गबन: अध्याय-5.2
मैं
बहादुर नहीं हूं,बहुत ही कमज़ोर आदमी हूं।
हमेशा ख़तरे के सामने मेरा हौसला पस्त हो जाता है, लेकिन
मेरी बेगैरती भी यह चोट नहीं सह सकती।'
ज़ोहरा
वेश्या थी, उसको अच्छे-बुरे सभी तरह के आदमियों से
साबिका पड़ चुका था। उसकी आंखों में आदमियों की परख थी। उसको इस परदेशी युवक में
और अन्य व्यक्तियों में एक बडा फर्क दिखाई देता था ।पहले वह यहां भी पैसे की गुलाम
बनकर आई थी, लेकिन दो-चार दिन के बाद ही उसका मन रमा की ओर आकर्षित
होने लगा। प्रौढ़ा स्त्रियां अनुराग की अवहेलना नहीं कर सकतीं। रमा में और सब दोष
हों, पर अनुराग था। इस जीवन में ज़ोहरा को यह पहला आदमी ऐसा
मिला था जिसने उसके सामने अपना ह्रदय खोलकर रख दिया, जिसने
उससे कोई परदा न रक्खा। ऐसे अनुराग रत्न को वह खोना नहीं चाहती थी। उसकी बात सुनकर
उसे ज़रा भी ईर्ष्या न हुई,बल्कि उसके मन में एक स्वार्थमय
सहानुभूति उत्पन्न हुई। इस युवक को, जो प्रेम के विषय में
इतना सरल था, वह प्रसन्न करके हमेशा के लिए अपना गुलाम बना
सकती थी। उसे जालपा से कोई शंका न थी। जालपा कितनी ही रूपवती क्यों न हो, ज़ोहरा अपने कला-कौशल से, अपने हाव-भाव से उसका रंग
फीका कर सकती थी। इसके पहले उसने कई महान सुंदरी खत्रानियों को रूलाकर छोड़ दिया
था , फिर जालपा किस गिनती में थी। ज़ोहरा ने उसका हौसला
बढ़ाते हुए कहा, 'तो इसके लिए तुम क्यों इतनारंज करते हो,
प्यारे! ज़ोहरा तुम्हारे लिए सब कुछ करने को तैयार है। मैं कल ही
जालपा का पता लगाऊंगी और वह यहां रहना चाहेगी, तो उसके आराम
के सब सामान कर दूंगी । जाना चाहेगी, तो रेल पर भेज दूंगी।'
रमा
ने बडी दीनता से कहा, 'एक बार मैं उससे मिल लेता,
तो मेरे दिल का बोझ उतर जाता।'
ज़ोहरा
चिंतित होकर बोली, 'यह तो मुश्किल है प्यारे!
तुम्हें यहां से कौन जाने देगा?'
रमानाथ-'कोई तदबीर बताओ।'
ज़ोहरा
-'मैं उसे पार्क में खड़ी कर आऊंगी। तुम डिप्टी साहब के साथ वहां जाना और
किसी बहाने से उससे मिल लेना। इसके सिवा तो मुझे और कुछ नहीं सूझता।
रमा
अभी कुछ कहना ही चाहता था कि दारोग़ाजी ने पुकारा, 'मुझे
भी खिलवत में आने की इजाज़त है? '
दोनों
संभल बैठे और द्वार खोल दिया। दारोग़ाजी मुस्कराते हुए आए और ज़ोहरा की बग़ल में
बैठकर बोले, 'यहां आज सन्नाटा कैसा! क्या आज खजाना
खाली है? ज़ोहरा -' आज अपने
दस्ते-हिनाई से एक जाम भर कर दो।'
रमानाथ-' भाईजान नाराज़ न होना।' रमा ने कुछ तुर्श होकर कहा,
'इस वक्त तो रहने दीजिए, दारोग़ाजी, आप तो पिए हुए नजर आते हैं।'
दारोग़ा
ने ज़ोहरा का हाथ पकड़कर कहा, 'बस, एक जाम ज़ोहरा -' और एक बात और, आज मेरी मेहमानी कबूल करो! '
रमा
ने तेवर बदलकर कहा, 'दारोग़ाजी, आप इस वक्त यहां से जायं। मैं यह गवारा नहीं कर सकता दारोग़ा ने नशीली
आंखों से देखकर कहा, 'क्या आपने पट्टा लिखा लिया है?
'
रमा
ने कड़ककर कहा, 'जी हां, मैंने
पट्टा लिखा लिया है!'
दारोग़ा
-'तो आपका पट्टा खारिज़! '
रमानाथ-'मैं कहता हूं, यहां से चले जाइए।'
दारोग़ा
-'अच्छा! अब तो मेंढकी को भी जुकाम पैदा हुआ! क्यों न हो, चलो ज़ोहरा -' इन्हें यहां बकने दो।'
यह
कहते हुए उन्होंने जोहरा का हाथ पकड़कर उठाया। रमा ने उनके हाथ को झटका देकर कहा, 'मैं कह चुका, आप यहां से चले जाएं ।ज़ोहरा इस वक्त
नहीं जा सकती। अगर वह गई, तो मैं उसका और आपका-दोनों का ख़ून
पी जाऊंगा। ज़ोहरा मेरी है, और जब तक मैं हूं, कोई उसकी तरफ आंख नहीं उठा सकता।'
यह
कहते हुए उसने दारोग़ा साहब का हाथ पकड़कर दरवाज़े के बाहर निकाल दिया और दरवाज़ा
ज़ोर से बंद करके सिटकनी लगा दी। दारोग़ाजीबलिष्ठ आदमी थे, लेकिन इस वक्त नशे ने उन्हें दुर्बल बना दिया था । बाहर बरामदे में खड़े
होकर वह गालियां बकने और द्वार पर ठोकर मारने लगे।
रमा
ने कहा,
'कहो तो जाकर बचा को बरामदे के नीचे ढकेल दूं। शैतान का बच्चा! '
ज़ोहरा
-'
'बकने दो, आप ही चला जायगा। '
रमानाथ-'चला गया।'
ज़ोहरा
ने मगन होकर कहा, 'तुमने बहुत अच्छा किया,
सुअर को निकाल बाहर किया। मुझे ले जाकर दिक करता। क्या तुम सचमुच
उसे मारते? '
रमानाथ-'मैं उसकी जान लेकर छोड़ता। मैं उस वक्त अपने आपे में न था। न जाने मुझमें
उस वक्त क़हां से इतनी ताकत आ गई थी।'
ज़ोहरा
-'
और जो वह कल से मुझे न आने दे तो?'
