गबन: अध्याय-2.9
होती।
सड़क पर आकर रमा ने एक तांगा लिया और उससे जार्जटाउन चलने को कहा,शायद रतन से भेंट हो जाए। वह चाहे तो तीन सौ रूपये का बडी आसानी से प्रबंध
कर सकती है। रास्ते में वह सोचता जाता था, आज बिलकुल संकोच न
करूंगा। ज़रा देर में जार्जटाउन आ गया। रतन का बंगला भी आया। वह बरामदे में बैठी
थी। रमा ने उसे देखकर हाथ उठाया, उसने भी हाथ उठाया, पर वहां उसका सारा संयम टूट गया। वह बंगले में न जा सका। तांगा सामने से
निकल गया। रतन बुलाती, तो वह चला जाता। वह बरामदे में न बैठी
होती तब भी शायद वह अंदर जाता, पर उसे सामने बैठे देखकर वह
संकोच में डूब गया। जब तांगा गवर्नमेंट हाउस के पास पहुंचा, तो
रमा ने चौंककर कहा, 'चुंगी के दफ्तर चलो। तांगे वाले ने घोडा
उधर मोङ दिया।
ग्यारह
बजते-बजते रमा दफ्तर पहुंचा। उसका चेहरा उतरा हुआ था। छाती धड़क रही थी। बडे बाबू
ने जरूर पूछा होगा। जाते ही बुलाएंगे। दफ्तर में ज़रा भी रियायत नहीं करते। तांगे
से उतरते ही उसने पहले अपने कमरे की तरफ निगाह डाली। देखा, कई आदमी खड़े उसकी राह देख रहे हैं। वह उधर न जाकर रमेश बाबू के कमरे की
ओर गया।
रमेश
बाबू ने पूछा, 'तुम अब तक कहां थे जी, ख़ज़ांची साहब तुम्हें खोजते फिरते हैं?चपरासी मिला
था?'
रमा
ने अटकते हुए कहा, 'मैं घर पर न था। ज़रा वकील
साहब की तरफ चला गया था। एक बडी मुसीबत में फंस गया हूं।'
रमेश-'कैसी मुसीबत, घर पर तो कुशल है।'
रमानाथ-'जी हां, घर पर तो कुशल है। कल शाम को यहां काम बहुत
था, मैं उसमें ऐसा फंसा कि वक्त क़ी कुछ ख़बर ही न रही। जब
काम ख़त्म करके उठा, तो ख़जांची साहब चले गए थे। मेरे पास
आमदनी के आठ सौ रूपये थे। सोचने लगा इसे कहां रक्खूं, मेरे
कमरे में कोई संदूक है नहीं। यही निश्चय किया कि साथ लेता जाऊं। पांच सौ रूपये नकद
थे, वह तो मैंने थैली में रक्खे तीन सौ रूपये के नोट जेब में
रख लिए और घर चला। चौक में एक-दो चीज़ें लेनी थीं। उधार से होता हुआ घर पहुंचा तो
नोट गायब थे। रमेश बाबू ने आंखें गाड़कर कहा, 'तीन सौ के नोट
गायब हो गए?'
रमानाथ-'जी हां, कोट के ऊपर की जेब में थे। किसी ने निकाल
लिए?'
रमेश-'और तुमको मारकर थैली नहीं छीन ली?'
रमानाथ-'क्या बताऊं बाबूजी, तब से चित्त की जो दशा हो रही है,
वह बयान नहीं कर सकता तब से अब तक इसी फिक्र में दौड़ रहा हूं। कोई
बंदोबस्त न हो सका।'
रमेश-'अपने पिता से तो कहा ही न होगा? '
रमानाथ-'उनका स्वभाव तो आप जानते हैं। रूपये तो न देते, उल्टी
डांट सुनाते।'
रमेश-'तो फिर क्या फिक्र करोगे?'
