे कैसे होता! छः महीने पहले वह कल्पना भी न कर सकता था,
कि किसी दिन उसे उनके घर निमंत्रित होने का गौरव प्राप्त होगा,
पर जालपा की बदौलत आज वह अनहोनी बात हो गई। वह काशी के बडे वकील का
मेहमान था। रमा ने सोचा था कि बहुत से स्त्री-पुरूष निमंत्रित होंगे, पर यहां वकील साहब और उनकी पत्नी रतन के सिवा और कोई न था। रतन इन दोनों
को देखते ही बरामदे में निकल आई और उनसे हाथ मिलाकर अंदर ले गई और अपने पति से
उनका परिचय कराया। पंडितजी ने आरामकुर्सी पर लेटे-ही-लेटे दोनों मेहमानों से हाथ
मिलाया और मुस्कराकर कहा, 'क्षमा कीजिएगा बाबू साहब, मेरा स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। आप यहां किसी आफिस में हैं?'
रमा
ने झेंपते हुए कहा,'जी हां, म्युनिसिपल आफिस में हूं। अभी हाल ही में आया हूं। कानून की तरफ जाने का
इरादा था, पर नए वकीलों की यहां जो हालत हो रही है, उसे देखकर हिम्मत न पड़ी। '
रमा
ने अपना महत्व बढ़ाने के लिए ज़रा-सा झूठ बोलना अनुचित न समझा। इसका असर बहुत
अच्छा हुआ। अगर वह साफ कह देता, 'मैं पच्चीस रूपये का
क्लर्क हूं, तो शायद वकील साहब उससे बातें करने में अपना
अपमान समझते। बोले, 'आपने बहुत अच्छा किया जो इधर नहीं आए।
वहां दो-चार साल के बाद अच्छी जगह पर पहुंच जाएंगे, यहां
संभव है दस साल तक आपको कोई मुकदमा ही न मिलता।'
जालपा
को अभी तक संदेह हो रहा था कि रतन वकील साहब की बेटी है या पत्नी वकील साहब की
उम्र साठ से नीचे न थी। चिकनी चांद आसपास के सफेद बालों के बीच में वारनिश की हुई
लकड़ी की भांति चमक रही थी। मूंछें साफ थीं, पर माथे की
शिकन और गालों की झुर्रियां बतला रही थीं कि यात्री संसार-यात्रा से थक गया है।
आरामकुर्सी पर लेटे हुए वह ऐसे मालूम होते थे, जैसे बरसों के
मरीज़ हों! हां, रंग गोरा था, जो साठ
साल की गर्मीसर्दी खाने पर भी उड़ न सका था। ऊंची नाक थी, ऊंचा
माथा और बडी-बडी आंखें, जिनमें अभिमान भरा हुआ था! उनके मुख
से ऐसा भासित होता था कि उन्हें किसी से बोलना या किसी बात का जवाब देना भी अच्छा
नहीं लगता। इसके प्रतिकूल रतन सांवली, सुगठित युवती थी,
बडी मिलनसार, जिसे गर्व ने छुआ तक न था।
सौंदर्य का उसके रूप में कोई लक्षण न था। नाक चिपटी थी, मुख
गोल, आंखें छोटी, फिर भी वह रानी-सी
लगती थी। जालपा उसके सामने ऐसी लगती थी, जैसे सूर्यमूखी के
सामने जूही का फूल। चाय आई। मेवे, फल, मिठाई,
बर्ग की कुल्फी, सब मेज़ों पर सजा दिए गए। रतन
और जालपा एक मेज़ पर बैठीं। दूसरी मेज़ रमा और वकील साहब की थी। रमा मेज़ के सामने
जा बैठा, मगर वकील साहब अभी आरामकुर्सी पर लेटे ही हुए थे।
रमा
ने मुस्कराकर वकील साहब से कहा, 'आप भी तो आएं। '
वकील
साहब ने लेटे-लेटे मुस्कराकर कहा, 'आप शुरू कीजिए, मैं भी आया जाता हूं।'
लोगों
ने चाय पी, फल खाए, पर वकील
साहब के सामने हंसते-बोलते रमा और जालपा दोनों ही झिझकते थे। जिंदादिल बूढ़ों के
साथ तो सोहबत का आनंद उठाया जा सकता है, लेकिन ऐसे रूखे,
निर्जीव मनुष्य जवान भी हों, तो दूसरों को
मुर्दा बना देते हैं। वकील साहब ने बहुत आग्रह करने पर दो घूंट चाय पी। दूर से
बैठे तमाशा देखते रहे। इसलिए जब रतन ने जालपा से कहा,चलो,