रमानाथ-'कौन, अगर इस बीच में उसने ज़रा भी भांजी मारी,
तो गोली मार दूंगा। वह देखो, ताक पर पिस्तौल
रक्खा हुआ है। तुम अब मेरी हो,ज़ोहरा! मैंने अपना सब कुछ
तुम्हारे कदमों पर निसार कर दिया और तुम्हारा सब कुछ पाकर ही मैं संतुष्ट हो सकता
हूं। तुम मेरी हो, मैं तुम्हारा हूं। किसी तीसरी औरत या मर्द
को हमारे बीच में आने का मजाज़ नहीं है,जब तक मैं मर न जाऊं।'
ज़ोहरा
की आंखें चमक रही थीं , उसने रमा की गरदन में हाथ
डालकर कहा, 'ऐसी बात मुंह से न निकालो, प्यारे! '
अड़तालीस
सारे
दिन रमा उद्वेग के जंगलों में भटकता रहा। कभी निराशा की अंधाकारमय घाटियां सामने आ
जातीं,
कभी आशा की लहराती हुई हरियाली । ज़ोहरा गई भी होगी ? यहां से तो बडे। लंबे-चौड़े वादे करके गई थी। उसे क्या ग़रज़ है? आकर कह देगी, मुलाकात ही नहीं हुई। कहीं धोखा तो न
देगी? जाकर डिप्टी साहब से सारी कथा कह सुनाए। बेचारी जालपा
पर बैठे-बिठाए आफत आ जाय। क्या ज़ोहरा इतनी नीच प्रकृति की हो सकती है?कभी नहीं, अगर ज़ोहरा इतनी बेवफा, इतनी दग़ाबाज़ है, तो यह दुनिया रहने के लायक ही
नहीं। जितनी जल्द आदमी मुंह में कालिख लगाकर डूब मरे, उतना
ही अच्छा। नहीं, ज़ोहरा मुझसे दग़ा न करेगी। उसे वह दिन याद
आए, जब उसके दफ्तर से आते ही जालपा लपककर उसकी जेब टटोलती थी
और रूपये निकाल लेती थी। वही जालपा आज इतनी सत्यवादिनी हो गई। तब वह प्यार करने की
वस्तु थी, अब वह उपासना की वस्तु है। जालपा मैं तुम्हारे
योग्य नहीं हूं। जिस ऊंचाई पर तुम मुझे ले जाना चाहती हो, वहां
तक पहुंचने की शक्ति मुझमें नहीं है। वहां पहुंचकर शायद चक्कर खाकर फिर पडूंब मैं
अब भी तुम्हारे चरणों में सिर झुकाता हूं। मैं जानता हूं, तुमने
मुझे अपने ह्रदय से निकाल दिया है, तुम मुझसे विरक्त हो गई
हो, तुम्हें अब मेरे डूबने का दुःख है न तैरने की ख़ुशी,
पर शायद अब भी मेरे मरने या किसी घोर संकट में फंस जाने की ख़बर
पाकर तुम्हारी आंखों से आंसू निकल आएंगे। शायद तुम मेरी लाश देखने आओ। हा! प्राण
ही क्यों नहीं निकल जाते कि तुम्हारी निगाह में इतना नीच तो न रहूं। रमा को अब
अपनी उस ग़लती पर घोर पश्चाताप हो रहा था, जो उसने जालपा की
बात न मानकर की थी।अगर उसने उसके आदेशानुसार जज के इजलास में अपना बयान बदल दिया
होता, धामकियों में न आता, हिम्मत
मज़बूत रखता, तो उसकी यह दशा क्यों होती? उसे विश्वास था, जालपा के साथ वह सारी कठिनाइयां झेल
जाता। उसकी श्रद्धा और प्रेम का कवच पहनकर वह अजेय हो जाता। अगर उसे फांसी भी हो
जाती, तो वह हंसते-खेलते उस पर चढ़जाता। मगर पहले उससे चाहे
जो भूल हुई, इस वक्त तो वह भूल से नहीं,जालपा की ख़ातिर ही यह कष्ट भोग रहा था। कैद जब भोगना ही है, तो उसे रो-रोकर भोगने से तो यह कहीं अच्छा है कि हंस-हंसकर भोगा जाय।
आख़िर पुलिसअधिकारियों के दिल में अपना विश्वास जमाने के लिए वह और क्या करता! यह
दुष्ट जालपा को सताते, उसका अपमान करते, उस पर झूठे मुकदमे चलाकर उसे सज़ा दिलाते। वह दशा तो और भी असह्य होती। वह
दुर्बल था, सब अपमान सह सकता था, जालपा
तो शायद प्राण ही दे देती।
उसे
आज ज्ञात हुआ कि वह जालपा को छोड़ नहीं सकता, और ज़ोहरा
को त्याग देना भी उसके लिए असंभव-सा जान पड़ता था। क्या वह दोनों रमणियों को
प्रसन्न रख सकता था?क्या इस दशा में जालपा उसके साथ रहना
स्वीकार करेगी? कभी नहीं। वह शायद उसे कभी क्षमा न करेगी!