रमानाथ-'आज शाम तक कोई न कोई फिक्र करूंगा ही।'
रमेश
ने कठोर भाव धारण करके कहा, 'तो फिर करो न! इतनी लापरवाही
तुमसे हुई कैसे! यह मेरी समझ में नहीं आता। मेरी जेब से तो आज तक एक पैसा न गिरा,
आंखें बंद करके रास्ता चलते हो या नशे में थे? मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं आता। सच-सच बतला दो, कहीं अनाप-शनाप तो नहीं ख़र्च कर डाले? उस दिन तुमने
मुझसे क्यों रूपये मांगे थे? '
रमा
का चेहरा पीला पड़ गया। कहीं कलई तो न खुल जाएगी। बात बनाकर बोला, 'क्या सरकारी रूपया ख़र्च कर डालूंगा? उस दिन तो आपसे
रूपये इसलिए मांगे थे कि बाबूजी को एक जरूरत आ पड़ी थी। घर में रूपये न थे। आपका
ख़त मैंने उन्हें सुना दिया था। बहुत हंसे, दूसरा इंतजाम कर
लिया। इन नोटों के गायब होने का तो मुझे ख़ुद ही आश्चर्य है।'
रमेश-'तुम्हें अपने पिताजी से मांगते संकोच होता हो, तो
मैं ख़त लिखकर मंगवा लूं।'
रमा
ने कानों पर हाथ रखकर कहा, 'नहीं बाबूजी, ईश्वर के लिए ऐसा न कीजिएगा। ऐसी ही इच्छा हो, तो
मुझे गोली मार दीजिए।'
रमेश
ने एक क्षण तक कुछ सोचकर कहा, 'तुम्हें विश्वास है,
शाम तक रूपये मिल जाएंगे?'
रमानाथ-'हां, आशा तो है।'
रमेश-'तो इस थैली के रूपये जमा कर दो, मगर देखो भाई,
मैं साफ-साफ कहे देता हूं, अगर कल दस बजे
रूपये न लाए तो मेरा दोष नहीं। कायदा तो यही कहता है कि मैं इसी वक्त तुम्हें
पुलिस के हवाले करूं, मगर तुम अभी लङके हो, इसलिए क्षमा करता हूं। वरना तुम्हें मालूम है, मैं
सरकारी काम में किसी प्रकार की मुरौवत नहीं करता। अगर तुम्हारी जगह मेरा भाई या
बेटा होता, तो मैं उसके साथ भी यही सलूक करता, बल्कि शायद इससे सख्त। तुम्हारे साथ तो फिर भी बडी नर्मी कर रहा हूं। मेरे
पास रूपये होते तो तुम्हें दे देता, लेकिन मेरी हालत तुम
जानते हो हां, किसी का कर्ज़ नहीं रखता। न किसी को कर्ज देता
हूं, न किसी से लेता हूं। कल रूपये न आए तो बुरा होगा। मेरी
दोस्ती भी तुम्हें पुलिस के पंजे से न बचा सकेगी। मेरी दोस्ती ने आज अपना हक अदा
कर दिया वरना इस वक्त तुम्हारे हाथों में हथकडियां होतीं।'
हथकडियां!
यह शब्द तीर की भांति रमा की छाती में लगा। वह सिर से पांव तक कांप उठा। उस
विपत्ति की कल्पना करके उसकी आंखें डबडबा आई। वह धीरे-धीरे सिर झुकाए, सज़ा पाए हुए कैष्दी की भांति जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया, पर यह भयंकर शब्द बीच-बीच में उसके ह्रदय में गूंज जाता था। आकाश पर काली
घटाएं छाई थीं। सूर्य का कहीं पता न था, क्या वह भी उस
घटारूपी कारागार में बंद है, क्या उसके हाथों में भी
हथकडियां हैं?