हम लोग ज़रा बाग़ीचे की सैर करें, इन दोनों
महाशयों को समाज और नीति की विवेचना करने दें, तो मानो जालपा
के गले का गंदा छूट गया। रमा ने पिंजड़े में बंद पक्षी की भांति उन दोनों को कमरे
से निकलते देखा और एक लंबी सांस ली। वह जानता कि यहां यह विपत्ति उसके सिर पड़
जायगी, तो आने का नाम न लेता।
वकील
साहब ने मुंह सिकोड़कर पहलू बदला और बोले, 'मालूम नहीं,
पेट में क्या हो गया है, कि कोई चीज़ हज़म ही
नहीं होती। दूध भी नहीं हज़म होता। चाय को लोग न जाने क्यों इतने शौक से पीते हैं,
मुझे तो इसकी सूरत से भी डर लगता है। पीते ही बदन में ऐंठन-सी होने
लगती है और आंखों से चिनगारियां-सी निकलने लगती हैं।'
रमा
ने कहा,
'आपने हाज़मे की कोई दवा नहीं की? '
वकील
साहब ने अरूचि के भाव से कहा, 'दवाओं पर मुझे रत्ती-भर
भी विश्वास नहीं। इन वैद्य और डाक्टरों से ज्यादा बेसमझ आदमी संसार में न मिलेंगे।
किसी में निदान की शक्ति नहीं। दो वैद्यों, दो डाक्टरों के
निदान कभी न मिलेंगे। लक्षण वही है, पर एक वैद्य रक्तदोष
बतलाता है, दूसरा पित्तदोष, एक डाक्टर
फेफड़े का सूजन बतलाता है, दूसरा आमाशय का विकार। बस,
अनुमान से दवा की जाती है और निर्दयता से रोगियों की गर्दन पर छुरी
ट्ठरी जाती है। इन डाक्टरों ने मुझे तो अब तक जहन्नुम पहुंचा दिया होता; पर मैं उनके पंजे से निकल भागा। योगाभ्यास की बडी प्रशंसा सुनता हूं पर
कोई ऐसे महात्मा नहीं मिलते, जिनसे कुछ सीख सकूं। किताबों के
आधार पर कोई क्रिया करने से लाभ के बदले हानि होने का डर रहता है। यहां तो
आरोग्य-शास्त्र का खंडन हो रहा था, उधार दोनों महिलाओं में
प्रगाढ़स्नेह की बातें हो रही थीं।
रतन
ने मुस्कराकर कहा, 'मेरे पतिदेव को देखकर
तुम्हें बडा आश्चर्य हुआ होगा। '
जालपा
को आश्चर्य ही नहीं, भम्र भी हुआ था। बोली,
'वकील साहब का दूसरा विवाह होगा।
रतन, 'हां, अभी पांच ही बरस तो हुए हैं। इनकी पहली स्त्री
को मरे पैंतीस वर्ष हो गए। उस समय इनकी अवस्था कुल पच्चीस साल की थी। लोगों ने
समझाया, दूसरा विवाह कर लो, पर इनके एक
लड़का हो चुका था, विवाह करने से इंकार कर दिया और तीस साल
तक अकेले रहे, मगर आज पांच वर्ष हुए, जवान
बेटे का देहांत हो गया, तब विवाह करना आवश्यक हो गया। मेरे
मां-बाप न थे। मामाजी ने मेरा पालन किया था। कह नहीं सकती, इनसे
कुछ ले लिया या इनकी सज्जनता पर मुग्ध हो गए। मैं तो समझती हूं, ईश्वर की यही इच्छा थी, लेकिन मैं जब से आई हूं,
मोटी होती चली जाती हूं। डाक्टरों का कहना है कि तुम्हें संतान नहीं
हो सकती। बहन, मुझे तो संतान की लालसा नहीं है, लेकिन मेरे पति मेरी दशा देखकर बहुत दुखी रहते हैं। मैं ही इनके सब रोगों
की जड़ हूं। आज ईश्वर मुझे एक संतान दे दे, तो इनके सारे रोग
भाग जाएंगे। कितना चाहती हूं कि दुबली हो जाऊं, गरम पानी से
टब-स्नान करती हूं, रोज़ पैदल घूमने जाती हूं, घी-दूध कम खाती हूं, भोजन आधा कर दिया है, जितना परिश्रम करते बनता है, करती हूं, फिर भी दिन-दिन मोटी ही होती जाती हूं। कुछ समझ में नहीं आता, क्या करूं।
जालपा-'वकील साहब तुमसे चिढ़ते होंगे? '
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