अगर उसे यह मालूम भी हो जाये कि उसी के लिए वह यह यातना भोग रहा है, तो वह उसे क्षमा न करेगी। वह कहेगी, मेरे लिए तुमने
अपनी आत्मा को क्यों कलंकित किया- मैं अपनी रक्षा आप कर सकती थी। वह दिनभर इसी
उधोड़-बुन में पडारहा। आंखें सड़क की ओर लगी हुई थीं। नहाने का समय टल गया,
भोजन का समय टल गया ब किसी बात की परवा न थी। अख़बार से दिल बहलाना
चाहा, उपन्यास लेकर बैठा, मगर किसी काम
में भी चित्त न लगा। आज दारोग़ाजी भी नहीं आए। या तो रात की घटना से रूष्ट या
लज्जित थे। या कहीं बाहर चले गए। रमा ने किसी से इस विषय में कुछ पूछा भी नहीं ।
सभी
दुर्बल मनुष्यों की भांति रमा भी अपने पतन से लज्जित था। वह जब एकांत में बैठता, तो उसे अपनी दशा पर दुःख होता,क्यों उसकी
विलासवृत्ति इतनी प्रबल है? वह इतना विवेक-शून्य न था कि
अधोगति में भी प्रसन्न रहता, लेकिन ज्योंही और लोग आ जाते,
शराब की बोतल आ जाती, ज़ोहरा सामने आकर बैठ
जाती, उसका सारा विवेक और धर्म-ज्ञान भ्रष्ट हो जाता। रात के
दस बज गए, पर ज़ोहरा का कहीं पता नहीं। फाटक बंद हो गया। रमा
को अब उसके आने की आशा न रही, लेकिन फिर भी उसके कान लगे हुए
थे। क्या बात हुई- क्या जालपा उसे मिली ही नहीं या वह गई ही नहीं?
उसने
इरादा किया अगर कल ज़ोहरा न आई, तो उसके घर पर किसी को
भेजूंगा। उसे दो-एक झपकियां आइ और सबेरा हो गया। फिर वही विकलता शुरू हुई। किसी को
उसके घर भेजकर बुलवाना चाहिए। कम-से-कम यह तो मालूम हो जाय कि वह घर पर है या
नहीं।
दारोग़ा
के पास जाकर बोला, 'रात तो आप आपे में न थे।'
दारोग़ा
ने ईर्ष्याको छिपाते हुए कहा, 'यह बात न थी। मैं महज़
आपको छेड़ रहा था।'
रमानाथ-'ज़ोहरा रात आई नहीं , ज़रा किसी को भेजकर पता तो
लगवाइए, बात क्या है। कहीं नाराज़ तो नहीं हो गई?'
दारोग़ा
ने बेदिली से कहा, 'उसे गरज़ होगा खुद आएगी।
किसी को भेजने की जरूरत नहीं है।'
रमा
ने फिर आग्रह न किया। समझ गया, यह हज़रत रात बिगड़ गए।
चुपके से चला आया। अब किससे कहे, सबसे यह बात कहना लज्जास्पद
मालूम होता था। लोग समझेंगे, यह महाशय एक ही रसिया निकले। दारोग़ा
से तो थोड़ीसी घनिष्ठता हो गई थी।
एक
हफ्ते तक उसे ज़ोहरा के दर्शन न हुए। अब उसके आने की कोई आशा न थी। रमा ने सोचा, आख़िर बेवफा निकली। उससे कुछ आशा करना मेरी भूल थी। या मुमकिन है, पुलिस-अधिकारियों ने उसके आने की मनाही कर दी हो कम-से-कम मुझे एक पत्र तो
लिख सकती थी। मुझे कितना धोखा हुआ। व्यर्थ उससे अपने दिल की बात कही। कहीं इन
लोगों से न कह दे, तो उल्टी आंतें गले पड़ जायं, मगर ज़ोहरा बेवफाई नहीं कर सकती। रमा की अंतरात्मा इसकी गवाही देती थी।इस
बात को किसी तरह स्वीकार न करती थी। शुरू के दस-पांच दिन तो जरूर ज़ोहरा ने उसे
लुब्ध करने की चेष्टा की थी। फिर अनायास ही उसके व्यवहार में परिवर्तन होने लगा
था। वह क्यों बार-बार सजल-नो होकर कहती थी, देखो बाबूजी,
मुझे भूल न जाना। उसकी वह हसरत भरी बातें याद आ-आकर कपट की शंका को
दिल से निकाल देतीं। जरूर कोई न कोई नई बात हो गई है। वह अक्सर एकांत में बैठकर
ज़ोहरा की याद करके बच्चों की तरह रोता। शराब से उसे घृणा हो गई। दारोग़ाजी आते,
इंस्पेक्टर साहब आते पर, रमा को उनके साथ
दस-पांच मिनट बैठना भी अखरता। वह चाहता था, मुझे कोई न छेडे।,
कोई न बोले। रसोइया खाने को बुलाने आता, तो
उसे घुड़क देता। कहीं घूमने या सैर करने की उसकी इच्छा ही न होती। यहां कोई उसका
हमदर्द न था, कोई उसका मित्र न था, एकांत
में मन-मारे बैठे रहने में ही उसके चित्त को शांति होती थी। उसकी स्मृतियों में भी
अब कोई आनंद न था। नहीं, वह स्मृतियां भी मानो उसके ह्रदय से
मिट गई थीं। एक प्रकार का विराग उसके दिल पर छाया रहता था।
सातवां
दिन था। आठ बज गए थे। आज एक बहुत अच्छा फिल्म होने वाला था। एक प्रेम-कथा थी।
दारोग़ाजी ने आकर रमा से कहा, तो वह चलने को तैयार हो
गया। कपड़े पहन रहा था कि ज़ोहरा आ पहुंची। रमा ने उसकी तरफ एक बार आंख उठाकर देखा,
फिर आईने में अपने बाल संवारने लगा। न कुछ बोला, न कुछ कहा। हां, ज़ोहरा का वह सादा, आभरणहीन स्वरूप देखकर उसे कुछ आश्चर्य अवश्य हुआ। वह केवल एक सफेद साड़ी
पहने हुए थी। आभूषण का एक तार भी उसकी देह पर न था। होंठ मुरझाए हुए और चेहरे पर
क्रीडामय चंचलता की जगह तेजमय गंभीरता झलक रही थी। वह एक मिनट खड़ी रही, तब रमा के पास जाकर बोली, 'क्या मुझसे
नाराज़
हो?