बीस
रमा
शाम को दफ्तर से चलने लगा, तो रमेश बाबू दौड़े हुए आए और
कल रूपये लाने की ताकीद की। रमा मन में झुंझला उठा। आप बडे ईमानदार की दुम बने
हैं! ढोंगिया कहीं का! अगर अपनी जरूरत आ पड़े, तो दूसरों के
तलवे सहलाते गिरेंगे, पर मेरा काम है, तो
आप आदर्शवादी बन बैठे। यह सब दिखाने के दांत हैं, मरते समय
इसके प्राण भी जल्दी नहीं निकलेंगे! कुछ दूर चलकर उसने सोचा, एक बार फिर रतन के पास चलूं। और ऐसा कोई न था जिससे रूपये मिलने की आशा
होती। वह जब उसके बंगले पर पहुंचा, तो वह अपने बगीचे में गोल
चबूतरे पर बैठी हुई थी। उसके पास ही एक गुज़राती जौहरी बैठा संदूक से सुंदर आभूषण
निकाल-निकालकर दिखा रहा था। रमा को देखकर वह बहुत ख़ुश हुई। 'आइये बाबू साहब, देखिए सेठजी कैसी अच्छी-अच्छी चीजें
लाए हैं। देखिए, हार कितना सुंदर है, इसके
दाम बारह सौ रूपये बताते हैं।'
रमा
ने हार को हाथ में लेकर देखा और कहा,हां, चीज़ तो अच्छी मालूम होती है!'
रतन-'दाम बहुत कहते हैं।'
जौहरी-'बाईजी, ऐसा हार अगर कोई दो हज़ार में ला दे, तो जो जुर्माना कहिए, दूं। बारह सौ मेरी लागत बैठ गई
है।'
रमा
ने मुस्कराकर कहा, 'ऐसा न कहिए सेठजी, जुर्माना देना पड़ जाएगा।'
जौहरी-'बाबू साहब, हार तो सौ रूपये में भी आ जाएगा और
बिलकुल ऐसा ही। बल्कि चमक-दमक में इससे भी बढ़कर। मगर परखना चाहिए। मैंने ख़ुद ही
आपसे मोल-तोल की बात नहीं की। मोल-तोल अनाडियों से किया जाता है। आपसे क्या
मोल-तोल, हम लोग निरे रोजगारी नहीं हैं बाबू साहब, आदमी का मिज़ाज देखते हैं। श्रीमतीजी ने क्या अमीराना मिज़ाज दिखाया है कि
वाह! '
रतन
ने हार को लुब्ध नजरों से देखकर कहा, 'कुछ तो कम
कीजिए, सेठजी! आपने तो जैसे कसम खा ली! '
जौहरी-'कमी का नाम न लीजिए, हुजूर! यह चीज़ आपकी भेंट है।'
रतन-'अच्छा, अब एक बात बतला दीजिए, कम-से-कम
इसका क्या लेंगे?'
जौहरी
ने कुछ क्षुब्ध होकर कहा, 'बारह सौ रूपये और बारह
कौडियां होंगी, हुजूर, आप से कसम खाकर
कहता हूं, इसी शहर में पंद्रह सौ का बेचूंगा, और आपसे कह जाऊंगा, किसने लिया।'
यह
कहते हुए जौहरी ने हार को रखने का केस निकाला। रतन को विश्वास हो गया, यह कुछ कम न करेगा। बालकों की भांति अधीर होकर बोली, 'आप तो ऐसा समेटे लेते हैं कि हार को नजर लग जाएगी! '
जौहरी-'क्या करूं हुज़ूर! जब ऐसे दरबार में चीज़ की कदर नहीं होती,तो दुख होता ही है।'
रतन
ने कमरे में जाकर रमा को बुलाया और बोली, 'आप समझते
हैं यह कुछ और उतरेगा?'