बेकसूर, बिना कुछ पूछे-गछे ?'
रमा
ने फिर भी कुछ जवाब न दिया। जूते पहनने लगा। ज़ोहरा ने उसका हाथ पकड़कर कहा,
'क्या यह खफगी इसलिए है कि मैं इतने दिनों आई क्यों नहीं!'
रमा
ने रूखाई से जवाब दिया, 'अगर तुम अब भी न आतीं,
तो मेरा क्या अख्तियार था। तुम्हारी दया थी कि चली आई!' यह कहने के साथ उसे ख़याल आया कि मैं इसके साथ अन्याय कर रहा हूं। लज्जित
नजरों से उसकी ओर ताकने लगा। ज़ोहरा ने मुस्कराकर कहा, 'यह
अच्छी दिल्लगी है। आपने ही तो एक काम सौंपा और जब वह काम करके लौटी तो आप बिगड़
रहे हैं। क्या तुमने वह काम इतना आसान समझा था कि चुटकी बजाने में पूरा हो जाएगा।
तुमने मुझे उस देवी से वरदान लेने भेजा था, जो ऊपर से फल है,
पर भीतर से पत्थर, जो इतनी नाजुक होकर भी इतनी
मज़बूत है।'
रमा
ने बेदिली से पूछा, 'है कहां? क्या करती है? '
ज़ोहरा-'उसी दिनेश के घर हैं, जिसको फांसी की सज़ा हो गई है।
उसके दो बच्चे हैं, औरत है और मां है। दिनभर उन्हीं बच्चों
को खिलाती है, बुढिया के लिए नदी से पानी लाती है। घर का
सारा काम-काज करती है और उनके लिए बडे।-बडे आदमियों से चंदा मांग लाती है। दिनेश
के घर में न कोई जायदाद थी, न रूपये थे। लोग बडी तकलीफ में
थे। कोई मददगार तक न था, जो जाकर उन्हें ढाढ़स तो देता।
जितने साथी-सोहबती थे, सब-के-सब मुंह छिपा बैठे।दो-तीन फाके
तक हो चुके थे। जालपा ने जाकर उनको जिला लिया।'
रमा
की सारी बेदिली काफूरहो गई। जूता छोड़ दिया और कुर्सी पर बैठकर बोले, 'तुम खड़ी क्यों हो, शुरू से बताओ, तुमने तो बीच में से कहना शुरू किया। एक बात भी मत छोड़ना। तुम पहले उसके
पास कैसे पहुंची- पता कैसे लगा?'
ज़ोहरा-'कुछ नहीं, पहले उसी देवीदीन खटिक के पास गई। उसने
दिनेश के घर का पता बता दिया। चटपट जा पहुंची।'
रमानाथ-'तुमने जाकर उसे पुकारा- तुम्हें देखकर कुछ चौंकी नहीं? कुछ झिझकी तो जरूर होगी!