रमानाथ-'मेरी समझ में तो चीज़ एक हज़ार से ज्यादा की नहीं है।'
रतन-'उंह, होगा। मेरे पास तो छः सौ रूपये हैं। आप चार सौ
रूपये का प्रबंध कर दें, तो ले लूं। यह इसी गाड़ी से काशी जा
रहा है। उधार न मानेगा। वकील साहब किसी जलसे में गए हैं, नौ-दस
बजे के पहले न लौटेंगे। मैं आपको कल रूपये लौटा दूंगी।'
रमा
ने बडे संकोच के साथ कहा, 'विश्वास मानिए, मैं बिलकुल खाली हाथ हूं। मैं तो आपसे रूपये मांगने आया था। मुझे बडी सख्त
जरूरत है। वह रूपये मुझे दे दीजिए, मैं आपके लिए कोई
अच्छा-सा हार यहीं से ला दूंगा। मुझे विश्वास है, ऐसा हार
सात-आठ सौ में मिल जायगा। '
रतन-'चलिए, मैं आपकी बातों में नहीं आती। छः महीने में एक
कंगन तो बनवा न सके, अब हार क्या लाएंगे! मैं यहां कई
दुकानें देख चुकी हूं, ऐसी चीज़ शायद ही कहीं निकले। और
निकले भी, तो इसके ड्योढ़े दाम देने पड़ेंगे।'
रमानाथ-'तो इसे कल क्यों न बुलाइए, इसे सौदा बेचने की ग़रज़
होगी,तो आप ठहरेगा। '
रतन-'अच्छा कहिए, देखिए क्या कहता है।'
दोनों
कमरे के बाहर निकले, रमा ने जौहरी से कहा,
'तुम कल आठ बजे क्यों नहीं आते?'
जौहरी-'नहीं हुजूर, कल काशी में दो-चार बडे रईसों से मिलना
है। आज के न जाने से बडी हानि हो जाएगी।'
रतन-'मेरे पास इस वक्त छः सौ रूपये हैं, आप हार दे जाइए,
बाकी के रूपये काशी से लौटकर ले जाइएगा। '
जौहरी-'रूपये का तो कोई हर्ज़ न था, महीने-दो महीने में ले
लेता, लेकिन हम परदेशी लोगों का क्या ठिकाना, आज यहां हैं, कल वहां हैं, कौन
जाने यहां फिर कब आना हो! आप इस वक्त एक हजार दे दें, दो सौ
फिर दे दीजिएगा। '
रमानाथ-'तो सौदा न होगा।'
जौहरी-'इसका अख्तियार आपको है, मगर इतना कहे देता हूं कि
ऐसा माल फिर न पाइएगा।'
रमानाथ-'रूपये होंगे तो माल बहुत मिल जायगा। '
जौहरी-'कभी-कभी दाम रहने पर भी अच्छा माल नहीं मिलता।'यह
कहकर जौहरी ने फिर हार को केस में रक्खा और इस तरह संदूक समेटने लगा, मानो वह एक क्षण भी न रूकेगा।
रतन
का रोयां-रोयां कान बना हुआ था, मानो कोई कैदी अपनी
किस्मत का फैसला सुनने को खडा हो उसके ह्रदय की सारी ममता, ममता
का सारा अनुराग, अनुराग की सारी अधीरता, उत्कंठा और चेष्टा उसी हार पर केंद्रित हो रही थी, मानो
उसके प्राण उसी हार के दानों में जा छिपे थे, मानो उसके
जन्मजन्मांतरों की संचित अभिलाषा उसी हार पर मंडरा रही थी। जौहरी को संदूक बंद
करते देखकर वह जलविहीन मछली की भांति तड़पने लगी। कभी वह संदूक खोलती, कभी वह दराज खोलती, पर रूपये कहीं न मिले। सहसा मोटर
की आवाज़ सुनकर रतन ने फाटक की ओर देखा। वकील साहब चले आ रहे थे। वकील साहब ने
मोटर बरामदे के सामने रोक दी और चबूतरे की तरफ चले। रतन ने चबूतरे के नीचे उतरकर
कहा, 'आप तो नौ बजे आने को कह गए थे?'
वकील, 'वहां काम ही पूरा न हुआ, बैठकर क्या करता! कोई दिल
से तो काम करना नहीं चाहता, सब मुफ्त में नाम कमाना चाहते
हैं। यह क्या कोई जौहरी है? '
जौहरी
ने उठकर सलाम किया।
वकील
साहब रतन से बोले, 'क्यों, तुमने कोई चीज़ पसंद की ?'
रतन-'हां, एक हार पसंद किया है, बारह
सौ रूपये मांगते हैं। '
वकील, 'बस! और कोई चीज़ पसंद करो। तुम्हारे पास सिर की कोई अच्छी चीज़ नहीं है।'
रतन-'इस वक्त मैं यही एक हार लूंगी। आजकल सिर की चीज़ें कौन पहनता है।'
वकील
--'लेकर रख लो, पास रहेगी तो कभी पहन भी लोगी। नहीं तो
कभी दूसरों को पहने देख लिया, तो कहोगी, मेरे पास होता, तो मैं भी पहनती।'
वकील
साहब को रतन से पति का-सा प्रेम नहीं, पिता का-सा
स्नेह था। जैसे कोई स्नेही पिता मेले में लड़कों से पूछ-पूछकर खिलौने लेता है,
वह भी रतन से पूछ-पूछकर खिलौने लेते थे। उसके कहने भर की देर थी।
उनके पास उसे प्रसन्न करने के लिए धन के सिवा और चीज़ ही क्या थी। उन्हें अपने
जीवन में एक आधार की जरूरत थी,सदेह आधार की, जिसके सहारे वह इस जीर्ण दशा में भी जीवन?संग्राम
में खड़े रह सकें, जैसे किसी उपासक को प्रतिमा की जरूरत होती
है। बिना प्रतिमा के वह किस पर फल चढ़ाए, किसे गंगा-जल से
नहलाए, किसे स्वादिष्ट चीज़ों का भोग लगाए। इसी भांति वकील
साहब को भी पत्नी की जरूरत थी। रतन उनके लिए सदेह कल्पना मात्र थी जिससे उनकी
आत्मिक पिपासा शांत होती थी। कदाचित रतन के बिना उनका जीवन उतना ही सूना होता,
जितना आंखों के बिना मुखब।
रतन
ने केस में से हार निकालकर वकील साहब को दिखाया और बोली, 'इसके बारह सौ रूपये मांगते हैं।'
वकील
साहब की निगाह में रूपये का मूल्य आनंददायिनी शक्ति थी। अगर हार रतन को पसंद है, तो उन्हें इसकी परवा न थी कि इसके क्या दाम देने पड़ेंगे। उन्होंने चेक
निकालकर जौहरी की तरफ देखा और पूछा, 'सच-सच बोलो, कितना लिखूं! ।'
जौहरी
ने हार को उलट-पलटकर देखा और हिचकते हुए बोला, 'साढ़े
ग्यारह सौ कर दीजिए।।'वकील साहब ने चेक लिखकर उसको दिया,
और वह सलाम करके चलता हुआ। रतन का मुख इस समय वसन्त की प्राकृतिक
शोभा की भांति विहसित था। ऐसा गर्व, ऐसा उल्लास उसके मुख पर
कभी न दिखाई दिया था। मानो उसे संसार की संपत्ति मिल गई है। हार को गले में लटकाए
वह अंदर चली गई। वकील साहब के आचारविचार में नई और पुरानी प्रथाओं का विचित्र मेल
था। भोजन वह अभी तक किसी ब्राह्मण के हाथ का भी न खाते थे। आज रतन उनके लिए
अच्छी-अच्छी चीजें बनाने गई, अपनी कृतज्ञता को वह कैसे
ज़ाहिर करे।
रमा
कुछ देर तक तो बैठा वकील साहब का योरप-गौरव-गान सुनता रहा, अंत को निराश होकर चल दिया।
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