ज़ोहरा
मुस्कराकर बोली,मैं इस रूप में न थी। देवीदीन के घर से मैं
अपने घर गई और ब्रह्मा-समाजी लेडी का स्वांग भरा। न जाने मुझमें ऐसी कौनसी बात है,
जिससे दूसरों को फौरन पता चल जाता है कि मैं कौन हूं, या क्या हूं। और ब्रह्माणों- लेडियों को देखती हूं, कोई
उनकी तरफ आंखें तक नहीं उठाता। मेरा पहनावा-ओढ़ावा वही है, मैं
भड़कीले कपड़े या फजूल के गहने बिलकुल नहीं पहनती। फिर भी सब मेरी तरफ आंखें फाड़-
फाड़कर देखते हैं। मेरी असलियत नहीं छिपती। यही खौफ मुझे था कि कहीं जालपा भांप न
जाय, लेकिन मैंने दांत ख़ूब साफ कर लिए थे। पान का निशान तक
न था। मालूम होता था किसी कालेज की लेडी टीचर होगी। इस शक्ल में मैं वहां पहुंची।
ऐसी सूरत बना ली कि वह क्या, कोई भी न भांप सकता था। परदा
ढंका रह गया। मैंने दिनेश की मां से कहा, 'मैं यहां
यूनिवर्सिटी में पढ़ती हूं। अपना घर मुंगेर बतलाया। बच्चों के लिए मिठाई ले गई थी।
हमदर्द का पार्ट खेलने गई थी, और मेरा ख़याल है कि मैंने
ख़ूब खेला, दोनों औरतें बेचारी रोने लगीं। मैं भी जब्त न कर
सकी। उनसे कभी-कभी मिलते रहने का वादा किया। जालपा इसी बीच में गंगाजल लिये
पहुंची। मैंने दिनेश की मां से बंगला में पूछा, 'क्या यह
कहारिन है? उसने कहा, नहीं, यह भी तुम्हारी ही तरह हम लोगों के दुःख में शरीक होने आ गई है। यहां इनका
शौहर किसी दफ्तर में नौकर है। और तो कुछ नहीं मालूम, रोज़
सबेरे आ जाती हैं और बच्चों को खेलाने ले जाती हैं। मैं अपने हाथ से गंगाजल लाया
करती थी। मुझे रोक दिया और ख़ुद लाती हैं। हमें तो इन्होंने जीवन-दान दिया। कोई
आगे-पीछे न था। बच्चे दाने-दाने को तरसते थे। जब से यह आ गई हैं, हमें कोई कष्ट नहीं है। न जाने किस शुभ कर्म का यह वरदान हमें मिला है।
उस
घर के सामने ही एक छोटा-सा पार्क है। महल्ले-भर के बच्चे वहीं खेला करते हैं। शाम
हो गई थी,
जालपा देवी ने दोनों बच्चों को साथ लिया और पार्क की तरफ चलीं। मैं
जो मिठाई ले गई थी, उसमें से बूढ़ी ने एक- एक मिठाई दोनों
बच्चों को दी थी। दोनों कूद-कूदकर नाचने लगे। बच्चों की इस ख़ुशी पर मुझे रोना आ
गया। दोनों मिठाइयां खाते हुए जालपा के साथ हो लिए। जब पार्क में दोनों बच्चे
खेलने लगे, तब जालपा से मेरी बातें होने लगीं! रमा ने कुर्सी
और करीब खींच ली, और आगे को झुक गया। बोला,तुमने किस तरह बातचीत शुरू की।
ज़ोहरा
-'
'कह तो रही हूं। मैंने पूछा, 'जालपा देवी,
तुम कहां रहती हो? घर की दोनों औरतों से
तुम्हारी बडाई सुनकर तुम्हारे ऊपर आशिक हो गई हूं।'
रमानाथ-'यही लफ्ज कहा था तुमने?'
ज़ोहरा-'हां, जरा मज़ाक करने की सूझी। मेरी तरफ ताज्जुब से
देखकर बोली,तुम तो बंगालिन नहीं मालूम होतीं। इतनी साफ हिंदी
कोई बंगालिन नहीं बोलती। मैंने कहा, 'मैं मुंगेर की रहने
वाली हूं और वहां मुसलमानी औरतों के साथ बहुत मिलती-जुलती रही हूं। आपसे कभी-कभी
मिलने का जी चाहता है। आप कहां रहती हैं। कभी-कभी दो घड़ी के लिए चली आऊंगी। आपके
साथ घड़ी भर बैठकर मैं भी आदमीयत सीख जाऊंगी। जालपा ने शरमाकर कहा, 'तुम तो मुझे बनाने लगीं, कहां तुम कालेजकी पढ़ने
वाली, कहां मैं अपढ़गंवार औरत। तुमसे मिलकर मैं अलबत्ता आदमी
बन जाऊंगी। जब जी चाहे, यहीं चले आना। यही मेरा घर समझो।
मैंने
कहा,
'तुम्हारे स्वामीजी ने तुम्हें इतनी आजादी दे रक्खी है। बडे। अच्छे
ख़यालों के आदमी होंगे। किस दफ्तर में नौकर हैं?'
जालपा
ने अपने नाखूनों को देखते हुए कहा, 'पुलिस में
उम्मेदवार हैं।'
मैंने
ताज्जुब से पूछा, 'पुलिस के आदमी होकर वह
तुम्हें यहां आने की आज़ादी देते हैं?'
जालपा
इस प्रश्न के लिए तैयार न मालूम होती थी। कुछ चौंककर बोली, 'वह मुझसे कुछ नहीं कहते---मैंने उनसे यहां आने की बात नहीं कही--वह घर
बहुत कम आते हैं। वहीं पुलिस वालों के साथ रहते हैं।'
उन्होंने
एक साथ तीन जवाब दिए। फिर भी उन्हें शक हो रहा था कि इनमें से कोई जवाब इत्मीनान
के लायक नहीं है। वह कुछ खिसियानी-सी होकर दूसरी तरफ ताकने लगी। मैंने पूछा, 'तुम अपने स्वामी से कहकर किसी तरह मेरी मुलाकात उस मुख़बिर से करा सकती हो,
जिसने इन कैदियों के ख़िलाफ गवाही दी है? रमानाथ
की आंखें फैल गई और छाती धक-धक करने लगी। जोहरा बोली, 'यह
सुनकर जालपा ने मुझे चुभती हुई आंखों से देखकर पूछा,तुम उनसे
मिलकर क्या करोगी?'
मैंने
कहा,
'तुम मुलाकात करा सकती हो या नहीं, मैं उनसे
यही पूछना चाहती हूं कि तुमने इतने आदमियों को फंसाकर क्या पाया? देखूंगी वह क्या जवाब देते हैं?'
जालपा
का चेहरा सख्त पड़ गया। बोली, 'वह यह कह सकता है,
मैंने अपने फायदे के लिए किया! सभी आदमी अपना फायदा सोचते हैं।
मैंने भी सोचा।' जब पुलिस के सैकड़ों आदमियों से कोई यह
प्रश्न नहीं करता, तो उससे यह प्रश्न क्यों किया जाय?
इससे कोई फायदा नहीं।
मैंने
कहा,
'अच्छा, मान लो तुम्हारा पति ऐसी मुख़बिरी
करता, तो तुम क्या करतीं?
जालपा
ने मेरी तरफ सहमी हुई आंखों से देखकर कहा, 'तुम मुझसे
यह सवाल क्यों करती हो, तुम खुद अपने दिल में इसका जवाब
क्यों नहीं ढूंढ़तीं?'
मैंने
कहा,'मैं तो उनसे कभी न बोलती, न कभी उनकी सूरत देखती।'
जालपा
ने गंभीर चिंता के भाव से कहा, 'शायद मैं भी ऐसा ही
समझती,या न समझती,कुछ कह नहीं सकती।
आख़िर पुलिस के अफसरों के घर में भी तो औरतें हैं, वे क्यों
नहीं अपने आदमियों को कुछ कहतीं, जिस तरह उनके ह्रदय अपने
मरदों के-से हो गए हैं, संभव है, मेरा
ह्रदय भी वैसा ही हो जाता।'
इतने
में अंधेरा हो गया। जालपादेवी ने कहा, 'मुझे देर
हो रही है। बच्चे साथ हैं। कल हो सके तो फिर मिलिएगा। आपकी बातों में बडा आनंद आता
है।'
मैं
चलने लगी,
तो उन्होंने चलते-चलते मुझसे कहा,'जरूर आइएगा।
वहीं मैं मिलूंगी। आपका इंतज़ार करती रहूंगी।'लेकिन दस ही
कदम के बाद फिर रूककर बोलीं, 'मैंने आपका नाम तो
पूछा
ही नहीं। अभी तुमसे बातें करने से जी नहीं भरा। देर न हो रही हो तो आओ, कुछ देर गप-शप करें।'
मैं
तो यह चाहती ही थी। अपना नाम ज़ोहरा बतला दिया। रमा ने पूछा, 'सच!'
ज़ोहरा-
'हां, हरज क्या था। पहले तो जालपा भी ज़रा चौंकी,
पर कोई बात न थी। समझ गई, बंगाली मुसलमान
होगी। हम दोनों उसके घर गई। उस ज़रासे कठघरे में न जाने वह कैसे बैठती हैं। एक तिल
भी जगह नहीं। कहीं मटके हैं, कहीं पानी, कहीं खाट, कहीं बिछावनब सील और बदबू से नाक फटी जाती
थी। खाना तैयार हो गया था। दिनेश की बहू बरतन धो रही थी। जालपा ने उसे उठा दिया,जाकर बच्चों को खिलाकर सुला दो, मैं बरतन धोए देती
हूं। और ख़ुद बरतन मांजने लगीं। उनकी यह खिदमत देखकर मेरे दिल पर इतना असर हुआ कि
मैं भी वहीं बैठ गई और मांजे हुए बरतनों को धोने लगी। जालपा ने मुझे वहां से हट
जाने के लिए कहा, पर मैं न हटीब, बराबर
बरतन धोती रही। जालपा ने तब पानी का मटका अलग हटाकर कहा, 'मैं
पानी न दूंगी, तुम उठ जाओ, मुझे बडी
शर्म आती है, तुम्हें मेरी कसम, हट जाओ,
यहां आना तो तुम्हारी सजा हो गई, तुमने ऐसा
काम अपनी जिंदगी में क्यों किया होगा! मैंने कहा, 'तुमने भी
तो कभी नहीं किया होगा, जब तुम करती हो, तो मेरे लिए क्या हरज है।'
जालपा
ने कहा,
'मेरी और बात है।'
मैंने
पूछा,
'क्यों? जो बात तुम्हारे लिए है, वही मेरे लिए भी है। कोई महरी क्यों नहीं रख लेती हो?'
जालपा
ने कहा,
'महरियां आठ-आठ रूपये मांगती हैं।'
मैं
बोली,
'मैं आठ रूपये महीना दे दिया करूंगी।'
जालपा
ने ऐसी निगाहों से मेरी तरफ देखा, जिसमें सच्चे प्रेम के
साथ सच्चा उल्लास, सच्चा आशीर्वाद भरा हुआ था। वह चितवन! आह!
कितनी पाकीजा थी, कितनी पाक करने वाली। उनकी इस बेगरज खिदमत के
सामने मुझे अपनी जिंदगी कितनी जलील, कितनी काबिले नगरत मालूम
हो रही थी। उन बरतनों के धोने में मुझे जो आनंद मिला, उसे
मैं बयान नहीं कर सकती।
बरतन
धोकर उठीं, तो बुढिया के पांव दबाने बैठ गई। मैं
चुपचाप खड़ी थी। मुझसे बोलीं, 'तुम्हें देर हो रही हो तो जाओ,
कल फिर आना। मैंने कहा, 'नहीं, मैं तुम्हें तुम्हारे घर पहुंचाकर उधर ही से निकल जाऊंगी। गरज नौ बजे के
बाद वह वहां से चलीं। रास्ते में मैंने कहा, 'जालपा-'
तुम सचमुच देवी हो।'
जालपा
ने छूटते ही कहा, 'ज़ोहरा -' ऐसा मत कहो मैं ख़िदमत नहीं कर रही हूं, अपने पापों
का प्रायश्चित्ता कर रही हूं। मैं बहुत दुद्यखी हूं। मुझसे बडी अभागिनी संसार में
न होगी।'
मैंने
अनजान बनकर कहा, 'इसका मतलब मैं नहीं समझी।'
जालपा
ने सामने ताकते हुए कहा, 'कभी समझ जाओगी। मेरा
प्रायश्चित्त इस जन्म में न पूरा होगा। इसके लिए मुझे कई जन्म लेने पड़ेंगे।'
'मैंने कहा,तुम तो मुझे चक्कर में डाले देती हो,
बहन! मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। जब तक तुम इसे समझा न दोगी,
मैं तुम्हारा गला न छोडूंगी।' जालपा ने एक
लंबी सांस लेकर कहा, 'ज़ोहरा -' किसी
बात को ख़ुद छिपाए रहना इससे ज्यादा आसान है कि दूसरों पर वह बोझ रक्खूं।'मैंने आर्त कंठ से कहा, 'हां, पहली
मुलाकात में अगर आपको मुझ पर इतना एतबार न हो, तो मैं आपको
इलज़ाम न दूंगी, मगर कभी न कभी आपको मुझ पर एतबार करना
पड़ेगा। मैं आपको छोडूंगी नहीं।'
कुछ
दूर तक हम दोनों चुपचाप चलती रहीं, एकाएक जालपा
ने कांपती हुई आवाज़ में कहा, 'ज़ोहरा -' अगर इस वक्त तुम्हें मालूम हो जाय कि मैं कौन हूं, तो
शायद तुम नफरत से मुंह उधर लोगी और मेरे साए से भी दूर भागोगी।'
इन
लर्जिेंशों में न मालूम क्या जादू था कि मेरे सारे रोएं खड़े हो गए। यह एक रंज और
शर्म से भरे हुए दिल की आवाज़ थी और इसने मेरी स्याह जिंदगी की सूरत मेरे सामने
खड़ी कर दी। मेरी आंखों में आंसू भर आए। ऐसा जी में आया कि अपना सारा स्वांग खोल
दूं। न जाने उनके सामने मेरा दिल क्यों ऐसा हो गया था। मैंने बड़े-बडे काइएं और
छंटे हुए शोहदों और पुलिस-अफसरों को चपर-गट्टू बनाया है, पर उनके सामने मैं जैसे भीगी बिल्ली बनी हुई थी। फिर मैंने जाने कैसे अपने
को संभाल लिया। मैं बोली तो मेरा गला भी भरा हुआ था, 'यह
तुम्हारा ख़याल फलत है देवी!'
'शायद तब मैं तुम्हारे पैरों पर फिर पड़ूंगी। अपनी या अपनों की बुराइयों पर
शर्मिन्दा होना सच्चे दिलों का काम है।'
जालपा
ने कहा,
'लेकिन तुम मेरा हाल जानकर करोगी क्या बस, इतना
ही समझ लो कि एक ग़रीब अभागिन औरत हूं, जिसे अपने ही जैसे
अभागे और ग़रीब आदमियों के साथ मिलने-जुलने में आनंद आता है।'
'इसी तरह वह बार-बार टालती रही, लेकिन मैंने पीछा न
छोडा, आख़िर उसके मुंह से बात निकाल ही ली।'
रमा
ने कहा,
'यह नहीं, सब कुछ कहना पड़ेगा।'
ज़ोहरा-'अब आधी रात तक की कथा कहां तक सुनाऊं। घंटों लग जाएंगे। जब मैं बहुत पीछे
पड़ी, तो उन्होंने आख़िर में कहा,मैं
उसी मुखबिर की बदनसीब औरत हूं, जिसने इन कैदियों पर यह आगत
ढाई है। यह कहते-कहते वह रो पड़ीं। फिर ज़रा आवाज़ को संभालकर बोलीं,हम लोग इलाहाबाद के रहने वाले हैं। एक ऐसी बात हुई कि इन्हें वहां से
भागना पड़ा। किसी से कुछ कहा न सुना, भाग आए। कई महीनों में
पता चला कि वह यहां हैं।'
रमा
ने कहा,
'इसका भी किस्सा है। तुमसे बताऊंगा कभी, जालपा
के सिवा और किसी को यह न सूझती।
ज़ोहरा
बोली,'यह सब मैंने दूसरे दिन जान लिया। अब मैं तुम्हारे रगरग से वाकिफ हो गई।
जालपा मेरी सहेली है। शायद ही अपनी कोई बात उन्होंने मुझसे छिपाई हो कहने लगीं,ज़ोहरा -' मैं बडी मुसीबत में फंसी हुई हूं। एक तरफ
तो एक आदमी की जान और कई खानदानों की तबाही है, दूसरी तरफ
अपनी तबाही है। मैं चाहूं, तो आज इन सबों की जान बचा सकती
हूं। मैं अदालत को ऐसा सबूत दे सकती हूं कि फिर मुखबिर की शहादत की कोई हैसियत ही
न रह जायगी, पर मुखबिर को सजा से नहीं बचा सकती। बहन,
इस दुविधा में मैं पड़ी नरक का कष्ट झेल रही हूं। न यही होता है कि
इन लोगों को मरने दूं, और न यही हो सकता है कि रमा को आग में
झोंक दूं। यह कहकर वह रो पड़ीं और बोलीं, बहन, मैं खुद मर जाऊंगी, पर उनका अनिष्ट मुझसे न होगा।
न्याय पर उन्हें भेंट नहीं कर सकती। अभी देखती हूं, क्या
फैसला होता है। नहीं कह सकती, उस वक्त मैं क्या कर बैठूं।
शायद वहीं हाईकोर्ट में सारा किस्सा कह सुनाऊं, शायद उसी दिन
जहर खाकर सो रहूं।'
इतने
में देवीदीन का घर आ गया। हम दोनों विदा हुई। जालपा ने मुझसे बहुत इसरार किया कि
कल इसी वक्त ग़िर आना। दिन?भर तो उन्हें बात करने की
फुरसत नहीं रहती। बस वही शाम को मौका मिलता था। वह इतने रूपये जमा कर देना चाहती
हैं कि कम-से-कम दिनेश के घर वालों को कोई तकलीफ न हो दो सौ रूपये से ज्यादा जमा
कर चुकी हैं। मैंने भी पांच रूपये दिए। मैंने दो-एक बार जिक्र किया कि आप इन
झगड़ों में न पडिए, अपने घर चली जाइए, लेकिन
मैं साफ-साफ कहती हूं, मैंने कभी जोर देकर यह बात न कही।
जबजब मैंने इसका इशारा किया, उन्होंने ऐसा मुंह बनाया,
गोया वह यह बात सुनना भी नहीं चाहतीं। मेरे मुंह से पूरी बात कभी न
निकलने पाई। एक बात है, 'कहो तो कहूं?'
रमा
ने मानो ऊपरी मन से कहा, 'क्या बात है?'
ज़ोहरा-'डिप्टी साहब से कह दूं, वह जालपा को इलाहाबाद पहुंचा
दें। उन्हें कोई तकलीफ न होगी। बस दो औरतें उन्हें स्टेशन तक बातों में लगा ले
जाएंगी। वहां गाड़ी तैयार मिलेगी, वह उसमें बैठा दी जाएंगी,
या कोई और तदबीर सोचो।'
रमा
ने ज़ोहरा की आंखों से आंख मिलाकर कहा, 'क्या यह
मुनासिब होगा?'
ज़ोहरा
ने शरमाकर कहा, 'मुनासिब तो न होगा।'
रमा
ने चटपट जूते पहन लिए और ज़ोहरा से पूछा, 'देवीदीन के
ही घर पर रहती है न?'
ज़ोहरा
उठ खड़ी हुई और उसके सामने आकर बोली, 'तो क्या इस
वक्त जाओगे?'
रमानाथ-'हां ज़ोहरा -' इसी वक्त चला जाऊंगा। बस, उनसे दो बातें करके उस तरफ चला जाऊंगा जहां मुझे अब से बहुत पहले चला जाना
चाहिए था।'
ज़ोहरा-'मगर कुछ सोच तो लो, नतीजा क्या होगा।'
रमानाथ-'सब सोच चुका, ज्यादा-से ज्यादा तीन?चार साल की कैद दरोगबयानी के जुर्म में, बस अब
रूख़सत, भूल मत जाना ज़ोहरा -' शायद
फिर कभी मुलाकात हो!'
रमा
बरामदे से उतरकर सहन में आया और एक क्षण में फाटक के बाहर था। दरबान ने कहा, 'हुजूर ने दारोग़ाजी को इत्तला कर दी है?'
रमनाथ-'इसकी कोई जरूरत नहीं।'
चौकीदार-'मैं ज़रा उनसे पूछ लूं। मेरी रोज़ी क्यों ले रहे हैं, हुजूर?'
रमा
ने कोई जवाब न दिया। तेज़ी से सड़क पर चल खडा हुआ। ज़ोहरा निस्पंद खड़ी उसे
हसरत-भरी आंखों से देख रही थी। रमा के प्रति ऐसा प्यार,ऐसा विकल करने वाला प्यार उसे कभी न हुआ था। जैसे कोई वीरबाला अपने
प्रियतम को समरभूमि की ओर जाते देखकर गर्व से फली न समाती हो चौकीदार ने लपककर दारोग़ा
से कहा। वह बेचारे खाना खाकर लेटे ही थे। घबराकर निकले, रमा
के पीछे दौड़े और पुकारा, 'बाबू साहब, ज़रा
सुनिए तो, एक मिनट रूक जाइए, इससे क्या
फायदा,कुछ मालूम तो हो, आप कहां जा रहे
हैं?आख़िर बेचारे एक बार ठोकर खाकर गिर पड़े। रमा ने लौटकर
उन्हें उठाया और पूछा, 'कहीं चोट तो नहीं आई?'
दारोग़ा
-'कोई बात न थी, ज़रा ठोकर खा गया था। आख़िर आप इस
वक्त कहां जा रहे हैं?सोचिए तो इसका नतीज़ा क्या होगा?'
रमानाथ-'मैं एक घंटे में लौट आऊंगा। जालपा को शायद मुख़ालिफों ने बहकाया है कि
हाईकोर्ट में एक अर्जी दे दे। ज़रा उसे जाकर समझाऊंगा।'
दारोग़ा
-'यह आपको कैसे मालूम हुआ?'
रमानाथ-'ज़ोहरा कहीं सुन आई है।'
दारोग़ा
-'बडी बेवफा औरत है। ऐसी औरत का तो सिर काट लेना चाहिए।'
रमानाथ-'इसीलिए तो जा रहा हूं। या तो इसी वक्त उसे स्टेशन पर भेजकर आऊंगा, या इस बुरी तरह पेश आऊंगा कि वह भी याद करेगी। ज्यादा बातचीत का मौका नहीं
है। रात-भर के लिए मुझे इस कैद से आज़ाद कर दीजिए। '
दारोग़ा
-'मैं भी चलता हूं, ज़रा ठहर जाइए।'
रमानाथ-'जी नहीं, बिलकुल मामला बिगड़ जाएगा। मैं अभी आता
हूं।'
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